भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
अध्याय ४१
सख्यभक्तिरस
जब कोई भक्त स्थायी रूप से भक्तियोग में स्थिर रहता है और
नाना प्रकार के भाव-लक्षणों के द्वारा श्रीकृष्ण के सम्बन्ध में एक सख्यरस
अथवा स्वाद को विकसित और परिपक्व कर लेता है तो उसकी भाववृत्ति
को सख्यरस कहते हैं।
भगवान् के लिये इस प्रकार के सख्यरस के उद्दीपन स्वयं
भगवान् हैं। जब कोई जीवन्मुक्त हो जाता है और भगवान् से अपने
शाश्वत् सम्बन्ध को जान जाता है तो भगवान् स्वयं उसके सख्य
प्रेम को बढ़ाने में उद्दीपन का काम करते हैं। भगवान् के वृन्दावनीय
शाश्वत् पार्षदों ने यह इस प्रकार वर्णन किया है, "जिनके श्रीविग्रह का
वर्ण इन्द्रनील मणि जैसा है, जिनकी मुस्कान कुन्द के फूल के समान मधुर
है; जो शरदकालीन स्वर्ण दुर्वा के समान पीतवर्ण का वस्त्र धारण किये
हुए हैं; जिनका वक्षःस्थल वैजयन्तीमाला से सुशोभित है और जो निरन्तर
अपनी वेणु के वादन में निरत हैं—ऐसे ये अघासुर के शत्रु श्रीहरि वृन्दावन
में भ्रमण करते हुए निरन्तर हमारे हृदयों का आकर्षण कर रहे हैं।"
वृन्दावन के बाहर भी सख्यरस के ऐसे ही भाव व्यक्त हुए हैं।
जब युधिष्ठिर आदि पाण्डवों ने कुरुक्षेत्र के युद्ध से श्रीकृष्ण को शंख, चक्र,
गदा, पद्मधारी चतुर्भुज रूप में देखा तो वे अपने को बिल्कुल भूल गये और
आनन्द अमृत के सिन्धु में निमग्न हो गये। इससे प्रकट होता है कि किस
प्रकार पाण्डुपुत्र—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव, सबके सब
श्रीकृष्ण के लिये सख्यप्रेम के वशीभूत थे।
कभी-कभी नाना नाम, रूप, परिकर, उपकरण तथा दिव्य गुण
आदि सख्यरस को उद्भूत करते हैं। उदाहरण के लिये, श्रीकृष्ण का सुन्दर
परिधान, उनका सुगठित शरीर, उनके शरीर पर विद्यमान सर्वमंगलमय
चिह्न, नाना भाषाओं का ज्ञान, गीता के रूप में पाण्डित्यमय शिक्षा, सब
प्रकार की चेष्टाओं में उनकी अद्वितीयता, विदग्धज्ञान, दया, वीरता,
सख्यभक्तिरस [ २७६
प्रियता, बुद्धिमानी, क्षमाभाव, सब प्रकार के मनुष्यों को आकृष्ट करने
की शक्ति, उनका ऐश्वर्य और उनका सुख—ये सब सख्यरस को उद्दीप्त
करते हैं। श्रीकृष्ण के वृन्दावनवासी पार्षदों को देखने पर भी सख्यरस का
उद्दीपन होना बड़ा स्वाभाविक है क्योंकि उनके निजी स्वरूप, गुण तथा
परिधान आदि सब श्रीकृष्ण के समान हैं। ये पार्षद सदा श्रीकृष्ण की सेवा
में प्रसन्न रहते हैं। इन्हें सामान्यतः वयस्य कहा जाता है अर्थात्
समकालीन, समान आयु के मित्र। इन मित्रों को सदा श्रीकृष्ण के संग में
विश्वास रहता है। भक्त कभी-कभी प्रार्थना करते हैं, “हम श्रीकृष्ण के
वयस्क मित्रों को प्रणाम करते हैं, जिन्हें श्रीकृष्ण के सख्य और संरक्षण
में पूर्ण विश्वास है और जिनकी श्रीकृष्ण में स्थायी भक्ति है। वे निर्भय हैं
और श्रीकृष्ण के समकक्ष होकर अपनी दिव्य प्रेममयी सेवा का अर्पण करते
हैं।” ये शाश्वत् वयस्य वृन्दावन के बाहर द्वारका, हस्तिनापुर आदि
स्थानों पर भी पाये जाते हैं। वृन्दावन के अतिरिक्त श्रीकृष्ण की लीला
के अन्य सब स्थल पुर कहलाते हैं। मथुरा और कुरुओं की राजधानी
हस्तिनापुर—ये दोनों पुर हैं। अर्जुन, भीम, द्रौपदी, श्रीदामा, ब्राह्मण,
इत्यादि सब पुरों में श्रीकृष्ण के सख्य भक्त हैं।
पाण्डवों द्वारा श्रीकृष्ण के संग का आस्वादन करने का वर्णन इस प्रकार
है—“जब श्रीकृष्ण कुरुवंशियों की राजधानी इन्द्रप्रस्थ पधारे तो महाराज
