सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

१०२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
नाकृष्य स्थापयेत्क्रोडे न क्षिप्रं शयने क्षिपेत्। रोदयेन्न क्वचित्कार्ये विधिमावश्यकं विना।।३८।।
बालक को खींच कर गोद में न लेवे तथा जल्दी से शय्या पर सुलावे, आवश्यक कार्य (तैल मालिश आदि) के
विना किसी कार्य में कभी न रुलावे ॥३८॥
❖ आवश्यको विधिः=भेषजदानतैलाभ्यङ्गोद्वर्त्तनादिः ।।३८।।
'आवश्यको विधिः' अर्थात् 'औषध देना, तेल लगाना, उबटन लगाना' आदि ।।३८।।
तच्चित्तमनुवर्तेत तं सदैव fly/अनुमोदयेत्। (१वातातपतडिद्वृष्टिधूम्रानलजलादितः) निम्नोच्चस्थानतश्चापि रक्षेद्बालं
प्रयत्नतः ।।३९।।
बालक के मन के अनुसार चले तथा उसे सदा प्रसन्न रखे एवं वायु, घाम, बिजली, वर्षा, धूम, अग्नि, जल आदि
से तथा नीचे-ऊँचे स्थानों से भी उसे यत्न पूर्वक बचाता रहे ॥३९॥
अथ बालस्य स्वभावतो हितान्याह-
अभ्यङ्गोद्वर्त्तनस्नानं नेत्रयोरञ्जनं तथा-
वसनं मृदु यत्तच्च तथा मृद्वनुलेपनम्। जन्मप्रभृति पथ्यानि बालस्यैतानि सर्वथा ।।४०।।
बालकों के लिये हितकर—तेल मालिश करना, उबटन लगाना, नहलाना, नेत्रों में अञ्जन लगाना, कोमल वस्त्र
पहराना और मृदु पदार्थों का लेप करना, ये सब बालकों के लिये जन्म से ही हितकर होते हैं ।।४०।।
अथ बालस्य कवलादेः समयमाह-
कवलः पञ्चमाद्वर्षादष्टमान्नास्यकर्म च। विरेकः षोडशाद्वर्षाद्विंशतेश्चैव मैथुनम् ।।४१।।
बालकों के कवलादि करने का समय—पाँच वर्ष की अवस्था हो जाने के उपरान्त औषधों का कवल धारण
करने का समय होता है तथा आठ वर्ष की अवस्था के बाद नास लेने का, सोलह वर्ष की अवस्था के बाद विरेचन (जुलाब
लेने) का और बीस २० वर्ष की अवस्था के बाद मैथुन करने का समय प्रशस्त होता है। इन समयों से पहले यदि पूर्वोक्त
कवलादिकों का प्रयोग कराया जाय तो हानि होती है ।।४१।।
अथ बाल्यादेरवधिमाह सुश्रुतः-
वयस्तु त्रिविधं बाल्यं मध्यमं वार्धकं तथा। ऊनषोडशवर्षस्तु नरो बालो निगद्यते ।।४२।।
त्रिविधः सोऽपि दुग्धाशी दुग्धान्नाशी तथाऽन्नभुक्। दुग्धाशी वर्षपर्यन्तं दुग्धान्नाशी शरद्द्वयम् ।।४३।।
तदुत्तरं स्यादश्नाशी एवं बालस्त्रिधा मतः। मध्ये षोडशसप्तत्योर्मध्यमः कथितो बुधैः ।।४४।।
२चतुर्धा मध्यमं वृद्धिद्युवपूर्णक्षयान्वितम्। भवेदाविंशतेर्वृद्धिर्युवा त्वान्त्रिंशतो मतः ।।४५।।
सुश्रुतोक्त बाल्यादि अवस्थाओं की सीमा—अवस्था तीन प्रकार की होती है, (१) बाल्यावस्था, (२)
मध्यावस्था और (३) वृद्धावस्था, उनमें मनुष्य जब तक सोलह वर्ष से कम अवस्था का होता है तब तक उसकी
बाल्यावस्था कहलाती है अतः वह बालक कहा जाता है और वह बालक भी तीन प्रकार का होता है, (१) दूध पीने वाला,
(२) दूध पीने और अन्न खाने वाला तथा (३) केवल अन्न खानेवाला, उसमें एक वर्ष तक केवल दूध पीने वाला, दो
वर्ष तक दूध तथा अन्न खानेवाला और उसके बाद १५ वर्ष तक केवल अन्न खाने वाला, इस प्रकार के बालक होते
हैं। पण्डित लोग १६ वर्ष से लेकर ७० वर्ष के मध्य की अवस्था को मध्यावस्था कहते हैं। वह चार प्रकार की होती
१. कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः ।
२. क्वचित् 'चतुर्धा मध्यमं प्राह युव द्वात्रिंशतो मतः' इति पा.।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०३
है—(१) वृद्धि की अवस्था है, (२) युवावस्था, (३) पूर्णावस्था और, (४) क्षीणावस्था, इनमें से बीस वर्ष तक वीर्यादि
की वृद्धि होने से यह वृद्धि की अवस्था कहलाती है तत्पश्चात्, तीस वर्ष तक की युवावस्था कहलाती है ॥४२-४५॥
चत्वारिंशत्समा यावत्तिष्ठेद्वीर्यादिपूरितः । ततः क्रमेण क्षीणः स्याद्यावद्भवति सप्ततिः ॥४६॥
४० वर्ष तक पूर्णावस्था कहलाती है क्योंकि इस अवस्था तक शरीर में वीर्यादि पूर्ण बने रहते हैं । उसके बाद
क्रम-क्रम से जब तक ७० वर्ष की अवस्था होती है तब तक वीर्यादि क्षीण हो जाते हैं अत एव यह क्षीणावस्था कहलाती
है ॥४६॥
❖ वीर्यादीत्यादिशब्देन रसादिसर्वधात्विन्द्रियबलोत्साहा उच्यन्ते । क्षीणः=सर्वधात्विन्द्रियब-
लोत्साहैर्हीनः ।।४६।।
‘वीर्यादिपूरितः’ इस पद में स्थित ‘आदि’ शब्द से ‘रस रक्तादि सम्पूर्ण धातु, इन्द्रियों का बल और उत्साह पूर्ण
बने रहते हैं’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये और ‘क्षीण’ पद से ‘सम्पूर्ण रसादि धातु तथा इन्द्रियों का बल एवं उत्साह से
हीन’ ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४६॥
ततस्तु सप्ततेरूर्ध्वं क्षीणधातुरसादिकः । क्षीयमाणेन्द्रियबलः क्षीणरेता दिने दिने ॥४७॥
वलीप लितखालित्ययुक्तः कर्मसु चाक्षमः । कासश्वासादिभिः क्लिष्टो वृद्धो भवति मानवः ॥४८॥
उसके बाद ७० वर्ष से ऊपर की अवस्था होने पर मनुष्यों के धातु, रस रक्तादि क्षीण होते हैं और दिनों दिन इन्द्रियों
का बल क्षीण होता जाता है तथा शुक्र भी क्षीण हो जाता है और तब वह बली (झुर्री) पलित (बालों का सफेद होना)
और खालित्य (शिर के बालों का झड़जाना) से युक्त तथा इन्द्रियों के द्वारा कार्य करने में असमर्थ हो जाना है एवं
कास, (खाँसी) और श्वास आदि रोगों से पीड़ित रहता है अतएव सत्तर वर्ष की अवस्था के बाद मनुष्य वृद्ध कहलाता
हैं ॥४७-४८॥
बाल्ये विवर्धते श्लेष्मा पित्तं स्यान्मध्यमेऽधिकम् । वार्धके वर्द्धते वायुर्विचार्यैतदुपक्रमेत् ।।४९।।
बाल्यावस्था में कफ की वृद्धि रहती है, मध्यावस्था में पित्त का आधिक्य रहता है और वृद्धावस्था में वायु बढ़ता
है अत एव वैद्य को इसका विचार करके रोगी की चिकित्सा करनी चाहिए ॥४९॥
उपक्रमेत्=चिकित्सेत् ।।४९।।
‘उपक्रमेत्’ का ‘चिकित्सा करनी चाहिये’ ? यह अर्थ होता है ॥४९॥
तन्त्रान्तरे तु-
१बाल्यं वृद्धिश्छविर्मेधा त्वग्दृष्टिः शुक्रंविक्रमौ । बुद्धिः कर्मेन्द्रियं चेतो जीवितं२ दशतो ह्रसेत् ।।५०।।
दूसरे ग्रन्थों में तो यह लिखा है कि—बाल्य (लड़कपन), वृद्धि (रस रक्तादि का बढ़ना), छवि (देह की कान्ति),
मेधा (धारण करनेवाली बुद्धि), त्वक् (चमड़ा), दृष्टि (देखने की शक्ति), शुक्र, विक्रम, बुद्धि, कर्मेन्द्रिय (हाथ पैर आदि),
चित्त और जीवन ये सब यथा क्रम से प्रति १० वर्ष के व्यतीत होने पर ह्रास को प्राप्त होते हैं अर्थात्-प्रथम दश वर्ष
के बाद बाल्य द्वितीय दश (बीस) वर्ष बाद वृद्धि, तृतीय दश (तीस) वर्ष के बाद छवि इत्यादि क्रम से ह्रास को प्राप्त
होते हैं ॥५०॥
अथ प्रकृतिलक्षणान्याह-
सप्त प्रकृतयो नृणां वातात्पित्तात्कफात्तथा । संसर्गात्सन्निपाताच्च भवन्ति भिषजां मते ।।५१।।
१. ‘बाल्यादि’ति पा. । २. ‘क्रमत’ इति पा. ।

१०४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
शुक्रशोणितसंयोगे यो दोषस्तूतकटो भवेत्। प्रकृतिर्जायते तेन तस्या लक्षणमुच्यते ।।५२।।
प्रकृतियों के लक्षण—वैद्यों के मत से सात प्रकार की मनुष्यों की प्रकृति होती है। उसमें वात से वात-प्रकृति
१, पित्त से पित्त-प्रकृति २, कफ से कफ-प्रकृति ३, दो दोषों के मेल से द्वन्द्व-प्रकृति अर्थात् वातपित्त-प्रकृति ४,
वातकफ-प्रकृति ६ और तीनों दोषों से सान्निपातिक-प्रकृति ७ होती है। गर्भाधान के समय माता पिता के शुक्र और रज
के संयोगकाल में जिन दोषों की अधिकता रहती है उन्हीं दोषों के अनुसार मनुष्यों को प्रकृतियाँ होती हैं। अन्य प्रकृतियों
के लक्षण आगे कहते हैं ।।५१-५२।।
वाग्भटे तु आत्रेयादयः-
