भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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शौच (पुरीषोत्सर्गादि) के समय अन्य कार्य नहीं करे और न शौच के वेग को बलात् रोके। वेग रोकने के विषय
में केवल काम, शोक, भय, क्रोध तथा मन के वेग को अवश्य रोकना चाहिये। गुदा आदि जो मलादि के निकलने के
मार्ग हैं, उनका सफा रखना कान्ति, बल तथा पवित्र करने वाला और दरिद्रता तथा कलियुग के पापों को नाश करनेवाला
है। शौचादि के बाद हाथ-पैर का भलीभाँति मिट्टी आदि से मलकर धोना—शुद्धिकारक, मलादि करने के समय उत्पन्न
हुये श्रम को हरण करनेवाला, वृष्य (ओज पैदा करनेवाला अथवा मनको हर्षित किं वा शुक्र की वृद्धि करनेवाला), चक्षु
के लिये हितकारी और रजोगुण को दूर करनेवाला है ॥२१-२३॥
अथ दन्तकाष्ठविधिमाह-
भक्षयेद्दन्तपवनं द्वादशाङ्गुलमायतम्। कनिष्ठिकाऽग्रवत्स्थूलमृज्वग्रन्थि तथाऽव्रणम् ।।२४।।
एकैकं घर्षयेद्दन्तं मृदुना कूर्चकेन तु। दन्तशोधनचूर्णेन दन्तमांसान्यबाधयन् ।। २५ ।।
दातौन करने की विधि—बारह अङ्गुल लम्बी, कनिष्ठिका अंगुलि के अग्रभाग की भाँति मोटी, सीधी, गाँठ तथा
व्रण से रहित अर्थात् चिकनी और कहीं से छिल्के उचड़े हुये न हों, ऐसी दातौन लेकर उसकी मुलायम कूँची बनाकर
उससे दाँतों को साफ करने वाले चूर्ण (मञ्जन) के साथ जिस भाँति से मँसूड़ों में पीड़ा न हो उस भाँति एक-एक दाँत
को रगड़े ॥२४-२५॥
क्षौद्रत्रिकटुकाक्तेन तैलसिन्धुभवेन वा। चूर्णेन तेजोवत्याश्च दन्तान्नित्यं विशोधयेत् ।।२६।।
त्रिकटु (सोंठ, पीपल, काली मिर्च) का चूर्ण शहद में मिलाकर अथवा सेंधा नमक कड़ूआ तेल में मिलाकर अथवा
तेज वल्कल के चूर्ण से नित्य दाँतों को साफ करे ॥२६॥
❖ तेजोवती=तेजवल्कल इति लोके प्रसिद्धा ।।२६।।
'तेजोवती' 'तेज वल्कल' नाम से लोक में प्रसिद्ध है ॥२६॥
मधुको मधुरे श्रेष्ठः करञ्जः कटुके तथा। निम्बः स्यात्तिक्तके श्रेष्ठः कषाये खदिरस्तथा ।।२७।।
समयं तु समालोक्य दोषं च प्रकृतिं तथा। यथौचितै रसैर्वीर्यैर्युक्तं द्रव्यं प्रयोजयेत् ।। २८ ।।
तेनास्य मुखवैरस्यदन्तजिह्वाऽऽस्यजा गदाः। रुचिवैशद्यलघुता न भवन्ति भवन्ति च ।। २९ ।।
अर्के वीर्ये वटे दीप्तिः करञ्जे विजयो भवेत्। प्लक्षे चैवार्थसम्पत्तिर्वैदर्या मधुरोध्वनिः १ ।। ३० ।।
खदिरे मुखसौगन्ध्यं बिल्वे तु विपुलं धनम्। उदुम्बरे तु वाक्सिद्धिराम्रे त्वारोग्यमेव च ।।३१।।
कदम्बे तु धृतिर्मेधा चम्पके च दृढा२ मतिः। शिरीषे कीर्तिसौभाग्यमायुरारोग्यमेव च ।।३२।।
अपामार्गे धृतिर्मेधा प्रज्ञाशक्तिस्तथाऽसने३। दाडिभ्यां सुन्दराकारः ककुभे कुटजे तथा ।। ३३ ।।
जातीतगरमन्दारैर्दुःस्वप्नं च विनश्यति ।।३४।।
मीठी दातौन में महुआ, कटु रस में करञ्ज, तिक्तरस में नीम और कषाय (कसैला) रस में खैर की दातौन उत्तम
होती है। समय, दोष तथा प्रकृति को समझकर उसके योग्य रस और वीर्य (शीत अथवा उष्ण) से युक्त जो द्रव्य हो
उसी का दाँत साफ करने के समय प्रयोग करे। ऐसा करने से मुख की विरसता, दाँत, जीभ तथा मुख में उत्पन्न होने
वाले रोग नहीं होते तथा भोजन करने में रुचि, मुख की स्वच्छता और शरीर में लघुता (हल्कापन) होती है। मदार की
दातौन करने से वीर्य (शक्ति), बड़ की दातौन से दीप्ति, करञ्ज की दातौन से विजय, पाकर की दातौन से धन-संपत्ति,
बेर की दातौन से मधुर ध्वनि (मीठी आवाज), खैर की दातौन से मुख में सुगन्धि, बेल की दातौन से विपुल धन, गूलर
की दातौन से वाक्सिद्धि (जो बात कहे उसका सिद्ध होना), आम की दातौन से आरोग्य, कदम्ब की दातौन से धैर्य तथा
१. 'मधुराशनः' इति पा. । २. 'दृढवाक्श्रुति'रिति पा. ।
३. 'तथा ध्वनि'रिति पा. ।