युधिष्ठिर तुरन्त उनकी अगवानी के लिये बाहर आये और श्रीकृष्ण के सिर
को सूँघने लगे।” यह वैदिक परिपाटी है कि जब छोटे बड़ों को पैर छूकर
प्रणाम करें तो बड़े उनका सिर सूँघा करते हैं। भीम और अर्जुन दोनों
श्रीकृष्ण की भुजाओं से लिपट गये और नकुल और सहदेव ने अश्रुपूरित
नेत्रों से झुककर श्रीकृष्ण के चरणकमलों में प्रणाम किया। इस प्रकार
पाँचों पाण्डव श्रीकृष्ण के साथ दिव्य सख्यरस का आस्वादन कर रहे थे।
पाँचों में अर्जुन का श्रीकृष्ण से सर्वाधिक अंतरंग सम्बन्ध है। उसके हाथ
में ‘गाण्डीव’ नामक प्रख्यात धनुष रहता है; जंघाएँ हाथी की सूँड के
समान सुन्दर हैं और नेत्र दीर्घातिरक्त हैं। जब श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनों
साथ-साथ रथ पर विराजते हैं तो उनकी बड़ी अतुलनीय शोभा होती है
जिससे सबके नेत्रों को आनन्द मिलता है। अर्जुन प्रायः शय्या पर लेटे हुए
श्रीकृष्ण की गोद में सिर रखकर उनसे वार्ता अर्थात् परिहास किया
करते। इस प्रकार मुस्कराते हुए श्रीकृष्ण के संग में उसे बड़ा सन्तोष
मिलता।
जहाँ तक ब्रजसम्बन्धी वयस्यों का सम्बन्ध है वे क्षणभर भी
२८०] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्ण को न देखने पर विह्वल हो उठते हैं।
श्रीकृष्ण के वृन्दावन के वयस्य मित्रों से एक भक्त की प्रार्थना
है—“श्रीकृष्ण के वयस्य मित्रों की जय हो, जो आयु, गुण, विलास, वेष
एवं शोभा में साक्षात् श्रीकृष्ण के समान हैं। वे निरन्तर अपनी वेणुओं को
बजाते रहते हैं और उन सब के श्रृंग श्रीकृष्ण के समान ही इन्द्रनील,
स्वर्ण और पद्मराग मणि से जड़ित हैं। वे निरन्तर श्रीकृष्ण के समान
आह्लादित रहते हैं। श्रीकृष्ण के ये शोभामय मित्र सहचर हमारी रक्षा
करें।”
वृन्दावन धाम के वयस्यों का श्रीकृष्ण से ऐसा अन्तरंग सख्य है कि
कभी-कभी वे अपने को श्रीकृष्ण के समान समझने लगते हैं। इसका एक
उदाहरण इस प्रकार है—“श्रीकृष्ण को अपने बायें हाथ से गोवर्धन पर्वत
को धारण किये देखकर वयस्य कहने लगे, “हे सखे ! तुम्हें गोवर्धन को
धारण किये खड़े-खड़े बिना विश्राम किये सात दिन-रात बीत गये हैं।
यह देखकर हमें बड़ा दुःख हो रहा क्योंकि तुम थक गये हो। इसलिये अब
इस पर्वत को श्रीदामा के हाथ पर रख दो। यदि तुम समझते हो कि
श्रीदामा इसे नही उठाता तो कम से कम अपने ही दाहिने हाथ में ले लो
जिससे हम तुम्हारे बायें हाथ की अच्छी प्रकार से मालिश कर सकें।” यह
उस अन्तरंगता का परिचायक है जिसमें वयस्य अपने को श्रीकृष्ण के
बराबर समभते हैं।
श्रीमद्भागवत (१०.१२.११) में शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित से
कहते हैं, “हे राजन् ! श्रीकृष्ण विद्वान् योगियों के लिये साक्षात् भगवान्
हैं; निर्विशेषवादियों के लिये परम सुख हैं; भक्तों के लिये परम आराध्य
देव हैं और जो माया के बन्धन में पड़े हैं उनके लिये साधारण बालक हैं।
कल्पना तो करो कि ये गोप-बालक परम पुरुष के साथ समान भाव
से खेल रहे हैं। अवश्य ही उन्होंने पूर्वजन्म में पुण्यों के पुन्ज एकत्र किये
होंगे, जिससे भगवान् से उन्हें ऐसा अन्तरंग सख्यभाव का सम्बन्ध प्राप्त
हुआ है।”
श्रीकृष्ण ने स्वयं अपने वृन्दावनीय वयस्यों के लिये अपना भाव
व्यक्त किया है। वे बलरामजी से कहते हैं, “हे भ्राता ! जिस समय मेरे
सखा अघासुर द्वारा निगले जा रहे थे तो मेरे नेत्रों से गरम-गरम आँसू
झरने लगे। जैसे मेरे गाल उनसे भीगे, एक क्षण के लिये मैं अपने को भी