शुक्रा सृग्गर्भिणीभोज्यचेष्टागर्भाशयार्त्तिषु¹। यः स्याद्दोषोऽधिकस्तेन ²प्रकृतिः सप्तधोदिता ।।
इसी विषय में 'आत्रेयादि महर्षि' 'वाग्भट' नामक ग्रन्थ में तो ऐसा कहते हैं कि—शुक्र, शोणित (रज), गर्भिणी
स्त्रियों के भोज्य पदार्थ और चेष्टायें तथा गर्भाशय की पीड़ा इन सबों में जिन दोषों की अधिकता होती है उन दोषों के
अनुसार ही मनुष्यों की सात प्रकार की प्रकृति उत्पन्न होती है ।।५३।।
❖ सोऽपि दोषः स्वभावावस्थितो न तु दुष्टः, दुष्टेन तु शुक्रशोणितयोर्दुष्टौ शुद्धगर्भासम्भवात् ।।५३।।
शुक्र शोणितादिगत जो अधिक दोष होते हैं उनके द्वारा प्रकृति का उत्पन्न होना जो कहा गया है उसमें दोष पद
से दुष्टता की प्राप्त दोषों को नहीं समझना चाहिये किन्तु जो अपने स्वभाव में स्थित हों उन्हीं को प्रकृति का उत्पादक
समझना चाहिये। क्योंकि दोषों के दुष्ट होने पर उनके द्वारा शुक्र और शोणित की भी दुष्टि हो जाती है और उन दोनों
की दुष्टि से 'शुद्ध गर्भ की उत्पत्ति हो नहीं सकती अतः सर्वथा निर्दुष्ट दोषों ही को प्रकृति का उत्पादक समझना
चाहिये ।।५३।।
अथ वातादिप्रकृतयस्तत्रादौ वातप्रकृतिलक्षणमाह-
जागरूकोऽल्पकेशश्च स्फुटिताङ्घ्रिकरः कृशः। शीघ्रगो बहुवाग्रूक्षः स्वप्ने वियति गच्छति ।।
एवंविधः स विज्ञेयो वातप्रकृतिको नरः ।।५४।।
वात-प्रकृति के लक्षण—जागनेवाला, अल्पकेशों से युक्त, फटे हुये हाथ-पैरवाला, दुबला-पतला, शीघ्र
चलनेवाला तथा बहुत बोलनेवाला एवं रूखे शरीर वाला और स्वप्न में आकाश में गमन करनेवाला जो मनुष्य होता है
उसे वात-प्रकृति वाला समझना चाहिये ।।५४।।
अथ पित्तप्रकृतिलक्षणमाह-
पित्तप्रकृतिको लोको यादृशोऽथ निगद्यते । अकालपलितो गौरः क्रोधी स्वेदी च बुद्धिमान् ।।५५।।
बहुभुक्ताम्रनेत्रश्च³ स्वप्ने ज्योतींषि पश्यति। एवंविधो भवेद्यस्तु पित्तप्रकृतिको नरः ।।५६।।
पित्त प्रकृति के लक्षण—बिना वृद्धावस्था आये ही जिसके बाल सफेद हो जायँ, और जो गौर वर्ण का तथा
क्रोधी हो, शरीर से पसीना अधिक निकले, बुद्धिमान्, बहुत भोजन करने वाला, ताम्र के वर्ण के समान नेत्रवाला और
स्वप्न में सूर्य, बिजली आदि ज्योति से युक्त पदार्थों का देखनेवाला हो उसे पित्त प्रकृति वाला समझना
चाहिये ।।५५-५६।।
१. 'गर्भाशयान्तरे' इति पा.। २. 'सर्वथोदिते'ति पा.।
३. 'बहुभोक्ताऽस्रे'ति पा.।

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०५
अथ श्लेष्मप्रकृतिलक्षणमाह-
श्यामकेशः क्षमी स्थूलो बहुवीर्यो महाबलः । स्वप्ने जलाशयालोकी श्लेष्मप्रकृतिको नरः ॥५७॥
कफ प्रकृति के लक्षण-काले बालों वाला, क्षमाशील, स्थूल शरीरवाला, वीर्यशाली, अत्यन्त बलवान् और
स्वप्न में जलाशय (नदी, तालाब आदि) को देखनेवाला, जो मनुष्य हो उसे कफ प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५७॥
अथ द्वन्द्वजत्रिदोषजप्रकृतिलक्षणमाह-
दृश्यते प्रकृतौ यत्र रूपं दोषद्वयस्य तु । द्विसंसर्गेण जानीयात्सर्वलिङ्गैस्त्रिदोषजम् ।।५८।।
द्वन्द्वज तथा त्रिदोषज प्रकृति के लक्षण-जिसकी प्रवृत्ति में दो दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे द्वन्द्वज और
जिसकी प्रकृति में तीन दोषों के लक्षण दिखाई पड़े उसे त्रिदोषज-प्रकृतिवाला समझना चाहिये ॥५८॥
अथ वातप्रकृतिलक्षणानि वाग्भटे-
१विभुत्वादाशुकारित्वाद्बलित्वादन्यकोपनात्२ । स्वातन्त्र्याद्बहुरोगत्वाद्दोषणां प्रबलोऽनिलः ।।५९।।
प्रायोऽत३ एव पवनाध्युषिता मनुष्या दोषात्मकाः स्फुटितधूसरकेशगात्राः ।।
शीतद्विषश्चलधृतिस्मृतिबुद्धिचेष्टासौहार्ददृष्टिगतयोऽतिबहुप्रलापाः ।।६०।।
अल्पपित्तबलजीवितनिद्राः सन्नसक्तचलजर्जरवाचः ।
नास्तिका बहुभुजः सविलासा गीतहास्यमृगयाकलिलोलाः ।।६१।।
मधुराम्लपटूष्णसात्म्यकांक्षाः कृशदीर्घकृतयः सशब्दयाताः ।
न दृढा न जितेन्द्रिया न चार्या न च कान्तादयिता बहुप्रजा वा ।।६२।।
४नेत्राणि चैषां खरधूसराणि वृत्तान्यचारूणि मृतोपमानि ।
उन्मीलितानीव भवन्ति सुप्ते शैलद्रुमांस्ते गगनं च यान्ति ।।६३।।
अधन्या मत्सराष्माताः स्तेना प्रोद्बद्धपिण्डिकाः । श्वशृगालोष्ट्रगृध्राखुकाकानूकाश्च वातिकाः ।।६४।।
वाग्भटोक्त वात-प्रकृति के लक्षण-विभु (व्यापक) तथा शीघ्रकारी होने से एवं बली तथा दूसरे को कुपित
करनेवाला और स्वतन्त्र तथा बहुत रोगों को उत्पन्न करनेवाला होने से सम्पूर्ण दोषों के मध्य में वायु सबसे प्रबल होता
है, अत एव वात-प्रकृतिवाले मनुष्य प्रायः दोषों (अवगुणों) से युक्त होते हैं, उनके शरीर और केश फटे हुये तथा धूसर
वर्ण के होते हैं और वे शीत से द्वेष रखने वाले होते हैं, उन सबों की धृति (धैर्य), शक्ति, बुद्धि, चेष्टा, मित्रता, दृष्टि
और गति चञ्चल होती है, एवं वे बहुत बोलनेवाले होते हैं, उनमें पित्त, बल, जीवन और निद्रा ये सब थोड़ी मात्रा में
होते हैं और वे सायँ-साँय टूटे फूटे, जल्दी से हकला कर बोलने वाले, नास्तिक, बहुत भोजन करने वाले, बिलास से
युक्त, गान, हँसी (मजाक), शिकार, कलह, इन सबों में आसक्त होते हैं। उन सबों को मीठा, खट्टा, नमकीन और गर्म
पदार्थ ही सात्म्य (हितकर) होते हैं तथा इन्हीं पदार्थों के खाने की इच्छा भी होती है। वे पतले तथा लम्बे शरीरवाले
होते हैं और उनके चलने में शब्द होता है तथा वे न तो दृढ़, न जितेन्द्रिय, न सज्जन, न स्त्रियों के प्रिय और न बहुत
सन्तानवाले ही होते हैं और उन सबों के नेत्र तीक्ष्ण धूसर वर्ण वाले, गोल, देखने में भयङ्कर तथा सोने पर भी मुर्दे के
समान कुछ खुले हुये होते हैं और वे स्वप्न में पर्वत तथा वृक्ष के ऊपर एवं आकाश में गमन करते हैं। वे भाग्यहीन,
मत्सरता से युक्त अर्थात् दूसरे का भला न देख सकनेवाले और चोर होते हैं तथा उनके पाँवों की पिण्डलियाँ गाँठदार
होती हैं। वातप्रकृति वाले मनुष्यों का स्वभाव कुत्ता, स्यार, ऊँट, गृध्र, चूहा और उल्लू पक्षी के सदृश होता है। यहाँ
पर सर्वत्र 'अनूक' पद का 'स्वभाव' अर्थ समझना चाहिये ॥५९-६४॥
१. 'कोष्ठस्थः पाठः क्वाचित्कः' । २. 'अल्पकोपनादि'ति पा. ।
३. 'प्रायस्य एवे'ति पा. । ४. 'अक्षीणी'ति पा. ।

१०६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
अथ पित्तप्रकृतिलक्षणान्याह-
पित्तं वह्निर्वह्निजं वा यदस्मात्पित्तोद्रिक्तस्तीक्ष्णतृष्णाबुभुक्षः ।
गौरोष्णाङ्गस्ताम्रहस्ताङ्घ्रिवक्त्रः १ शूरो मानी पिङ्गकेशोऽल्परोमा ॥ ६५॥
दयितमाल्यविलेपनमण्डनः सुचरितः शुचिराश्रितवत्सलः ।
विभवसाहसबुद्धिबलान्वितो भवति भीषु गतिर्द्विषतामपि ॥६६॥
मेधावी प्रशथिलसन्धिबन्धमांसो नारीणामनभिमतोऽल्पशुक्रकामः ।
आवासः २ पलिततरंगनीलिकानां भुक्तान्नं मधुरकषायतिक्तशीतम् ॥ ६७॥
घर्मद्वेषी स्वेदनः पूतिगन्धिर्भूर्युच्चारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः ।
सुप्तं पश्येत्कर्णिकारान् पलाशान् दिग्दाहोल्काविद्युदर्कानलांश्च ॥ ६८॥
तनूनि पिङ्गानि चलानि चैषां तन्वल्पपक्षाणि हिमप्रियाणि ।
क्रोधेन मद्येन रवेश्च भासा रागं व्रजन्त्याशु विलोचनानि ॥६९॥
मध्यायुषो मध्यबलाः पण्डिताः क्लेशभीरवः । व्याघ्रर्क्षकपिमाजार्वृकानूकाश्र पैत्तिकाः ॥७०॥
वाग्भटोक्त पित्तप्रकृति के लक्षण—पित्त स्वयं अग्नि अथवा अग्नि से उत्पन्न है अतः पित्तप्रकृतिवालों को भूख-
प्यास अधिक लगती है। वे गौर वर्ण तथा गरम शरीरवाले होते हैं, उनके हाथ पैर और मुख ताम्र वर्ण के होते हैं। वे
