भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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है। विशेष पद्धति से ऊपर का छिलका साफ करके पर्ल बार्ली (Pearl Barley) बनाते हैं। जब का सत्तू बनाकर खाया
जाता है।
रासायनिक संगठन-इसमें कार्बोहाइड्रेट ६९.३ भाग, प्रोटीन ११.५, खनिज १.५ जिनमें खटिक, लोह एवं
विटामिन 'सी' को छोड़कर अन्य थोड़ी मात्रा में होते हैं। इसके प्रोटीन का 'जैव मूल्य' ६४ है जबकि गेहूँ का ६७ रहता
है।
गुण और प्रयोग-यह सुपाच्य होता है तथा भूनकर पीसकर इसकी मण्ड, पेया इत्यादि बनाकर रोगी को पथ्य
के रूप में देते हैं। कुपचन, ज्वर, अतिसार, मूत्रकृच्छ्र तथा प्रदाह युक्त विकारों में यवमण्ड का उपयोग किया जाता है।
इसके क्षार का वर्णन पहले हरीतक्यादिवर्ग (पृष्ठ १६३) में किया जा चुका है।
अथ गोधूमः (गेहूँ) । तस्य नामानि सलक्षणभेदानाह
गोधूमः सुमनोऽपि स्यात्त्रिविधः स च कीर्त्तितः । महागोधूम इत्याख्यः पश्चाद्देशात्समागतः ।। ३१ ।।
गेहूँ के संस्कृत नाम-गोधूम तथा सुमन हैं। भेद-(१) महागोधूम, (२) मधूली, (३) दीर्घगोधूम इन भेदों से
यह तीन प्रकार का होता है।
महागोधूम-यह पश्चिम के देशों (पंजाब आदि) से आता है। [३१]
मधूली तु ततः किञ्चिदल्पा सा मध्यदेशजा । निःशूको दीर्घगोधूमः क्वचिन्नन्दीमुखाभिधः ।। ३२ ।।
मधूली-यह "बड़ा गेहूँ" की अपेक्षा कुछ छोटा होता है और मध्यदेश (आगरा-मथुरा आदि) में उत्पन्न होता है।
दीर्घगोधूम-यह शूक (टूँड) रहित होता है तथा इसे कहीं-कहीं नन्दीमुख भी कहते हैं। [३२]
अथ गोधूमगुणानाह
गोधूम मधुरः शीतो वातपित्तहरो गुरुः । कफशुक्रप्रदो बल्यः स्निग्धः सन्धानकृत्सरः ।। ३३ ।।
जीवनो बृंहणो वर्ण्यो व्रण्यो रुच्यः स्थिरत्वकृत् ।। ३४ ।।
गेहूँ-यह मधुर, शीतल, गुरु, कफप्रद (कफ को पैदा करने वाला), वीर्यजनक, बल-कारक, स्निग्ध, सन्धानकारक
(टूटी अस्थियों को जोड़ने वाला), सारक, जीवनी शक्ति को बढ़ाने वाला, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), वर्ण को उत्तम करने
वाला, व्रण के लिये हितकर, रुचिकारक, स्थिरता को करने वाला एवम् वात तथा पित्त नाशक होता है। [३३-३४]
❖ कफप्रदो नवीनो न तु पुराणः ।
"पुराणयवगोधूमक्षौद्रजाङ्गलशूलभुग्" । इति वाग्भटेन वसन्ते गृहीतत्वात् ।। ३३-३४ ।।
यहाँ पर- "कफप्रद" पद होने से "नवीन गेहूँ कफ को बढ़ाने वाला होता है न कि पुराना" यह समझना चाहिये।
क्योंकि-यदि पुराना गेहूँ भी कफप्रद होता तो वाग्भट वसन्तऋतु के पथ्य में-पुराना जौ तथा गेहूँ, मधु, जङ्गली जीवों
के मांस का कबाब इत्यादि के मध्य में गेहूँ का नाम न लेते। [३३-३४]
अथ मधूलीनन्दीमुखयोर्गुणानाह
मधूली शीतला स्निग्धा पित्तघ्नी मधुरा लघुः । शुक्रला बृंहणी पथ्या तद्वन्नन्दीमुखः स्मृतः ।। ३५ ।।
मधूली (गेहूँ)-मधुर रसयुक्त, शीतल, स्निग्ध, लघु, शुक्रजनक, बृंहण (रसरक्तादिवर्धक), पथ्य और पित्तनाशक
होता है।
नन्दीमुख (गेहूँ)-यह भी पूर्वोक्त मधूली के समान गुणों में होता है। [३५]