पूर्ण रूप से भूल बैठा।”
गोकुल में श्रीकृष्ण के वयस्यों के सामान्यतः चार गोष्ठ माने जाते
सख्यभक्तिरस [ २८१
हैं—सुहृद, सखा, प्रिय सखा, तथा प्रियनर्म सखा । श्रीकृष्ण के सुहृद
उनसे तनिक बड़े हैं और इसलिये उनमें श्रीकृष्ण के लिये थोड़ा वात्सल्य
पाया जाता है। वे निरन्तर सब प्रकार के भय से उनकी रक्षा के लिये
तत्पर रहते हैं। इस प्रकार वे कभी-कभी अस्त्र भी धारण करते हैं जिससे
श्रीकृष्ण का अनिष्ठ करने आए दुष्टों को मार भगाएँ । इनमें सुभद्र,
मण्डलीभद्र, भद्रवर्धन, गोभट, यक्ष, यक्षेन्द्र भट, भद्रांग, वीरभद्र, महागण,
विजय तथा बलभद्र आदि हैं। श्रीकृष्ण से थोड़े बड़े होने से वे निरन्तर
उनका हितचिन्तन किया करते हैं।
उनके सख्य का उदाहरण इस प्रकार है—"हे मण्डलीभद्र ! तुम
अपनी चमकती हुई तलवार को क्यों घुमा रहे हो। ऐसा लगता है मानो
अरिष्ट सुर को मारने दौड़ते हो। हे बलदेव ! तुमने व्यर्थ ही अपने हल को
क्यों धारण कर रखा है ? हे विजय ! बिना प्रयोजन घबड़ाओ नहीं। हे
भद्रवर्धन इस प्रकार गरजने की कोई आवश्यकता नहीं। यदि तुम ध्यान
से देखो तो पाओगे कि यह केवल गोवर्धन पर्वत पर गरजने वाला एक बादल
है। यह सांडरूप धारी अरिष्टासुर नहीं है, जैसा कि तुम समझ रहे हो।"
ये सब श्रीकृष्ण के बड़े सुहृद सखा बड़े से मेघ को सांडरूप धारी
अरिष्टासुर समझ बैठे थे । इसी उत्तेजना के बीच उनमें से एक को पता
चला कि यह तो वास्तव में गोवर्धन पर्वत पर गरजने वाला बादल है ।
अतएव उसने दूसरों को सूचित किया कि श्रीकृष्ण के लिये चिन्ता करने का
कोई कारण नहीं है--वर्तमान में अरिष्टासुर का भय नहीं है।
इन सुहृदों में मण्डलीभद्र और बलभद्र प्रधान हैं। मण्डलीभद्र
का वर्णन इस प्रकार है—"पीतवर्ण वस्त्र से सुशोभित शरीरांग वाला, हाथ
में चितकबरी लाठी पकड़े हुए, कमल जैसी कान्ति को धारण किये हुए
मोरमुकुटधारी मण्डलीभद्र शोभायमान है।" उसका सख्यभाव इस वाक्य
से प्रकट होता है, "हे सखाओं ! गायों को चारण कराते हुए दूर-दूर वन
में विचरण करने से हमारे प्रिय श्रीकृष्ण बहुत थक गये हैं। इसलिये अब
घर सोते हुए इनके सिर को मैं धीरे-धीरे दबाता हूँ । सुभद्र तुम चरण
दबाओ।"
एक भक्त ने बलदेव के निजी सौन्दर्य का वर्णन इन शब्दों में किया
है—"कपोलों से लगते कुण्डलों से जिनकी शोभा अतिशय हो उठी है,
जिनका माथ कस्तूरी तिलक से सुशोभित है, वक्षःस्थल पर गुञ्जा की
माला विराजमान है, जिनका वर्ण शरदकालीन मेघों के समान धवल है,
जो नीलाम्बर धारण करते हैं और जिनकी वाणी बड़ी गंभीर है, भुजाएँ
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आजानुलम्बित हैं और अपने महान् पराक्रम को जिन्होंने प्रलम्बासुर का वध
करके प्रकट किया है, उन बलदेवजी की मैं शरण लेता हूँ।"
श्रीकृष्ण के लिये बलदेव का स्नेह सुवल से कहे इस वाक्य में अभि-
व्यंजित है—"हे सखे ! कृपया श्रीकृष्ण से कह देना कि वे आज कालिय
दह के निकट न जायें। आज उनकी जन्मतिथि है। इसलिये यशोदा मैया
के साथ मैं उन्हें स्नान कराने जाना चाहता हूँ। उनसे कह देना कि आज
घर से न जायें।" इससे प्रकट होता है कि श्रीकृष्ण के अग्रज बलरामजी
सख्यप्रीति के अर्न्तगत होने वाले वात्सल्य से श्रीकृष्ण का ध्यान रखते थे।
जो श्रीकृष्ण से छोटे हैं, जिनमें प्रीति की गन्ध पाई जाती है
और जो निरन्तर उनकी नाना प्रकार से सेवा करते हैं वे सखा हैं।
इनके उदाहरण हैं—विशाल, वृषभ, ओजस्वी, देवप्रस्थ, वरूथप, मरन्द,