शूर, मानी, पीले केशवाले तथा थोड़े रोगों से युक्त होते हैं और उनको पुष्पों की माला, चन्दनादि का लेप और आभूषण
प्रिय लगते है। वे सुन्दर चरित्र वाले, पवित्र, आश्रितों के ऊपर पुत्र की भाँति प्रेम रखनेवाले, धन, साहस, बुद्धि तथा
बल से युक्त, भय का विषय उपस्थित होने पर शत्रुओं को भी शरण देने वाले और मेधावी होते हैं। उनके मांस तथा
सन्धियों के बन्धन शिथिल होते हैं, वे स्त्रियों के प्रिय नहीं होते, क्योंकि उनमें शुक्र तथा कामचेष्टा कम होती है और
वे पलित (बालों की सफेदी), झुरीं, और नीलिका रोगों के निवासस्थान तथा मीठा, कसैला, तीता और शीतल भोजन
करनेवाले एवं घर्म (धूप) के साथ द्वेष करनेवाले होते हैं और उनके शरीर से स्वेद (पसीना) अधिक निकलता है तथा
दुर्गन्ध आता है। उनमें विष्ठादि मल, क्रोध, पान (मद्यादि का पीना), भोजन व ईर्ष्या इन सबों की मात्रा अधिक रहती
है। वे स्वप्न में कनेर, पलाश, दिशाओं का जलना, उल्का, बिजली, सूर्य और अग्नि को देखते हैं उनके नेत्रों के पलकों
के ऊपर के रोम पतले और थोड़े होते हैं। उनकी आँखें पीली, चञ्चल शीत को पसन्द करनेवाली लम्बी, क्रोध, मद्य,
तथा सूर्य की किरणों से शीघ्र रक्त वर्ण हो जाने वाली होती है। वे मध्यम आयु तथा बलवाले, पण्डित, क्लेश से डरने
वाले और व्याघ्र, भालू, बन्दर, बिलार तथा भेड़िया के सदृश स्वभाववाले होते हैं ॥ ६५-७०॥
अथ कफप्रकृतिलक्षणान्याह-
श्लेष्मा सोमः श्लेष्मलस्तेन सौम्यो गूढस्निग्धश्लिष्टसन्ध्यस्थिमांसः ।
क्षुत्तृड्दुःखक्लेशघमैर्रतप्तो बुद्ध्या युक्तः सात्त्विकः सत्यसन्धः ॥ ७१॥
प्रियंगुदूर्वाशरकाण्डदर्भगोरोचनापद्मसुवर्णवर्णः ।
प्रलम्बबाहुः पृथुपीनवक्षामहाललाटो घननीलकेश ॥७२॥
मृद्वङ्गः समसुविभक्तचारुदेहो ३बह्वोजोरतिरसशुक्रपुत्रमृत्यः ।
धर्मात्मा वदति न निष्ठुरं च जातु प्रच्छन्नं वहति दृढं चिरं च वैरम् ॥ ७३॥
१. 'हस्तादियुग्म' इति 'हस्ताङ्घ्रिचक्षु'रिति च पा.। २. 'आवासः पलितव्यङ्गनीलिकानामि'ति पा.।
३. 'बह्वाजा रतिरसयुक्त सपुत्रभृत्य' इति पा.।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ चतुर्थ बालप्रकरणम् १०७
समदद्विरेन्द्रतुल्ययातो जलदाम्भोधिमृदङ्गसिंहघोषः ।
स्मृतिमानभियोगवान्विनीतो न च बाल्येऽप्यतिरोदनो न लोलः ।।७४।।
तिक्तं कषायं कटुकोष्णरूक्षमल्पं स भुंक्ते बलवांस्तथाऽपि ।
रक्तान्तसुस्निग्धविशालदीर्घसुव्यक्तशुक्लासितपक्ष्मलाक्षः ।।७५।।
अल्पव्याहारक्रोधपानाशनेर्ष्यूः प्राज्यायुर्वित्तो दीर्घदर्शी वदान्यः ।
श्राद्धो गम्भीरः स्थूललक्ष्यः क्षमाया-नार्योन्निद्रालुर्दीर्घसूत्रः कृतज्ञः ।।७६।।
ऋजुर्विपश्चित्सुभगः सलज्जो भक्तो गुरूणां स्थिरसौहृदश्च ।
स्वप्ने सपद्मान्सविहङ्गमालास्तोथाशयान्यश्यति तोयदांश्च ।।७७।।
ब्रह्मरुद्रेन्द्रवरुणतार्क्ष्यहंसगजाधिपैः । श्लेष्मप्रकृतस्तुल्यास्तथा सिंहाश्वगोवृषः ।।७८।।
वाग्भटोक्त कफप्रकृतिवालों के लक्षण- कफ सोमात्मक पदार्थ है, अतः कफ प्रकृति वाला मनुष्य सौम्य होता
है। उसके सन्धि, अस्थि और मांस गूढ, स्निग्ध और परस्पर मिले हुये रहते हैं और वह भूख, प्यास, दुःख और क्लेश
के धर्मों से सन्तप्त नहीं होता, वह बुद्धि से युक्त, सत्त्व गुण वाला, सत्यप्रतिज्ञ (अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करने वाला)
होता है। उसका वर्ण प्रियङ्गु, दूब, मूंज, कुशा, गोरोचन, कमल और सुवर्ण के समान होता है। उसकी बाहें लम्बी,
ललाट चौड़ा और वक्षःस्थल चौड़ा तथा मोटा, केश घने तथा काले, अङ्ग कोमल और शरीर सम, सुविभक्त (अच्छी
तरह से प्रत्येक अवयवों का विभाग हुआ) और सुन्दर होता है। उसमें ओज, रति, रस, शुक्र, पुत्र और भृत्य इनका
आधिक्य रहता है। वह धर्मात्मा, कभी निष्ठुर वचन नहीं बोलने वाला दृढ़ तथा चिरकाल तक गुप्त रूप से वैर रखनेवाला
होता है। उसका गमन मतवाले हाथी के समान, कण्ठस्वर मेघ, समुद्र, मृदङ्ग और सिंह के शब्द के समान गम्भीर होता
है। वह स्मरण शक्ति-वाला, उद्योगी, विनय से युक्त और लड़कपन में भी न अत्यन्त रोने वाला और न चञ्चलता से
रहने वाला होता है। वह यद्यपि तीता, कसैला, कड़ुआ, गरम, रूखा तथा थोड़ा भोजन करता है तथाऽपि बलवान् होता
है। उसके दोनों नेत्र प्रान्त भागों में रक्त वर्ण से युक्त, अत्यन्त स्निग्ध, बड़े और लम्बे शुक्ल तथा कृष्ण मण्डल जिसमें
भलीभाँति से व्यक्त हो रहे हैं तथा सुन्दर नेत्र-लोमों (बरौनी) से युक्त होते हैं। वह बातचीत, क्रोध, पान, भोजन और
ईर्ष्या इन सबों की थोड़ी मात्रा में करता है। वह बहुत आयु तथा धन से युक्त, दूर तक विचार करने वाला, उदार, श्रद्धा
से युक्त, गम्भीर, क्षमाशील, श्रेष्ठ, अधिक सोनेवाला, दीर्घसूत्र (प्रारम्भ किये हुये कर्म को बहुत देर में समाप्त करने वाला)
और कृतज्ञ होता है। वह सरल चित्त, विद्वान्, सुभग (देखने में सुन्दर या अच्छा ऐश्वर्यवान्), गुरुजनों की भक्ति रखनेवाला,
स्थिर मंत्री रखने वाला, स्वप्न में कमल और पक्षियों के वृन्द से युक्त जलाशय तथा मेघ को देखने वाला होता है और
कफ-प्रकृतिवाले मनुष्य ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, वरुण, गरुड़, हंस, गजेन्द्र, सिंह, घोड़ा, गौ और बैल के सदृश स्वभाव से
युक्त होते हैं ॥७१-७८॥
ननु प्रकृतिहेतूनां मध्ये योऽधिकः स स्वव्याधीन्कथं न करोतीत्याशंकायामाह-
विषजाता यथा कीटो न विषेण प्रबाध्यते । तद्वत्प्रकृतयो मर्त्यं शक्नुवन्ति न बाधितुम् ।।७९।।
प्रकृति के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं, उनके मध्य में जो अधिक होता है उसी के अनुसार प्रकृति होती है तो वही
दोष अपनी प्रकृतिवाले मनुष्यों में अपने से उत्पन्न होनेवाली व्याधियों को क्यों नहीं उत्पन्न करता ? इस शङ्का का उत्तर
यह है कि-विष से उत्पन्न हुये कीड़े जैसे विष से पीड़ित नहीं होते, उसी प्रकार वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को वातादि
दोष पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं ।।७९।।
❖ एतौ द्वौ नञौ अपि ईषदर्थे । तेन विषेण विषजदाहादिना ईषत् प्रबाध्यते, न तु भृशम् । तथा च
प्रकृतयः प्रकृतिहेतवो दोषा बाधितुं न शक्नुवन्ति । करचरणस्फुटितत्व स्वेदनिद्राऽऽधिक्यादिना ईषद्व बाधितुं
शक्नुवन्त्येव, न ज्वरादिभिः ।।७९।।

१०८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
यहाँ पर मूल में जो दो स्थलों पर 'नञ्' (नहीं) शब्द का प्रयोग आया है वहाँ पर उन दोनों को 'थोड़े' इस अर्थ
में प्रयोग हुआ है ऐसा समझना चाहिये, अत एव 'विष से पीड़ित तो नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'विष से होनेवाले दाहादिक
से किञ्चिन्मात्र ही पीड़ित होते हैं न कि अधिक मात्रा में ऐसा समझना चाहिये । तथा 'वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों को तत्तत्
प्रकृतियों के हेतुभूत जो वातादि दोष हैं वे पीड़ित करने के लिये समर्थ नहीं होते हैं' इसका अर्थ 'हाथपैर का फटना,
पसीने का अधिक निकलता और अधिक नींद आना इत्यादि से तो थोड़ी मात्रा में पीड़ित करने के लिये अवश्य ही समर्थ
होते हैं न कि ज्वरादिकों से पीड़ित करने के लिये समर्थ होते हैं' ऐसा समझना चाहिये ॥७९॥
प्रकोपो वाऽन्यभावो वा शमो वा नोपजायते । प्रकृतीनां स्वभावेन जायते तु गतायुषः ॥८०॥
इति श्रीमिश्रलटकनतनय श्रीमन्मिश्रभावविरचिते भावप्रकाशे बालप्रकरणं चतुर्थम् ॥४॥
