भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 845, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ें७१४ भावप्रकाशनिघण्टुः
अथ शूकधान्यानि। तत्र यवभेदानाह
यवस्तु सितशूकः स्यान्निः शूकोऽतियवः स्मृतः। तोक्यस्तद्वत्स हरितस्ततः स्वल्पश्च कीर्त्तितः ।। २७।।
शूक धान्यों में जौ के लक्षण सहित भेद-जौ-यह सफेद शूक (सूई या टूँड) से युक्त होता है। अतियव-
इसमें शूक नहीं होता है। तोक्य-यह शूक से रहित, हरे रंग का तथा छोटा होता है। [२७]
❖ शूकधान्यानि तेषु यवः प्रसिद्धः । अतियवो निःशूकः कृष्णारुणवर्णो यवः । तोक्यो हरितो निःशूकः
स्वल्पो यवः "जई" इति प्रसिद्धः ।।२७।।
यहाँ पर "शूकधान्यों" में "जव" प्रसिद्ध है। अतियव-यह शूक रहित काले तथा अरुण (लाल) रंग का होता
है। तोक्य-यह हरे रंग का शूक रहित छोटा जब होता है और "जई" इस नाम से लोक में प्रसिद्ध है।"
अथ तेषां गुणानाह
यवः कषायो मधुरः शीतलो लेखनो मृदुः । व्रणेषु तिलवत्पथ्यो रूक्षो मेधाऽग्निवर्धकः ।।२८।।
कटुपाकोऽनभिष्यन्दी स्वर्यो बलकरो गुरुः । बहुवातमलो वर्णस्थैर्यकारी च पिच्छिलः ।।२९।।
कण्ठत्वगामयश्लेष्मपित्तमेदःप्रणाशनः । पीनसश्वासकासोरुस्तम्भलोहिततृट्प्रणुत् ।।
अस्मादतियवो न्यूनस्तोक्यो न्यूनतरस्ततः ।।३०।।
जौ-कषाय तथा मधुर रस युक्त, विपाक में कटु रसयुक्त, शीतल, लेखन, कोमल, व्रणों में तिल के समान पथ्य,
रूक्ष, मेधा तथा जठराग्नि को बढ़ाने वाला, किंचित् अभिष्यन्दी, कण्ठ स्वर को उत्तम करने वाला, बलकारक, गुरु,
अधिक रूप से वात तथा मल को करने वाला, शरीर के वर्ण को स्थिर रखने वाला, पिच्छिल एवम्-कण्ठ तथा चर्म
सम्बन्धी रोग, कफ, पित्त, भेद, पीनस, श्वास, कास, उरुस्तम्भ, रक्तविकार तथा तृषा को दूर करने वाला है।
अतियव-यह जौ की अपेक्षा न्यून गुणवाला होता है।
जई-यह अतियव से भी न्यून गुण वाला होता है। [२८-२९]
२. जव
हिं०-जव, जो, जौ। म०-जव। क०-जवेगोधी। ता०-बार्लि अरिसि। ते०-यव धान्य। फा०-जव, जओ।
अ०-शईर, श्यईर। बं०-जव। अं०-Barley (बारली। ले०-Hordeum vulgare Linn. (हॉरडीयम् वलगेयर)।
Fam. Graminea (ग्रेमिनी)।
इसकी खेती उत्तर भारत में विशेष होती है। उपज का ८.०% भाग उत्तर प्रदेश, बिहार तथा उड़ीसा में होता है।
पंजाब में १३% एवं अन्य प्रान्तों में मिलाकर ७% उपज होती है। दक्षिण में बहुत ही नाममात्र खेती की जाती है।
इसका क्षुप-वर्षायु तथा २-३ फीट ऊँचा होता है। मूल-बहुत तथा रेशेदार होते हैं। पत्ते-रेखाकार भालाकार,
९-१२ इञ्च लम्बे तथा १/२-५/८ इञ्च चौड़े एवं मध्यपर्णुक श्वेत रहती है। बाली शूकयुक्त होती है। सपुष्पशाल्क
(Lemma-लेम्मा) पर शूक रहता है। यह शल्क एवं शल्की वृत्तपत्रक (Palea) दाने से लगा रहता है। इसके कई
प्रकार पाये जाते हैं। जई (तोक्य) यह यव का भेद या भारतीय ओट (Indian oat) जिसका लेटिन नाम एह्नेना
बाइझेंटिना (Avena byzantina C. Koch) है, हो सकता है।
गेहूँ के आटे में मिलाकर इसकी रोटी बनाई जाती है। इससे माल्ट तथा मद्य बनाये जाते हैं। जिसमें स्टार्च अधिक
रहता है उसको माल्ट बनाने के काम में लाते हैं जिसमें प्रोटीन अधिक रहता है उसको खाने के काम में लिया जाता