कुसुमापीड, मणिवन्ध तथा करन्धम। श्रीकृष्ण के ये सब सखा केवल
उनकी सेवा चाहते हैं। कभी-कभी वे प्रातःकाल जल्दी उठकर तुरन्त नन्द
महाराज के द्वार पर जाकर खड़े हो जाते और गोचारण के लिए श्रीकृष्ण
के साथ जाने को उनकी प्रतीक्षा करते। इस बीच यशोदा मैया श्रीकृष्ण
को तैयार करतीं और जब वे किसी बालक को द्वार पर खड़े देखतीं तो
पुकार कर कहतीं, 'अरे विशाल, तू वहाँ क्यों खड़ा है यहाँ आ।' इस
प्रकार यशोदा मय्या की अनुमति से वह अविलम्ब घर में चला जाता ।
यशोदा मैय्या को श्रीकृष्ण को वस्त्राभूषणों से अलंकृत करते देखकर वह
भी श्रीकृष्ण को कंकण किंकणी पहनाने में सहायता करता। वह देखता
श्रीकृष्ण परिहास में उसे अपनी वंशी से छूते। तब यशोदा जी कहने लगतीं,
"कृष्ण यह क्या ? तू अपने सखा को क्यों चिढ़ा रहा है।" इस पर श्रीकृष्ण
हँस पड़ते और सखा भी हँसने लगता। यह सब श्रीकृष्ण के सखाओं की कुछ
क्रियाएँ हैं। कभी-कभी सखा इधर-उधर जाकर गायों की देखभाल करते
और श्रीकृष्ण से कहते, "कृष्ण तुम्हारी गायें इधर-उधर जा रही हैं।" और
श्रीकृष्ण इसके लिये उनका धन्यवाद करते।
कभी-कभी सखाओं सहित श्रीकृष्ण के गोचारण के लिये चले जाने
पर कंस उनको मारने के लिये किसी असुर को भेजता। अतएव प्रायः
प्रतिदिन ही किसी न किसी प्रकार के असुर से युद्ध होता था। इस प्रकार
के युद्ध के बाद श्रीकृष्ण बहुत थक जाते और उनके सिर के बाल भी बिखर
जाते। ऐसे अवसर पर सखा तुरन्त आकर उन्हें नाना प्रकार से सुख देने
का प्रयास करते। कुछ मित्र कहते, 'हे विशाल ! लो यह कमल का पंखा
और श्रीकृष्ण को हवा करो जिससे उन्हें कुछ सुख मिले। वरूथप उलझे हुए
सख्यभक्तिरस [ २८३
बालों को ठीक करो। हे वृषभ ! व्यर्थ बोलना रोक कर शरीर को दबाओ
क्योंकि उस असुर से युद्ध करने में हमारे श्रीकृष्ण के बाहुओं को बड़ी
थकावट हो गई है ।'' ये श्रीकृष्ण के सखाओं के कुछ व्यवहार हैं।
देवप्रस्थ नामक सखा का रूप इस प्रकार है—"वह बड़ा बलवान है,
धुरन्धर विद्वान् है, और गेंद खेलने में बड़ा दक्ष है। वह श्वेत वस्त्र धारण
किये रहता है और उसके बाल रस्सी से बँधे रहते हैं। जब भी श्रीकृष्ण
और असुरों में युद्ध होता है तो देवप्रस्थ सहायता में सबसे आगे होता है।
युद्ध में वह हाथी जैसे लड़ता है।"
एक गोपी अपनी सखी से बोली, "हे सखि ! जिस समय नन्दनन्दन
श्रीकृष्ण पहाड़ी की कन्दरा में विश्राम कर रहे थे तो उन्होंने अपना सिर
श्रीदामा की भुजाओं में रख रखा था और अपने बायें हाथ को दामा के
वक्ष पर टिका रखा था। इस अवसर का लाभ उठाकर देवप्रस्थ तुरन्त
श्रीकृष्ण के लिये अपने तीव्र स्नेह से प्रेरित होकर उनके चरणों को
दबाने लगा।'' गौचारण में श्रीकृष्ण के सखाओं की इस प्रकार लीलाएँ
होती हैं।
श्रीकृष्ण के अधिक अंतरंग मित्रों को प्रियसखा कहते हैं। उनकी
वय प्रायः श्रीकृष्ण के समान है। अतिशय अंतरंगता के कारण इनके
सम्पूर्ण व्यवहार का एकमात्र आधार शुद्ध सख्य है। विभिन्न प्रकार के
सखाओं में वात्सल्य अथवा दास्य का पुट रहता है। परन्तु इन प्रिय
सखाओं की क्रियाओं का आधार समस्तर पर शुद्ध सख्यभाव है। इनमें
से कुछ प्रियसखा हैं—श्रीदामा, सुदामा, दामा, वसुदामा, किंकिणी, स्तोक
कृष्ण, अंशु, भद्रसेन, विलासी, पुण्डरीक, विटंव और कलविंक । नाना
लीलाओं में अपनी विविध क्रियाओं से ये सब श्रीकृष्ण को दिव्य आनन्द
प्रदान करते हैं।
इन प्रिय सखाओं के व्यवहार का वर्णन करते हुए एक सखी राधा-