वातादि प्रकृतिवाले मनुष्यों के शरीर में स्वभाव से ही वातादि दोषों का प्रकोप, अन्यभाव (बदल जाना), अथवा
उपशम कभी होता ही नहीं यदि होता है तो उन्ही लोगों को जिन लोगों की आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् जो जल्द
मरने वाले हैं ॥८०॥
इति श्रीभिषग्रत्नब्रह्मशङ्करशर्मसाहित्यशास्त्रिणा विरचितायां 'विद्योतिनी'
भाषाटीकायं चतुर्थबालप्रकरणम् समाप्तम् ॥४॥

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम्
अथ देशमाह-
भूमिदेशस्त्रिधाऽनूपो जांगलो मिश्रलक्षणः ॥१॥
देशों के भेद—पृथ्वी में देश तीन प्रकार के होते हैं (१) अनूप, (२) जाङ्गल और (३) मिश्रलक्षण (अनूप तथा
जाङ्गल के लक्षणों से युक्त अर्थात् साधारण) ॥१॥
तत्रानूपलक्षणमाह-
नदीपल्वलशैलाढ्यः फुल्लोत्पलकुलैर्युतः । हंससारसकारंडवचक्रवाकादिसेवितः ॥२॥
शशवाराहमहिषरुरुरोहित्कुलाकुलः । प्रभूतद्रुमपुष्पाढ्यो नीलशस्यफलान्वितः ॥३॥
अनेकशालिकेदारकदलीक्षुविभूषितः । अनूपदेशो ज्ञातव्यो वातश्लेष्मामयार्त्तिमान् ॥४॥
अनूपदेश के लक्षण—जो देश नदी, छोटे-छोटे जलाशय और पर्वतों से भरे हुए हैं तथा खिले हुये जल में उत्पन्न
होनेवाले कमलादि पुष्पों से युक्त, हंस, सारस, कारण्डव (काक के समान चोंच, लम्बे पाँववाले काले वर्ण के) पक्षी
और चक्रवाक (चकवा) आदि पक्षियों से सेवित, शश (खरगोश), सूअर, भैंसा, रुरु (मृग विशेष) तथा रोहि (मृग विशेष)
आदि पशुओं के कुलों से व्याप्त, अनेक प्रकार के वृक्ष, पुष्पों तथा हरे-हरे शस्य (धान्य विशेष) और फलों से युक्त एवं
अनेक प्रकार के शालि (धान्यविशेष) के खेत तथा केले और ईख के वृक्षों से सुशोभित है उसे वात तथा कफ सम्बन्धी
रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूपदेश समझना चाहिये ॥२-४॥
अथ जाङ्गललक्षणमाह-
आकाशसम¹ उच्चश्च स्वल्पपानीयपादपः । शमीकरीरबिल्वार्कपीलुकर्कन्धुसङ्कुलः ॥५॥
हरिणैणर्क्षपृषतगोकर्णखरसङ्कुलः । सुस्वादुफलवान्देशो वातलो जाङ्गलः स्मृतः ॥६॥
जाङ्गल देश के लक्षण—जिस देश में आकाश के सदृश समतल और ऊँची जमीन थोड़े जल तथा वृक्षों से
युक्त हो और शमी (छींकुर), करील, बेल, आक, (मदार), पीलु, तथा बेर के वृक्षों एवं हरिण, एण (कृष्ण मृग), रीछ,
पृषत (श्वेतबिन्दु युक्त मृग), गोकर्ण (गौ के सदृश कानवाला) पशु और गदहा इन सबों से व्याप्त हो तथा जिसमें स्वादयुक्त
(मीठे) फल लगे हों ऐसे देश को वातसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥५-६॥
तन्त्रान्तरे तु-
बहूदकनगोऽनूपः कफमारुतरोगवान् । जाङ्गलोऽल्पाम्बुशाखी च पित्तासृङ्मरुतोत्तरः ॥७॥
दूसरे ग्रन्थों में अनूपादि देशों के विषय में यह लिखा है कि—जिसमें बहुतायत से जल तथा पर्वत हों उसे
कफ तथा वायु सम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला अनूप देश समझना चाहिये और जहाँ थोड़े जल तथा वृक्ष हों उसे
प्रधानरूप से पित्त, रुधिर तथा वायुसम्बन्धी रोगों को उत्पन्न करनेवाला जाङ्गल देश समझना चाहिये ॥७॥
अथ साधारणलक्षणमाह-
संसृष्टलक्षणो यस्तु देशः साधारणो मतः ।
समाः साधारणे यस्माच्छीतवर्षोष्ममारुताः । समता तेन दोषाणां तस्मात्साधारणो वरः ॥८॥
साधारण देश के लक्षण—जिस देश में अनूप तथा जाङ्गल इन दोनों देशों के लक्षण पाये जायें, उसे साधारण
१. 'आकाशशुभ्र' इति पा. ।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
देश समझना चाहिये। साधारण देश में शीत, वर्षा, गर्मी और वायु समान रूप से होते हैं अत एव वात, पित्त और कफ
इन दोषों की वहाँ पर समता होने से वह (साधारण) देश सब से उत्तम कहा गया है ॥८॥
सुश्रुतः-
उचिते वर्तमानस्य नास्ति दुर्देशजं भयम्। आहारस्वप्नचेष्टाऽऽदौ तद्देशस्य कृते सति ॥९।।
सुश्रुत में कहा है कि—किसी भी दुर्देश (जहाँ का जल, वायु अपने अनुकूल न हों उस देश) में जाने पर यदि
आहार, विहार, निद्रा आदि के विषय में उचित आचरण किया जाय तो दुर्देश सम्बन्धी रोगादि का भय नहीं होता है ॥९॥
वृद्धवाग्भटः-
यस्य देशस्य यो जन्तुस्तज्जं तस्यौषधं हितम्। देशादन्यत्र वसत्तत्तुल्यगुणमौषधम् ।।१०।।
स्वे देशे निचिता दोषा अन्यस्मिन्कोपभागताः। बलवन्तस्तथा न स्युर्जलजाः स्थलजास्तथा ।।११।।
'वृद्ध वाग्भट' कहते हैं कि—जिस देश का रहनेवाला जो प्राणी हो उसे उसी देश में उत्पन्न हुई ओषधि हितकर
हो सकती है। उस देश (स्वदेश) से अन्यत्र निवास करते हुए प्राणी के लिये स्वदेश में उत्पन्न हुई हितकर ओषधि के
तुल्य गुणवाली अन्य देश की भी ओषधि हितकर होती है अपने देश में सञ्चित हुये दोष यदि दूसरे देश में कुपित होवें
तो उतने बलवान् नहीं होते, चाहे वे जलप्राय अथवा स्थलप्राय देश में उत्पन्न होनेवाले रोग क्यों न हों। अर्थात् अनूप
देश में रहनेवाले पुरुषों के सञ्चित हुये दोष जाङ्गल देश में जाने पर यदि कुपित हो जायँ तो भी वे अपने देश की भाँति
बलवान् नहीं होते ॥१०-११॥
अथ दिनादिचर्याः-
मानवो येन विधिना स्वस्थस्तिष्ठति सर्वदा। तमेव कारयेद्वैद्यो यतः स्वास्थ्यं सदेप्सितम् ॥१२।।
दिनचर्या निशाचर्यामृतुचर्या यथोदिताम्। आचरन्पुरुषः स्वस्थः सदा तिष्ठति नान्यथा ॥१३॥
दिनादिचर्या—जैसा आहार विहारादि करने से मनुष्य सर्वदा स्वस्थ (नीरोग) रह सकता हो, वैद्य को उचित है कि-
उसी विधि को उससे करावे। क्योंकि स्वस्वास्थ्य सभी को वांछनीय है। शास्त्र में दिनचर्या, रात्रिचर्या और ऋतुचर्या जिस
प्रकार से कही हुई है। उसी प्रकार से दिनचर्यादि का आचरण करने से मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। उसके विपरीत
आचरण करने से स्वास्थ्य लाभ नहीं कर सकता है ॥१२-१३॥
तत्र स्वस्थस्य लक्षणमाह सुश्रुतः-
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥१४।।
सुश्रुतोक्त स्वस्थ पुरुष का लक्षण—जिसके शरीर में वातादि दोष अग्नि, धातु (रसरक्तादि), मल और क्रिया
समान रूप से हों तथा जो आत्मा, इन्द्रिय तथा मन से प्रसन्न रहता हो, उसे स्वस्थ कहते हैं ॥१४॥
❖ क्रिया अत्र कर्म, तेन समक्रियः=शरीरानुरूपकर्मा ।।१४।।
'क्रिया' पद का अर्थ 'कर्म' है अतः 'समक्रिय' अर्थात् जिसके कर्म शरीर के अनुरूप होते हों ॥१४॥
अथ दिनचर्यामाह-
ब्राह्मे मुहूर्ते बुध्येत स्वस्थो रक्षाऽर्थमायुषः। तत्र १सर्वाघशान्त्यर्थं स्मरेद्धि मधुसूदनम् ।।१५।।
दध्याज्यादर्शसिद्धार्थ बिल्वगोरोचनस्रजाम्। दर्शनं स्पर्शनं कार्यं प्रबुद्धेन शुभावहम् ।।१६।।
दिनचर्या—स्वस्थ पुरुष अपनी आयु की रक्षा के लिए ब्राह्ममुहूर्त्त में (सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पहले) सो कर उठे
१. 'दुःखस्ये'ति पा.।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १११
और उस समय सम्पूर्ण पापों को शान्त करने के लिये मधुसूदन भगवान् का स्मरण करे और उसे उचित है कि वह प्रथम
दही, घी, दर्पण, पीली सरसों, बेल, गोरोचन तथा पुष्पमाला का दर्शन तथा स्पर्श करे, क्योंकि यह शुभदायक होता
है ॥१५-१६॥
स्वमाननं घृते पश्येद् यदिच्छेच्चिरजीवितम् ।
आयुष्यमुषसि प्रोक्तं मलादीनां विसर्जनम्। तदन्त्रकूजनाध्मानोदरगौरववारणम् ॥१७॥
यदि दीर्घ जीवन लाभ करने की अभिलाषा हो तो अपने मुख को घृत में देखे और प्रातः काल में मल-मूत्रादि का
त्याग करना आयुष्य (आयु के लिये हितकर) तथा आँत का गुड़गुड़ाना, अफारा तथा पेट का भारीपन इन सबों का दूर
करनेवाला कहा हुआ है ॥१७॥
❖ आदिशब्देन वातमूत्रादीनां ग्रहणम् ॥१७॥
'मलादि' में वात (अधोवायु) मूत्र आदि का ग्रहण करना चाहिये ॥१७॥
