भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ पञ्चम दिनचर्यादिप्रकरणम् १२१
❖ घनसारः=कर्पूरः, बालकम्=ह्रीबेरम् ।। ९५ ।।
'घनसार' से 'कर्पूर' तथा 'बालक' से 'ह्रीबेर' (सुगन्धबाला) समझना चाहिये ।। ९५ ।।
अथ वर्षाकाले प्रलेपार्हद्रव्यगुणानाह-
चन्दनं घुसुणोपेतं मृगनाभिसमायुतम् । न चोष्णं न च वा शीतं वर्षाकाले तदिष्यते ।। ९६ ।।
वर्षाकाल में प्रलेप के योग्य द्रव्य—केशर और कस्तूरी से युक्त चन्दन का प्रलेप वर्षाकाल में प्रशस्त होता
है। क्योंकि यह न तो शीतल होता है और न उष्ण होता है ।। ९६ ।।
घुमृणं=कुङ्कुमम् । मृगनाभिः=कस्तूरी ।। ९६ ।।
'घुसृण' से 'कुङ्कुम' (केशर) और 'मृगनाभि' से 'कस्तूरी' का ग्रहण करना चाहिये ।। ९६ ।।
अथ सामान्यतोऽनुलेपगुणवर्णनपूर्वकं तदनर्हजनमप्याह-
अनुलेपस्तृषामूर्च्छादुर्गन्धस्वेददाह