रानी से कहती है, 'हे शोभामयी राधे ! तुम्हारे अंतरंग मित्र श्रीकृष्ण की
उनके अंतरंग गोपसखा खूब सेवा करते हैं। उनमें से कुछ मन्द-मन्द स्वर
से व्यंग्य करते हैं; इससे श्रीकृष्ण को बड़ी प्रसन्नता होती है।" उदाहरण
के लिये श्रीकृष्ण का एक मधुमंगल नामक ब्राह्मण सखा था। यह बालक
लोभी ब्राह्मण के समान भूमिका निभाकर व्यंग्य करता। जब भी सखा
भोजन करते तो वह और सबसे अधिक खाता। विशेषतः उसे लड्डू बड़े
प्रिय थे। सबसे अधिक लड्डू खा लेने पर भी मधुमंगल की तृप्ति नहीं
होती और वह श्रीकृष्ण से कहता है, "यदि तुम मुझे एक और लड्डू दे दोगे
२८४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
तो मैं तुमसे प्रसन्न होकर आशीर्वाद दूँगा जिससे सखी राधारानी तुम
पर प्रसन्न हो जायगी।" सामान्यतया ब्राह्मण लोग वैश्यों को आशीर्वाद
दिया करते हैं। श्रीकृष्ण नन्द महाराज के आत्मज के रूप में अपने को
वैश्य मानते थे; अतः ब्राह्मण बालक के लिये उन्हें आशीर्वाद देना उचित ही
था। इस प्रकार मित्रोचित परिहास में सखा के आशीर्वाद से श्रीकृष्ण को
बड़ी प्रसन्नता होती और वे उसे लड्डू पर लड्डू देते जाते।
कभी-कभी कोई प्रियसखा श्रीकृष्ण के सामने पड़ने पर उन्हें अति-
शय प्रीति और प्रेमवश गले लगा लेता। दूसरा पीछे से आकर श्रीकृष्ण
के नेत्रों को अपने हाथों से ढक लेता। अपने प्रियसखाओं के साथ
श्रीकृष्ण को इस प्रकार की लीलाओं में निरन्तर बड़े सुख का अनुभव
होता था।
इन सब प्रियसखाओं में श्रीदामा प्रमुख है। श्रीदामा पीताम्बर
और शृंग धारण किये रहता है। उसकी पगड़ी का ताम्र वर्ण है, शरीर
की कान्ति श्यामवर्ण है और गले में सुन्दर माला शोभायमान है। सख्य
के परिहास में वह निरन्तर श्रीकृष्ण से होड़ लगाये रहता है। उसी श्रीदामा
की कृपा की हमें याचना है।
कभी-कभी श्रीदामा श्रीकृष्ण से कहता, "हे निर्दयी ! तुम हम
सबको नदी तट पर अकेला छोड़कर न जाने कहाँ चले गये। जानते हो तुम्हें
न देखने पर हमें कैसा उन्माद हुआ। बड़े भाग्य से अब दिखाई दिये
हो। हाय ! अब आलिंगन के द्वारा हम सबको आनन्दित करो। हे सखे !
विश्वास करो। तुम्हारी एक क्षण की अनुपस्थिति भी बड़ी उत्पात करने
वाली है। हमारे लिये ही नहीं, बल्कि गायों के लिये भी। सब कुछ विरूप
हो जाता है और हम तुम्हारे लिये पागल हो उठते हैं।"
नर्म वयस्य तो प्रियसखाओं से भी अधिक अंतरंग हैं। इनमें
सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, और उज्ज्वल आदि हैं। इनके सम्बन्ध में
एक गोपी ने राधारानी से कहा है, "हे कृष्णांगी ! देखो-देखो, सुबल तुम्हारे
सन्देश को श्रीकृष्ण के कान में सुना रहा है। श्यामादासी के गुप्त पत्र को
श्रीकृष्ण के हाथ में दे रहा है। फिर पालिका द्वारा भेजे ताम्बूल
को श्रीकृष्ण के मुख में खिला रहा है। तारका द्वारा गुम्फित माला
से श्रीकृष्ण को सुशोभित करता है। हे सखि ! क्या तुम जानती हो कि
श्रीकृष्ण के ये सब प्रिय नर्मसखा निरन्तर इसी प्रकार उनकी सेवा में
लगे रहते हैं। नाना प्रिय नर्मवयस्यों में सुबल और उज्ज्वल सर्वप्रधान
माने गये हैं।
सख्यभक्ति रस [ २८५
सुबल के रूप का वर्णन इस प्रकार है—“उसका वर्ण द्रवित स्वर्ण
की कान्ति को भी हरने वाला है, वह श्रीकृष्ण को अतिशय प्रिय है।
निरन्तर गले में माला धारण किये रहता है और 'पीताम्बरधारी है। उसके
नेत्र कमलदल जैसे हैं और वह इतना बुद्धिमान् है कि उसकी वाणी और