अथ पुरीषवेगाभिघाताद्बाधानिमाह-
आटोपशूलौ परिकर्त्तिका च सङ्गः पुरीषस्य तथोर्ध्ववातः ।
पुरीषमास्यादथवा निरेति पुरीषवेगेऽभिहते नरस्य ॥१८॥
शौच की चेष्टा रोकने से हानि—पुरीष का वेग अर्थात् शौच की चेष्टा रोकने पर मनुष्य को आटोप (पेट में
वेदना युक्त गुड़गुड़ शब्द का होना), शूल और 'परिकर्तिका' (गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा) ये सब रोग होते हैं तथा
मल का अवरोध और ऊर्ध्ववात अथवा मुख से मल निकलना, इन सबों में से कोई-न-कोई होने लगता है ॥१८॥
❖ परिकर्तिका=गुदे परिकर्तनवत्पीडा । पुरीषस्य सङ्गः=निरोधः । ऊर्ध्ववातः=उद्गारबाहुल्यम् ॥१८॥
'परिकर्तिका' का 'गुदा में कतरने के सदृश पीड़ा' 'पुरीषस्य सङ्गः' का 'मलका अवरोध' तथा 'ऊर्ध्ववात' का अधिक
उद्गार (डकार) आना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥१८॥
अथ वातनिग्रहजान् दोषानाह-
वातमूत्रपुरीषाणां सङ्गो ध्मानं क्लमो रुजा । जठरे वातजाश्चान्ये रोगाः स्युर्वातनिग्रहात् ॥१९॥
अधोवायु रोकने से हानि—अधोवायु रोकने से वात, मूत्र और मल का अवरोध, अफारा, क्लान्ति, पीड़ा एवं
उदर में वायु से उत्पन्न होने वाले अन्यान्य रोग भी होते हैं ॥१९॥
अथ मूत्रनिग्रहजान् दोषानाह-
बस्तिमेहनयोः शूलं मूत्रकृच्छ्रं शिरोरुजा । विनामो वङ्क्षणानाहः स्याल्लिङ्गं मूत्रनिग्रहे ॥२०॥
मूत्र के वेग रोकने से हानि—मूत्र के वेग रोकने से मूत्राशय तथा लिङ्ग में शूल, मूत्रकृच्छ्र, शिर में दर्द, विनाम
तथा वङ्क्षणानाह, ये सब रोग होने लगते हैं ॥२०॥
❖ विनामः=शरीरस्य नम्रता । वङ्क्षणानाहः=वङ्क्षणस्याकर्षणवत्पीडा ॥२०॥
'विनाम' पद से 'पीड़ा होने से शरीर का झुक जाना' तथा 'वङ्क्षणानाह' पद से 'वङ्क्षण अर्थात् दोनों ऊरुओं के
सन्धिस्थानों के खींचने की भाँति पीड़ा होना, यह अर्थ समझना चाहिये ॥२०॥
न वेगतोऽन्यकार्यः स्यान्न वेगानीरयेद्वलात् । कामशोकभयक्रोधान्मनोवेगान्विधारयेत् ॥२१॥
गुदादिमलमार्गाणां शौचं कान्तिबलप्रदम् । पवित्रकरमाख्यातमलक्ष्मीकलिपापहृत् ॥२२॥
प्रक्षालनं मतं पाण्योः पादयोः शुद्धिकारणम् । मलश्रमहरं वृष्यं चक्षुष्यं राजसापहम् ॥२३॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
शौच (पुरीषोत्सर्गादि) के समय अन्य कार्य नहीं करे और न शौच के वेग को बलात् रोके। वेग रोकने के विषय
में केवल काम, शोक, भय, क्रोध तथा मन के वेग को अवश्य रोकना चाहिये। गुदा आदि जो मलादि के निकलने के
मार्ग हैं, उनका सफा रखना कान्ति, बल तथा पवित्र करने वाला और दरिद्रता तथा कलियुग के पापों को नाश करनेवाला
है। शौचादि के बाद हाथ-पैर का भलीभाँति मिट्टी आदि से मलकर धोना—शुद्धिकारक, मलादि करने के समय उत्पन्न
हुये श्रम को हरण करनेवाला, वृष्य (ओज पैदा करनेवाला अथवा मनको हर्षित किं वा शुक्र की वृद्धि करनेवाला), चक्षु
के लिये हितकारी और रजोगुण को दूर करनेवाला है ॥२१-२३॥
अथ दन्तकाष्ठविधिमाह-
भक्षयेद्दन्तपवनं द्वादशाङ्गुलमायतम्। कनिष्ठिकाऽग्रवत्स्थूलमृज्वग्रन्थि तथाऽव्रणम् ।।२४।।
एकैकं घर्षयेद्दन्तं मृदुना कूर्चकेन तु। दन्तशोधनचूर्णेन दन्तमांसान्यबाधयन् ।। २५ ।।
दातौन करने की विधि—बारह अङ्गुल लम्बी, कनिष्ठिका अंगुलि के अग्रभाग की भाँति मोटी, सीधी, गाँठ तथा
व्रण से रहित अर्थात् चिकनी और कहीं से छिल्के उचड़े हुये न हों, ऐसी दातौन लेकर उसकी मुलायम कूँची बनाकर
उससे दाँतों को साफ करने वाले चूर्ण (मञ्जन) के साथ जिस भाँति से मँसूड़ों में पीड़ा न हो उस भाँति एक-एक दाँत
को रगड़े ॥२४-२५॥
क्षौद्रत्रिकटुकाक्तेन तैलसिन्धुभवेन वा। चूर्णेन तेजोवत्याश्च दन्तान्नित्यं विशोधयेत् ।।२६।।
त्रिकटु (सोंठ, पीपल, काली मिर्च) का चूर्ण शहद में मिलाकर अथवा सेंधा नमक कड़ूआ तेल में मिलाकर अथवा
तेज वल्कल के चूर्ण से नित्य दाँतों को साफ करे ॥२६॥
❖ तेजोवती=तेजवल्कल इति लोके प्रसिद्धा ।।२६।।
'तेजोवती' 'तेज वल्कल' नाम से लोक में प्रसिद्ध है ॥२६॥
मधुको मधुरे श्रेष्ठः करञ्जः कटुके तथा। निम्बः स्यात्तिक्तके श्रेष्ठः कषाये खदिरस्तथा ।।२७।।
समयं तु समालोक्य दोषं च प्रकृतिं तथा। यथौचितै रसैर्वीर्यैर्युक्तं द्रव्यं प्रयोजयेत् ।। २८ ।।
तेनास्य मुखवैरस्यदन्तजिह्वाऽऽस्यजा गदाः। रुचिवैशद्यलघुता न भवन्ति भवन्ति च ।। २९ ।।
अर्के वीर्ये वटे दीप्तिः करञ्जे विजयो भवेत्। प्लक्षे चैवार्थसम्पत्तिर्वैदर्या मधुरोध्वनिः १ ।। ३० ।।
खदिरे मुखसौगन्ध्यं बिल्वे तु विपुलं धनम्। उदुम्बरे तु वाक्सिद्धिराम्रे त्वारोग्यमेव च ।।३१।।
कदम्बे तु धृतिर्मेधा चम्पके च दृढा२ मतिः। शिरीषे कीर्तिसौभाग्यमायुरारोग्यमेव च ।।३२।।
अपामार्गे धृतिर्मेधा प्रज्ञाशक्तिस्तथाऽसने३। दाडिभ्यां सुन्दराकारः ककुभे कुटजे तथा ।। ३३ ।।
जातीतगरमन्दारैर्दुःस्वप्नं च विनश्यति ।।३४।।
मीठी दातौन में महुआ, कटु रस में करञ्ज, तिक्तरस में नीम और कषाय (कसैला) रस में खैर की दातौन उत्तम
होती है। समय, दोष तथा प्रकृति को समझकर उसके योग्य रस और वीर्य (शीत अथवा उष्ण) से युक्त जो द्रव्य हो
उसी का दाँत साफ करने के समय प्रयोग करे। ऐसा करने से मुख की विरसता, दाँत, जीभ तथा मुख में उत्पन्न होने
वाले रोग नहीं होते तथा भोजन करने में रुचि, मुख की स्वच्छता और शरीर में लघुता (हल्कापन) होती है। मदार की
दातौन करने से वीर्य (शक्ति), बड़ की दातौन से दीप्ति, करञ्ज की दातौन से विजय, पाकर की दातौन से धन-संपत्ति,
बेर की दातौन से मधुर ध्वनि (मीठी आवाज), खैर की दातौन से मुख में सुगन्धि, बेल की दातौन से विपुल धन, गूलर
की दातौन से वाक्सिद्धि (जो बात कहे उसका सिद्ध होना), आम की दातौन से आरोग्य, कदम्ब की दातौन से धैर्य तथा
१. 'मधुराशनः' इति पा. । २. 'दृढवाक्श्रुति'रिति पा. ।
३. 'तथा ध्वनि'रिति पा. ।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११३
मेधा (धारणा शक्ति), चम्पक की दातौन से दृढ़ बुद्धि (स्थिर बुद्धि), सिरस की दातौन से कीर्ति, सौभाग्य, आयु तथा
आरोग्य, चिरचिटा (चिचिड़ा) की दातौन से धैर्य तथा मेधा, विजयसार की दातौन से प्रज्ञा शक्ति (समझने की शक्ति),
अनार, अर्जुन तथा कटुज (कुरैया) की दातौन से सुन्दर आकृति तथा चमेली, तगर और मदार की दातौन करने से दुःस्वप्न
का नाश होता है ॥२७-३४॥
गुर्वाकस्तालहिन्तालौ केतकश्च बृहत्तृणः। खर्जूरं नारिकेलं च सप्तैते तृणराजकाः ॥३५॥
तृणराजसमुत्पन्नं यः कुर्याद्दन्तधावनम्। नरश्चाण्डालयोनिः स्याद्यावद्गङ्गां न पश्यति ॥३६॥
सुपारी, ताल, हिंताल, केतकी, बाँस, खजूर और नारियल के वृक्ष 'तृणराज' कहलाते हैं। इन तृणराज संज्ञक
वृक्षों की जो दातौन करता है, वह जब तक गंगा का दर्शन नहीं करता तब तक चाण्डालों की भाँति अस्पृश्य (अछूत)
बना रहता है ॥३५-३६॥
न खादेद्गलताल्वोष्ठजिह्वादन्तगदेषु तत्। मुखस्य पाके शोथे च श्वासकासवमीषु च ॥३७॥
गला, तालु, ओठ, जिह्वा और दाँत सम्बन्धी रोग होने पर और मुख के पकने तथा शोथ होने पर तथा श्वास, कास
एवं वमन होने पर काठ की दातौन नहीं करनी चाहिये ॥३७॥
दुर्बलोऽजीर्णभुक्तश्च हिक्कामूर्च्छामदान्वितः। शिरोरुजार्त्तस्तृषितः श्रान्तः पानक्लमान्वितः ॥३८॥
अर्दितः कर्णशूली च नेत्ररोगी नवज्वरी। वर्जयेद्दन्तकाष्ठं तु हृदामययुतोऽपि च ॥३९॥
जो दुर्बल हो तथा भोजन किया हुआ अन्न जिसका परिपक्व न हुआ हो और हिचकी, मूर्च्छा, और मद रोग (मद