नीति के द्वारा अन्य सखाओं को परमानन्द की प्राप्ति होती है। हम सब
श्रीकृष्ण के उस सुबल सखा की सादर वन्दना करते हैं।”
सुबल और श्रीकृष्ण की अंतरंगता को इस बात से समझा जा
सकता है कि उनमें होने वाला वार्तालाप इतना गुप्त था कि कोई भी उसे
नहीं समझ सका।
श्रीकृष्ण के एक अन्य नर्म वयस्य का वर्णन निम्नलिखित है—
“उज्ज्वल अरुण आम्बर धारण करता है और उसके नेत्रों की दृष्टि बड़ी
चंचल है। उसे नाना प्रकार के पुष्पों से अपने को सजाना प्रिय है। शरीर
का रंग प्रायः श्रीकृष्ण जैसा है और गले में मोतियों की माला झलकती
रहती है। वह श्रीकृष्ण को सदा प्रिय है। श्रीकृष्ण के ऐसे प्रियनर्म सखा
उज्ज्वल की जय हो।”
उज्ज्वल की अन्तरंग सेवा के सम्बन्ध में राधारानी अपनी एक
सखी से कहती हैं, 'हे सखि ! मेरे लिये अपने मान की रक्षा करना असम्भव
सा हो गया। मैं श्रीकृष्ण से अब बिल्कुल भी नहीं बोलना चाहती;
परन्तु यह देखो वह उनका सखा उज्ज्वल दूत-कर्म के लिये मेरे पास
आ रहा है। उसकी नर्मोक्तियाँ इतनी प्रबल होती हैं कि किसी भी
गोपी के लिये उनके सामने अपने कृष्णप्रेम को रोक पाना असम्भव हो
जाता है; चाहे वह अत्यन्त लज्जावती परिवार में निष्ठ और पतिव्रता ही
क्यों न हो।”
उज्ज्वल के हर्षमय स्वभाव के सम्बन्ध में उसका यह वाक्य है—‘हे'
कृष्ण ! हे अघारि ! तुमने अपने प्रेमव्यापार का इतना अधिक विस्तार
कर लिया है कि अब तुम्हें अपार सागर की उपमा दी जा सकती है।
संसार की सारी युवतियाँ, जो निरन्तर सच्चे प्रेमी को खोजा करती हैं,
उन नदियों के समान हैं जो इस सागर की ओर दौड़ रही हैं। इस अवस्था
में ये सब युवतीरूप नदियाँ यदि किसी ओर मुड़ने का प्रयास भी करें तो
भी अन्त में तुम तक ही पहुँचेंगी।”
श्रीकृष्ण के सखाओं के नाना समूहों में कुछ शास्त्रों में और कुछ
लोक में प्रसिद्ध हैं। वे नित्यप्रिय, सुरचर तथा साधक—ऐसे तीन प्रकार
के कहे गये हैं। इनमें से कुछ, जो स्वभाव से ही श्रीकृष्ण की सेवा में स्थिर-
२८६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
मति हैं, वे निरन्तर मन्त्रणा देते हुए उनकी सेवा करते हैं। कुछ चपल प्रवृत्ति
के वयस्य विदूषक के समान श्रीकृष्ण को हँसाते हैं। कुछ सरल प्रवृत्ति
वाले अपनी सरलता से भगवान् श्रीकृष्ण को प्रसन्न करते हैं। कुछ वाम
प्रवृत्ति वाले अपनी क्रियाओं से आश्चर्यदायक परिस्थितियों का निर्माण
करते हैं। वातुल श्रीकृष्ण के साथ निरन्तर तर्क करते रहते हैं। कुछ अन्य
सखा बड़े सौम्य हैं और अपने मधुर शब्दों से श्रीकृष्ण को आह्लादित
करते हैं। ये सब सखा श्रीकृष्ण के अतिशय अंतरंग हैं। सभी अपनी
नाना क्रियाओं में दक्ष हैं। उन सबका एकमात्र उद्देश्य श्रीकृष्ण को प्रसन्न
करना है।
अध्याय ४२
सख्यरस में प्रेम के व्यवहार
श्रीकृष्ण की आयु, उनका सौन्दर्य, विगुल, वंशी, शंख और उनका
मधुर अंगन्यास तथा अभिवृत्ति—ये सब सख्य भक्तिरस में उद्दीपन का काम
करते हैं। उनका असाधारण विनोद, भी, पराक्रम, जो कभी-कभी राज-
कुमार अथवा भगवान् के रूप में उनके अभिनय में प्रकट होता है, भक्तों
में उनके लिये सख्यरस को जगाता है ।
विद्वानों ने श्रीकृष्ण की आयु के तीन भाग किये हैं—एक से पाँच
वर्ष तक की अवस्था कौमार कहलाती है, छठे से दसवें वर्ष तक पौगण्ड
अवस्था रहती है और ग्यारहवें से पन्द्रहवें वर्ष की अवस्था को कैशोर
कहते हैं। गोचारण की लीला के दिनों में श्रीकृष्ण की आयु कौमार और