पीने से उत्पन्न रोग) से युक्त हो, शिर की पीड़ा से दुःखी, प्यासा, परिश्रम करने से थका हुआ और मद्यपान करने से क्लान्त
हुआ हो तथा जो वायु सम्बन्धी अर्दित रोग से युक्त हो और कर्णशूल, नेत्रसम्बन्धी रोग, नवीन ज्वर तथा हृद्रोग से युक्त
हो वह काष्ठ की दातौन करना छोड़ दे ॥३८-३९॥
अजीर्णभुक्तः-न जीर्णं भुक्तं यस्य सः ॥३८-३९॥
'अजीर्णभुक्तः' से 'जिसका भोजन किया हुआ अन्न न पचा हो' यह अर्थ समझना चाहिये ॥३८-३९॥
अथ जिह्वानिर्लेखनमाह-
जिह्वानिर्लेखनं हैमं राजतं ताम्रजं तथा। पाटितं मृदु तत्काष्ठं मृदुपत्रमयं तथा ॥४०॥
दशाङ्गुलं मृदु स्निग्धं तेन जिह्वां लिखेत्सुखम्। तज्जिह्वामलवैरस्यदुर्गन्ध्यजडताहरम् ॥४१॥
जीभ सफा करने की विधि-सोना, चाँदी अथवा ताँबे की बनी जीभी से जीभ सफा करना चाहिये। अथवा
१० अङ्गुल परिमित दाँत साफ करने के लिये काठ की जिस दातौन को काम में लिया हो, उसी को चीर कर उसके
द्वारा जीभ छीले किंवा दश अंगुल परिमित स्निग्ध (चिक्कन) और कोमल पल्लवों से बनी हुई जो जीभी हो उससे सुखपूर्वक
जीभ छीले किन्तु इतना न छीले कि रक्त निकल आवे और दुःख मालूम पड़े, इस प्रकार से जीभ छीलने से जीभ का
मल, विरसता, दुर्गन्ध एवं जड़ता दूर होती है ॥४०-४१॥
❖ तत्काष्ठं दन्तशोधनयोग्यं काष्ठम् ॥४०-४१॥
'तत्काष्ठम्' अर्थात् दाँत साफ करने के योग्य जो काठ की दातौन काम में ली हो, उसीको (ले) ॥४०-४१॥
अथ मुखगण्डूषमाह-
गण्डूषमपि कुर्वीत शीतेन पयसा मुहुः। कफतृष्णामलहरं मुखान्तःशुद्धिकारकम् ॥४२॥
सुखोष्णोदकगण्डूषः कफारुचिमलोपहः। दन्तजाड्यहरश्चापि मुखलाघवकारकः ॥४३॥
११ भाव.I
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

११४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
कुल्ला करने की विधि—दाँत साफ करने और जीभी करने के बाद शीतल जल से बारंबार गण्डूष (कुल्ला)
भी करे, इससे कफ, प्यास और मुख का मल दूर होता है तथा मुख के भीतर की शुद्धि होती है। थोड़े गरम जल से
कुल्ला करने से कफ, अरुचि, मुख का मल तथा दाँतों की जड़ता दूर होती है एवं मुख हल्का होता है ॥४२-४३॥
विषमूूर्च्छामदार्त्तानां शोषिणां रक्तपित्तिनाम्। कुपिताक्षमलक्षीणरूक्षाणां स न शस्यते ॥४४॥
जो विष, मूर्च्छा और मद से पीड़ित हों तथा शोष और रक्त पित्त रोग से युक्त हों एवं जिनकी आँखें कुपित हों
अर्थात् उठ आई हों, मल क्षीण हो गया हो तथा जो रूखे शरीरवाले हों ऐसे लोगों को थोड़े गरम जल से कुल्ला करना
हितकर नहीं होता है ॥४४॥
❖ सः=सुखोष्णोदकगण्डूषः ॥४४॥
‘सः’ अर्थात् ‘थोड़े गरम जल से कुल्ला करना’ ॥४४॥
मुखप्रक्षालनं शीतपयसा रक्तपित्तजित्। मुखस्य पिडिकाशोषनीलिकाव्यङ्गनाशनम् ॥४५॥
कुर्याद्वाऽपि कदुष्णेन पयसाऽऽस्यविशोधनम्। कफवातहरं स्निग्धं मुखशोषविनाशनम् ॥४६॥
शीतल जल से मुख प्रक्षालन करने से रक्तपित्त, मुख की पिडकायें (मुहासे), शोष, नीलिका और व्यङ्ग (झाईं)
ये सब रोग नष्ट होते हैं और थोड़े गरम जल से मुख प्रक्षालन करने से मुख की शुद्धि, कफ और वात का नाश, स्निग्धता,
और मुख का शोष नष्ट होता है ॥४५-४६॥
कटुतैलादि नस्यार्थे नित्याभ्यासेन योजयेत्। प्रातः श्लेष्मपि मध्याह्ने पित्ते सायं समीरणे ॥४७॥
सुगन्धवदनाः स्निग्धनिःस्वना विमलेन्द्रियाः। निर्बलीपलितव्यङ्गा भवेयुर्नस्यशीलिनः ॥४८॥
नस्य लेने की विधि—प्रतिदिन अभ्यास करके सर्षप (कडुये) तेल आदि का नस्य कफ की अधिकता हो तो
प्रातःकाल, पित्त की अधिकता हो तो दोपहर और वात की अधिकता हो तो सायंकाल में लेवे। जो लोग नित्य नस्य
लेनेवाले होते हैं, उनका मुख सुगन्धित, स्वर (आवाज) स्निग्ध और इन्द्रियाँ विमल होती हैं और उन्हें असमय में
वली (शरीर में सिकुड़न पड़ना), पलित, (बिना समय बालों का सफेद होना) और व्यङ्ग (झाईं) ये सब नहीं
होते हैं ॥४७-४८॥
अथाञ्जनविधिमाह-
सौवीरमञ्जनं नित्यं हितमक्ष्णोस्ततो भजेत्। लोचने भवतस्तेन मनोज्ञे सूक्ष्मदर्शने ॥४९॥
अञ्जन लगाने की विधि—सौवीर (सफेद सुरमा) का नित्य अञ्जन करना आँखों के लिये हितकर होता है, इसका
सेवन करने से आँखें सुन्दर तथा सूक्ष्म वस्तुओं को भी देखने वाली होती हैं॥
सौवीरं=श्वेतसुरमा इति लोके प्रसिद्धम् ॥४९॥
‘सौवीर’ से ‘लोक में प्रसिद्ध सफेद सुरमा’ का ग्रहण होता है ॥४९॥
स्रोतोऽञ्जनं मतं श्रेष्ठं विशुद्धं सिन्धुसम्भवम्। दृष्टेः कण्डूमलहरं दाहक्लेदरुजापहम् ॥५०॥
अक्ष्णो रूपावहं चैव सहते मारुतातपौ। नेत्रे रोगा न जायन्ते तस्मादञ्जनमाचरेत् ॥५१॥
सिन्धु नामक पर्वत में उत्पन्न होने वाले बिना शुद्ध किये हुये भी स्रोतोऽञ्जन (कालासुरमा) श्रेष्ठ है क्योंकि—वह
आँखों की खुजली, मल (कीचड़), दाह, क्लेद (नेत्रों से पानी बहना) और पीड़ा इन सबों को दूर करता है तथा नेत्रों को
सुन्दर बनाता है और वायु तथा धूप के सहन करने में समर्थ भी करता है। उससे नेत्र सम्बन्धी कोई रोग उत्पन्न नहीं होते
हैं अतएव इसका अञ्जन करना चाहिये ॥५०-५१॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११५
❖ स्रोतोऽञ्जनं=कृष्णासुर्मा इति लोके। विशुद्धं शोधनं विनाऽपि। सिन्धुसम्भवं=सिन्धुनामा पर्वतस्तत्र
सम्भवम् ॥५०-५१॥
'स्रोतोऽञ्जन' से 'काला सुरमा' और 'विशुद्ध' से 'बिना शोधा हुआ भी' तथा 'सिन्धुसंभव' से 'सिन्धु नामक पर्वत
में उत्पन्न होने वाला, यह अर्थ समझना चाहिये ॥५०-५१॥
अथाञ्जनायोग्यजनानाह-
रात्रौ जागरितः श्रान्तश्छर्दितो भुक्तवांस्तथा। ज्वरातुरः शिरः स्नातो नाक्ष्णोरञ्जनमाचरेत् ।।
अञ्जन लगाने के अयोग्य व्यक्ति—जो रात में जागा हुआ तथा थका हुआ और जिसे वमन हुआ हो एवं जो
भोजन करके उठा हो तथा ज्वर से पीड़ित और शिर से स्नान किया हुआ हो उसे आँखों में अञ्जन नहीं लगाना
चाहिये ॥५२॥
अथ नखादिकर्त्तनविधिमाह-
पञ्चरात्रान्नखश्मश्रुकेशरोमाणि कर्त्तयेत्। केशश्मश्रुनखादीनां कर्त्तनं सम्प्रसाधनम् ।।
पौष्टिकं धन्यमायुष्यं शौचकान्तिकरं परम् ।।५३।।
नाखून कटाने और बाल बनवाने की विधि—पाँच रात्रि व्यतीत होने के बाद नख, दाढ़ी, मूछ, केश (शिर
के बाल) और रोम कतरवावे (हजामत बनवावे) क्योंकि—केश, दाढ़ी, मूछ और नख आदि का कतरवाना अत्यन्त
शोभाजनक, पुष्टिकारक, धन्य (धन प्राप्ति का कारण), आयु को बढ़ाने वाला, पवित्रता तथा कान्ति को उत्पन्न करनेवाला
होता है ॥५३॥
❖ सम्प्रसाधनं=शोभाजनकम् ।।५३।।
'सम्प्रसाधन' का अर्थ है 'शोभाजनक' ॥५३॥
अथ नासालोमोत्पाटने दोषमाह-
उत्पाटयेत्तु लोभानि नासाया न कदाचन। तदुत्पाटनतो दृष्टेदौर्बल्यं त्वरया भवेत् ।।५४।।
नाक के बाल उखाड़ने में दोष—नाक के बाल कभी नहीं उखाड़ना चाहिये, क्योंकि, उसके उखाड़ने से शीघ्र
ही आँखों में दुर्बलता आ जाती है ॥५४॥
अथ केशप्रसाधनगुणानाह-
केशपाशे प्रकुर्वीत प्रसाधन्या प्रसाधनम्। केशप्रसाधनं केश्यं रजोजन्तुमलापहम् ।।५५।।
केशों को कङ्घी से साफ करने के गुण—प्रसाधनी (कङ्घी) द्वारा केश पाश (केशसमूह) का प्रसाधन (सफा)
करे क्योंकि केशों का प्रसावन (कंघी से सफा करना केशों के लिये हितकारी तथा धूलि और जन्तु (बालों में मैल के
कारण उत्पन्न ढीलों वगैरह जन्तु) तथा मल को दूर करनेवाला है ॥५५॥
अथ दर्पणालोकनगुणानाह-
आदर्शालोकनं प्रोक्तं मङ्गल्यं कान्तिकारकम्। पौष्टिकं बल्यमायुष्यं पापालक्ष्मीविनाशनम् ।।५६।।
दर्पण में मुख देखने के गुण—दर्पण में मुख देखना मङ्गलप्रद, कान्तिकारक, पुष्टिकारक, बलदायक, आयु