पौगण्ड में रहती है। कैशोर अवस्था में वे गोकुल में रहते हैं और सोलहवें
वर्ष में प्रवेश करते-करते कंस को मारने मथुरा चले जाते हैं ।
कौमार अवस्था बालकृष्ण और मैय्या यशोदा में होने वाले प्रेम-
विनिमय के उपयुक्त है। श्रीमद्भागवत (१०.१३.११) में शुकदेव गोस्वामी
राजा परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् ! भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण यज्ञों
के परम भोक्ता हैं। फिर भी वे अपने गोपसखाओं के साथ भोजन
किया करते । उस समय उन्होंने साधारण बाल का रूप धारण कर रखा
था । पेट और परिधान के बीच में वंशी को धारण किए हुए, शृंग और
बेंत को बगल में दबाये हुए, दही-भात से सने बायें हाथ में उठाये हुए और
फल खाते हुए जब वे सखाओं के बीच बैठते तो ऐसा प्रतीत होता मानो
कमलदल के बीच कमल की कर्णिका शोभायमान हो। उन्हें इस प्रकार
के हास-परिहास का आनन्द लेते देखकर स्वर्ग के देवता आश्चर्य से चकित
होकर आंवाक् रह जाते ।
श्रीकृष्ण की पौगण्ड आयु के आद्य, मध्य तथा शेष—ये तीन भेद हैं।
पौगण्ड अवस्था का प्रवेश होने पर अधरों में लालिमा का आधित्य,
उदर में कृशयता और गर्दन में शंख के समान चिह्न आदि प्रकट होते
२८८] भक्तिरसामृतसिन्धु
हैं। उस समय बाहर से वृन्दावन को लौटने वाले कृष्ण को देखकर कह
उठतें, “हे मुकुन्द ! तुम्हारा सौन्दर्य शनैः शनैः बढ़ रहा है, ठीक अश्व
के किसलय के समान। हे कमलनयन ! तुम्हारा कंठ शंख के समान स्फुटित
तीन रेखाओं से युक्त हो गया है। चन्द्रिका के प्रकाश में तुम्हारी दन्तावलि
और कपोलराशि पद्मराग मणि से स्पर्धा कर रही हैं। इस प्रकार
तुम्हारी यह वर्तमान अपूर्व शोभा तुम्हारे सुहृदों के आनन्द का विधान
कर रही है।"
इस वय में श्रीकृष्ण भाँति-भाँति के पुष्पों की मालाओं से सुशोभित
रहते थे। वे रंग-बिरंगे वस्त्र और पीत दुपट्टा धारण करते। इस प्रकार
के वस्त्राभूषण श्रीकृष्ण के अलंकार माने जाते हैं। दिन में गोचारण के लिये
जाते हुए श्रीकृष्ण इसी प्रकार का परिधान धारण करते । कभी वे वहाँ
अपने सुहृद मित्रों के साथ कुश्ती करते और कभी सब मिल कर केलि नृत्य
करने लगते। ये पौगण्ड अवस्था की कुछ विशिष्ट क्रियाएँ हैं।
श्रीकृष्ण के गोप-बालकों के लिये उनका संग बड़ा ही आनन्ददायक
था। अपने दिव्य भाव को उन्होंने इन शब्दों में व्यक्त किया है-“हे
कृष्ण ! तुम निरन्तर शोभायुक्त वृन्दावन में सर्वत्र विचरती हुई गायों को
चराया करते हो। सुन्दर माला, नन्हा शंख, पगड़ी पर मोर मुकुट, कानों
में लगे कर्णिकार के फूल, वक्षःस्थल पर विराजती हुई मल्लिका की
माला-ये सब तुम्हारे सौन्दर्य का वर्धन कर रहे हैं। इस सुन्दर स्वरूप
में जब तुम हमसे लड़ने का अभिनय करते हो तो हमें असीम, अतुल
आनन्द की अनुभूति होती है।"
श्रीकृष्ण के मध्य पौगण्ड में प्रवेश करने पर उनकी नाक नुकीला,
गाल गोल-गोल और दीप्त हो जाते हैं। पार्श्व अंग में त्रिवलि का उदय
होता है।
ऐसी अवस्था में गोपबालकों को श्रीकृष्ण के संग का बड़ा गर्व हुआ ।
उस समय श्रीकृष्ण की नाक तिल कुसुम का उपहास कर रही थी; कपोलों
की दीप्ति मणियों की ज्योति को हर रही थी और दोनों पार्श्व अंग
विशिष्ट सौन्दर्य को प्राप्त हो रहे थे। इस अवस्था में श्रीकृष्ण विद्युत् की
सी कान्ति वाला पीत रेशमी वस्त्र धारण करते हैं। उनके सिर पर रेशमी
वस्त्र की पगड़ी सुशोभित रहती है और हाथ में वे सोने की मूठ वाली
यष्टि धारण किये रहते हैं। इस काल की विशिष्ट लीलाओं का परिवेषण