बढ़ानेवाला और पाप तथा दरिद्रता को दूर करने वाला होता है ॥५६॥
अथ व्यायामगुणानाह-
लाघवं कर्मसामर्थ्यं विभक्तघनगात्रता। दोषक्षयोऽग्निवृद्धिश्च व्यायामादुपजायते ।।५७।।
व्यायामाद्दृढगात्रस्य व्याधिर्नास्ति कदाचन। विरुद्धं वा विदग्धं वा भुक्तं शीघ्रं विपच्यते ।।५८।।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

११६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
भवन्ति शीघ्रं नैतस्य देहे शिथिलतादयः । न चैवं सहसाऽऽक्रम्य जरा समधिरोहति ।।५९।।
न चास्ति सदृशं तेन किञ्चित्स्थौल्यापकर्षकम् । स सदा गुणमाधत्ते वलिनां स्निग्धभोजिनाम् ।।६०।।
वसन्ते शीतसमये सुतरां स हितो मतः । अन्यदाऽपि च कर्त्तव्यो बलार्धेन यथा बलम् ।।६१।।
व्यायाम (कसरत) के गुण-व्यायाम करने से शरीर की लघुता, कार्य करने में सामर्थ्य, शरीर के प्रत्येक अवयव
दृढ़ एवं परस्पर सुविभक्त, बढ़े हुये दोषों का क्षय तथा जठराग्नि की वृद्धि होती है । व्यायाम करने से जिनके अङ्ग दृढ़
हो गये हैं उन्हें कभी कोई व्याधियाँ नहीं उत्पन्न होतीं और भोजन किया हुआ अन्न चाहे वह विरुद्ध अथवा विदग्ध
(अर्धपरिपक्व) हो सभी प्रकार का शीघ्र पच जाता है । उसके शरीर में शीघ्रता से शिथिलता आदि नहीं उत्पन्न होती, उसे
जरा (वृद्धावस्था) भी सहसा आकर नहीं दबाती । व्यायाम के समान स्थूलता को दूर करनेवाला दूसरा कोई उपाय नहीं
है । व्यायाम सदैव बलवान् तथा घृतादि स्निग्ध पदार्थ भक्षण करनेवाले पुरुषों के लिये गुण दायक होता है । बसन्त तथा
शीत काल में व्यायाम अत्यन्त हितकारी माना गया है । किन्तु अन्य काल में भी बलानुसार बलार्ध से व्यायाम अवश्य
करना चाहिये ।।५७-६१।।
अथ बलार्धस्य लक्षणमाह-
हृदयस्थो यदा वायुर्वक्त्रं शीघ्रं प्रपद्यते । मुखं च शोषं लभते तद्बलार्धस्य लक्षणम् ।।६२।।
किं वा ललाटे नासायां गात्रसन्धिषु कक्षयोः । यदा सञ्जायते स्वेदो बलार्धं तु तदादिशेत् ।।६३।।
बलार्ध का लक्षण-हृदयस्थित प्राण वायु जब मुख की ओर शीघ्र-शीघ्र आने लगे तथा मुख सूखने लगे तब
बलार्ध का लक्षण हुआ समझना चाहिये, अथवा जब ललाट, नासिका तथा शरीर को सन्धियों में एवं काँखों में पसीना
होने लगे तब बलार्ध का लक्षण समझना चाहिये । अतः इन सब लक्षणों के प्रकट होने पर व्यायाम बन्द कर देवें ।।६२-
६३।।
अथ व्यायामायोग्यजनानाह-
भुक्तवान्कृतसम्भोगः कासी श्वासी कृशः क्षयी । रक्तपित्ती क्षती शोषी न तं कुर्यात्कदाचन ।।
व्यायाम करने के अयोग्य जन-जो लोग भोजन तथा स्त्री के साथ संभोग किये हुए हों और कास, श्वास तथा
क्षय रोग से युक्त एवं दुर्बल हों तथा रक्तपित्त, क्षत (घाव) तथा शोष रोग से युक्त हों वे कभी व्यायाम न करें ।।६४।।
अथातिव्यायामदोषनाह-
अतिव्यायामतः कासो ज्वरश्छर्दिः श्रमः क्लमः । तृष्णाक्षयः प्रतमको रक्तपित्तं च जायते ।।६५।।
अत्यन्त व्यायाम करने से दोष-अत्यन्त व्यायाम करने से कास, ज्वर, श्रम, क्लान्ति, प्यास, क्षय,
प्रतमकश्वास और रक्त-पित्त में रोग उत्पन्न होते हैं ।।६५।।
अथाभ्यङ्गगुणानाह-
अभ्यङ्गं कारयेन्नित्यं सर्वेष्वङ्गेषु पुष्टिदम् । शिरः श्रवणपादेषु तं विशेषेण शीलयेत् ।।६६।।
तेल लगाने के गुण-सम्पूर्ण अङ्गों में अभ्यङ्ग (तेल की मालिश) नित्य कराना चाहिये, क्योंकि यह पुष्टिकारक
है, उसमें भी विशेष कर शिर, कान और पैर में तो अवश्य नित्य तैल लगाना तथा डालना चाहिये ।।६६।।
सार्षपं गन्धतैलं च यत्तैलं पुष्पवासितम् । अन्यद्रव्ययुतं तैलं न दुष्यति कदाचन ।।६७।।
सरसों का तेल, गन्ध तैल, (सुगन्धित द्रव्यों से निकाला हुआ तैल) और जो तैल फूलों से बसाया हुआ हो जैसे
बेला, चमेली आदि का तैल अथवा जो अन्य द्रव्य से युक्त तैल हो वह कभी दोष कारक नहीं होता है ।।६७।।

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् ११७
❖ गन्धतैलं=गन्धद्रव्याणामगुर्वादीनामग्नियोगेन निष्कासितः स्नेहः ।।६७।।
'गन्धतैल' से सुगन्ध युक्त जो अगर आदि द्रव्य हैं, उनका अग्नि के योग से निकाला हुआ तेल' यह अर्थ समझना
चाहिये ।।६८।।
अथ सर्वाङ्गेष्वभ्यङ्गगुणानाह-
अभ्यङ्गो वातकफहच्छ्रमशान्तिबलं सुखम्। निद्रावर्णमृदुत्वायुष्कुरुते देहपुष्टिकृत् ।।६८।।
सर्वाङ्ग में तैल लगाने के गुण—सम्पूर्ण अङ्गों में अभ्यङ्ग करना वात, कफ का हरण करने वाला, श्रम को
दूर करने वाला तथा शरीर बल, सुख, निद्रा, वर्ण, कोमलता और आयु को करने वाला एवं अङ्गों को पुष्ट करनेवाला
होता है ।।६८।।
अथ शिरस्यभ्यङ्गगुणानाह-
अभ्यङ्गः शीलितो मूर्ध्नि सकलेन्द्रियतर्पकः। दृष्टितुष्टिकरो हन्ति शिरोभूमिगतानगदान् ।।
केशानां बहुतां दार्ढ्यं मृदुतां दीर्घतां तथा। कृष्णतां कुरुते कुर्याच्छिरसः पूर्णतामपि ।।७०।।
शिर में तेल लगाने के गुण—शिर में नित्य तैल लगाने से सम्पूर्ण इन्द्रियों का सन्तर्पण करने वाला, दर्शनशक्ति
को पुष्ट करनेवाला और शिर में होने वाले सभी रोगों को दूर करने वाला तथा केशों की अधिकता, दृढ़ता, कोमलता,
दीर्घता (लम्बे होना), कृष्णता (काला होना) तथा मस्तिष्क की पूर्णता भी करता है ।।६९-७०।।
अथ कर्णयोस्तैलपूरणगुणानाह-
न कर्णरोगा न मलं न च मन्याहनुग्रहः। नोच्चैः श्रुतिर्न बाधिर्यं स्यान्नित्यं कर्णपूरणात् ।।७१।।
कानों में तेल डालने के गुण—कानों में नित्य तेल डालने से कान में कोई फुन्सी आदि रोग नहीं होते हैं, न
मैल रहता है और न मन्याग्रह (मन्यानामकं शिराओं का जकड़ जाना) अथवा हनुग्रह (हनुका जकड़जाना) नामक रोग उत्पन्न
होता है एवं ऊँचे सुनना अथवा बाधिर्य (बहरापन) ये सब रोग नहीं होते हैं ।।७१।।
अथ कर्णयोस्तैलादिपूरणस्य योग्यसमयमाह-
रताद्यैः पूरणं कर्ण भोजनात्प्राक्प्रशस्यते। तैलाद्यैः पूरणं कर्णे भास्करेऽस्तमुपागते ।।७२।।
कान में तेल डालने का समय—कान में किसी द्रव्य का रस डालना भोजन करने के पहले और सूर्य के अस्त
होने पर (रात में) ही उत्तम होता है ।।७२।।
अथ पादाभ्यङ्गगुणानाह-
पादाभ्यङ्गश्च तत्स्थैर्यनिद्रादृष्टिप्रसादकृत् । पादसुप्तिश्रमस्तम्भसङ्कोचस्फुटनप्रणुत् ।।७३।।
व्यायामक्ष्णुणवपुषं पद्भ्यां सम्मर्दितं तथा। व्याधयो नोपसर्पन्ति वैनतेयमिवोरगाः ।।७४।।
पैरों में तेल लगाने के गुण—पैरों में तेल लगाना पैरों की स्थिरता, निद्रा तथा नेत्र की प्रसन्नता (निर्मलता) करता
है और पैर का सुन्न हो जाना, श्रान्ति (थकावट), जकड़ जाना, सङ्कुचित हो जाना, बेवाय फटना इन सबों को दूर करता
है। पैरों से व्यायाम (बैठकी) करने से तथा शरीर के थक जाने पर पैरों में तेल की मालिश कराने से रोग इस भाँति पास
नहीं आते जैसे गरुड़ के पास सर्प नहीं आते हैं ।।७३-७४।।
अथ स्नेहयुक्तावगाहनगुणानाह-
लोमकूपशिराजालधमनीभिः१ कलेवरे। तर्पयेद्बलमाधत्ते २स्नेहयुक्तोऽवगाहने ।।७५।।
अद्भिः संसिक्तमूलानां तरूणां पल्लवादयः। बर्द्धन्ते हि तथा नृणां स्नेहसंसिक्तधातवः ।।७६।।
१. 'लोमकूपं शिराजालं धमनीभि'रिति पा. । २. 'स्नेहे' इति पा.।
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

१९८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
शरीर में तेल लगाकर स्नान करने के गुण—शरीर में तेल लगाकर स्नान करने पर वह तेल रोमकूप, शिराओं
का समूह और धमनियों के द्वारा शरीर में सञ्चारित होकर शरीर को तर्पित और बलिष्ठ करता है। जल से जिनके मूल
सींचे गये हुये हैं, ऐसे वृक्षों के पल्लवादि जैसे बढ़ते हैं वैसे ही मनुष्यों के रक्तादि सम्पूर्ण धातु भी तेल की मालिश करने
से बढ़ते हैं ।।७५-७६।।
अथाभ्यङ्गायोग्यजनानाह-
नवज्वरी अजीर्णी च नाभ्यक्तव्यः कथञ्चन। तथा विरिक्तो वान्तश्च निरूढो यश्च मानवः ।।६६।।
अभ्यङ्ग के अयोग्य जन—जो नवीन ज्वर और अजीर्ण रोग से युक्त हो, जिसने जुलाब लिया हो, जिसे दस्त
होते हों अथवा वमन हुआ हो और जिसे निरूह वस्ति दी गई हो ऐसे मनुष्य को कभी तेल की मालिश नहीं करनी
चाहिये ।।७७।।
❖ निरूढः=दत्तो निरूहवस्तिर्यस्मै सः ।।७७।।
'निरूढ' पद का 'जिसे निरूहवस्ति दी गई हो' वह अर्थ समझना चाहिये ।।७७।।
पूर्वयोः कृच्छ्रता व्याधेरसाध्यत्वमथापि वा। शेषाणां च त्विह प्रोक्ता वह्निसादादयो गदाः ।।
नवीन ज्वर तथा अजीर्ण रोगवाले दोनों रोगी यदि तैल की मालिश करावें तो उनके रोग कष्ट साध्य अथवा असाध्य
हो जाते हैं और बाकी बचे हुये जो विरक्ति, वान्त और निरूढ़ रोगी हैं वे यदि तैल की मालिश करावें तो उनको अग्निमान्द्य
(जठराग्नि का मन्द हो जाना) आदि रोग हो जाते हैं ।।७८।।
❖ पूर्वयोः=तरुणज्वरिणोऽजीर्णिनश्च ।।७८।।
'पूर्वयोः' इस पद से 'पूर्व के ७७ वें श्लोक के आरम्भ में कहे हुये नवीन ज्वर तथा अजीर्ण रोगवाले इन दो रोगियों'
का ग्रहण करना चाहिये ।।७८।।
अथोद्वर्त्तनगुणानाह-
उद्वर्त्तनं कफहरं मेदोघ्नं शुक्रदं परम्। बल्यं शोणितकृच्चापि त्वक्प्रसादमृदुत्वकृत् ।।७९।।
मुखलेपाद्दृढं चक्षुः पीनो गण्डस्तथाऽऽननम्। कान्तमव्यङ्गपिडकं भवेत्कमलसन्निभम् ।।८०।।
उद्वर्त्तन (उबटन) लगाने के गुण—उद्वर्त्तन, कफ को हरण करनेवाला, मेद का नाशक, अत्यन्त वीर्यवर्धक,
बलदायक, रक्त उत्पन्न करने वाला, त्वचा को निर्मल तथा कोमल करने वाला होता है। मुख में उबटन लगाने से नेत्र
दृढ़ अर्थात् तीक्ष्ण दृष्टि होती है और गण्डस्थल मोटा तथा मुख झाईं मुहासे रहित होकर कमल की भाँति सुन्दर हो जाता
है ।।७९-८०।।
अथ स्नानविधिमाह-
दीपनं वृष्यमायुष्यं स्नानमोजोबलप्रदम्। कण्डूमलश्रमस्वेदतन्द्रातृड्दाहपाप्मनुत् ।।८१।।
बाह्यैश्च सेकैः शीताद्यैरूष्माऽन्तर्याति पीडितः। नरस्य स्नानमात्रस्य दीप्यते तेन पावकः ।।८२।।
शीतेन पयसा स्नानं रक्तपित्तप्रशान्तिकृत्। तदेवोष्णेन तोयेन बल्यं वातकफापहम् ।।८३।।
शिरः स्नानमचक्षुष्यमत्युष्णेनाम्बुना सदा। वातश्लेष्मप्रकोपे तु हितं तच्च प्रकीर्त्तितम् ।।८४।।
स्नान की विधि—स्नान अग्नि को दीप्त करनेवाला, वृष्य (वीर्यवर्धक), आयु को बढ़ानेवाला, ओज तथा बल
को देनेवाला, खुजली, मल, श्रम, पसीना, तन्द्रा, प्यास, दाह और पाप को दूर करनेवाला है। बाहर से शीतल जल
का सेवन करने से शरीर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती किन्तु लौट कर शरीर के अन्दर ही चली जाती है। अतएव
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १९९.
स्नान करते ही तुरन्त जठराग्नि दीप्त हो उठती है। शीतल जल से स्नान रक्तपित्त को शान्त करता है वही स्नान यदि
गर्म जल से किया जाय तो बलदायक तथा वात और कफ का नाशक होता है। यदि शिर पर डाल कर अत्यन्त गर्म
जल से सदा स्नान किया जाय तो नेत्रों के लिये अहितकर होता है किन्तु वात कफ के प्रकुपित होने पर उसी को ऋषियों
ने हितकारी बतलाया है ॥८१-८४॥
अशीतेनाम्भसा स्नानं पयःपानं नवाःस्त्रियः । एतद्भो मानवाः पथ्यं स्निग्धमल्पं च भोजनम् ॥८५॥
उष्णजल से स्नान करना, दूध पीना, नवीन स्त्री के साथ संभोग करना, स्निग्ध (घृतादि पदार्थ मिश्रित) और स्वल्प
भोजन करना लोगों के लिये हितकर है ॥८५॥
हरिश्चन्द्रस्यैतत् ॥८५॥
यह (८५) श्लोकोक्ति 'हरिश्चन्द्र' का है ॥८५॥
अथामलकैः स्नानस्य गुणानाह-
यः सदाऽऽमलकैः स्नानं करोति स विनिश्चितम् । बलीपलितनिर्मुक्तो जीवेद्वर्षशतं नरः ॥८६॥
आँवला मिश्रित जल के गुण—जो मनुष्य आँवला मिले हुये जल से अथवा आँवला लगा कर सदा स्नान करता
है वह निश्चय बली और पलित से मुक्त होकर सौ वर्ष जीता है ॥८६॥
अथ स्नानानर्हजनानाह-
स्नानं ज्वरेऽतिसारे च नेत्रकर्णानिलार्तिषु । आध्मानपीनसाजीर्णभुक्तवत्सु च गर्हितम् ॥८७॥
स्नान करने के अयोग्य जन—जिनको ज्वर या अतिसार हो या नेत्र तथा कानों में पीड़ा होती हो अथवा वात
सम्बन्धी पीड़ा होती हो किंवा आध्मान (अफारा), पीनस अथवा अजीर्ण रोग हुआ हो और जो भोजन कर चुका हो, ऐसे
लोगों के लिये स्नान करना अनुचित है ॥८७॥
अथ स्नानोत्तरं वस्त्रेणाङ्गमार्जनस्य गुणानाह-
स्नानस्यानन्तरं सम्यग्वस्त्रेणाङ्गस्य मार्जनम्। कान्तिप्रदं शरीरस्य कण्डूत्वग्दोषनाशनम् ॥८८॥
स्नान करने के बाद अँगोछे से देह पोंछने के गुण—स्नान के बाद वस्त्र (अँगोछे) से अच्छी तरह अङ्गों का
पोंछना—शरीर में कान्ति उत्पन्न करनेवाला तथा खुजली, एवं त्वग् गत दोषों को दूर करने वाला होता है ॥८८॥
अथ वस्त्रधारणगुणानाह, तत्रादौ शीतकाले धारणार्हवस्त्राणि तद गुणवर्णनपूर्वकमाह-
कौशेयोर्णिकवस्त्रं च रक्तवस्त्रं तथैव च। वातश्लेष्महरं तत्तु शीतकाले विधारयेत् ॥८९॥
वस्त्र धारण करने का विधान—शीत ऋतु में कौशेय वस्त्र (पीताम्बर और तसर) तथा ऊनी वस्त्र एवं लाल
वस्त्र ये सब वात तथा कफ को दूर करनेवाले हैं अत एव शीत काल में इन सबों को धारण करना चाहिये ॥८९॥
कौशेयं=पट्टाम्बरं तसरवस्त्रं च ॥८९॥
'कौशेय' पद से पट्टवस्त्र (पीताम्बर) और 'तसर वस्त्र' का ग्रहण होता है ॥८९॥
अथोष्णकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह-
मेध्यं सुशीतं पित्तघ्नं कषायं वस्त्रमुच्यते । तद्धारयेदुष्णकाले तत्रापि लघु शस्यते ॥९०॥
CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA

१२० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे
ग्रीष्म ऋतु में वस्त्र धारण करने का विधान—कषाय वस्त्र-पवित्र, सुशीतल और पित्त का नाशक कहा हुआ
है, अतएव इसे उष्ण काल में धारण करना चाहिये। उसमें भी जो लघु अर्थात् पतला कषाय वस्त्र हो वह ग्रीष्मकाल
में अधिक प्रशस्त होता है ॥९०॥
❖ कषायं=कौङ्कुमी इति लोके। कषायरागरक्तं वा ॥९०॥
'कषाय' पद से 'कौङ्कुमी' (कुमकुम) नाम से प्रसिद्ध अथवा जोगिया रंग का ग्रहण करना चाहिये ॥९०॥
अथ वर्षाकाले धारणार्हवस्त्राणि तद्गुणाँश्चाह-
शुक्लं तु शुभदं वस्त्रं शीतातपनिवारणम्। न चोष्णं न च वा शीतं तत्तुवर्षासु धारयेत् ।।९१।।
वर्षाकाल में धारण करने योग्य वस्त्र—(सफेद) शुक्ल शुभ को देने वाला, शीत तथा आतप का निवारण
करने वाला है। यह न तो उष्ण है और न शीतल ही है अत एव ऐसा ही वस्त्र वर्षा काल में धारण करना चाहिये ॥९१॥
**अथ नवनि

अथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२१
❖ घनसारः=कर्पूरः, बालकम्=ह्रीबेरम् ।। ९५ ।।
'घनसार' से 'कर्पूर' तथा 'बालक' से 'ह्रीबेर' (सुगन्धबाला) समझना चाहिये ।। ९५ ।।
अथ वर्षाकाले प्रलेपार्हद्रव्यगुणानाह-
चन्दनं घुसुणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् । न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले तदिष्यते ।। ९६ ।।
वर्षाकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य—केशर और कस्तूरी से युक्त चन्दन का प्रलेप वर्षाकाल में प्रशस्त होता
है। क्योंकि यह न तो शीतल होता है और न उष्ण होता है ।। ९६ ।।
घुमृणं=कुङ्कुमम् । मृगनाभिः=कस्तूरी ।। ९६ ।।
'घुसृण' से 'कुङ्कुम' (केशर) और 'मृगनाभि' से 'कस्तूरी' का ग्रहण करना चाहिये ।। ९६ ।।
अथ सामान्यतोऽनुलेपगुणवर्णनपूर्वकं तदनर्हजनमप्याह-
अनुलेपस्तृषामूर्च्छादुर्गन्धस्वेददाह