भाण्डीरवन में होता है। यह भाण्डीरवन अन्य ग्यारह वनों के साथ
आज भी वृन्दावन धाम में है और सम्पूर्ण वृन्दावन की परिक्रमा करने
सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २८६
वाले भक्तजन आज भी इन वनों की शोभा का आस्वादन कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण के अप्रतिम सुन्दर रूप को देखकर एक भक्त अपने सखा से कहने
लगा, “हे मित्र ! तनिक श्रीकृष्ण की ओर तो देखो। आज वे दोनों ओर
सोने से मढ़ी हाथ की लाठी धारण किये हुए हैं और चमकते सुनहरी
रेशमी वस्त्र की पगड़ी पहने हुए उनकी वेशभूषा सखाओं को परम
आह्लादित कर रही है।”
पौगण्ड की शेष अवस्था में श्रीकृष्ण की केशराशि कभी नितम्बों तक
लटकने लगती है और कभी इधर-उधर बिखर जाती है। इस अवस्था में
उनके दोनों कंधे ऊँचे और चौड़े होते हैं और मुखमण्डल निरन्तर तिलक
के चिह्न से सुशोभित रहता है। उनके कंधों पर बिखरे बालों को
देखकर लगता है मानो श्रीदेवी उनका आलिंगन कर रही है। इस
आलिंगन का इनके सखा खूब आनन्द लेते हैं। सुबल ने एक बार उनसे
कहा था, “हे केशव ! तुम्हारी गोल-गोल पगड़ी, हाथ में पकड़ा हुआ
कमल, ललाट पर तिलक की सीधी रेखा, कुंकुम मिश्रित सुगन्ध और सुन्दर
वेष मुझे भी परास्त देने वाला है, यद्यपि मैं तुम और तुम्हारे सखाओं
से पराक्रमी हूँ। फिर स्वभाव से ही सरल-मृदु गोपांगनाओं की क्या दशा
होगी ?”
इस अवस्था में श्रीकृष्ण अपने सखाओं के कानों में धीरे-धीरे बोलने
में आनन्द लेते हैं और उनकी वार्ता का विषय होता है—गोपियों का सौन्दर्य,
जो सामने खड़े-खड़े उन्हें निहारा करती हैं। सुबल ने एक बार श्रीकृष्ण से
कहा, “अरे धूर्त ! तू बड़ा चतुर है। तू दूसरों के मन की जान लेता है,
इसलिए मैं तेरे कान में कहता हूँ कि सब गोपियों में ये जो पाँच सबसे
अधिक सुन्दर हैं, ये तेरी वेश-भूषा पर मोहित हो गई हैं। लगता है कन्दर्प
ने उन्हें तुझे परास्त करने में नियुक्त किया है।' भाव यह है कि यद्यपि
श्रीकृष्ण त्रिभुवनविजयी हैं, पर गोपियों का सौन्दर्य श्रीकृष्ण को जीत
सकता है।
कैशोर वय के लक्षणों का वर्णन पहले हो चुका है। यही वह अवस्था
है जब भक्त श्रीकृष्ण का सबसे अधिक आस्वादन कर सकते हैं। श्रीकृष्ण
की राधारानी के साथ किशोर-किशोरी के रूप में आराधना की जाती है।
श्रीकृष्ण की वय इस कैशोर से आगे नहीं बढ़ती। ब्रह्मसंहिता' में प्रमाण
हैं कि यद्यपि वे पुराणपुरुष हैं और अनन्त रूपधारी हैं फिर भी उनका
मूल रूप नित्य यौवन है। जब भी हम कुरुक्षेत्र के युद्ध में श्रीकृष्ण का कोई
चित्र देखते हैं तो उन्हें किशोर ही पाते हैं, यद्यपि उस समय तक उनके
२६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
बहुत से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र तक हो चुके थे। गोप-सखाओं ने एक बार
श्रीकृष्ण से कहा, "हे कृष्ण तुम्हें इन अलंकारों से क्या प्रयोजन ? तुम्हारा
दिव्य रूप इतना मनोहर है कि तुम्हें इनकी कोई आवश्यकता नहीं।"
इस अवस्था में जब भी श्रीकृष्ण प्रातःकाल अपनी वंशी को बजाते हैं तो
उनके सारे सखा तुरन्त शैय्या को त्याग कर उनके साथ गोचारण को
जाने के लिये प्रस्तुत हो जाते हैं। श्रीकृष्ण के एक सखा ने कहा, "हे गोप
बालकों ! गोवर्धन पर्वत के ऊपर से आ रही श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि
बता रही है कि अब हमें उन्हें खोजने के लिये यमुना तट पर नहीं जाना
पड़ेगा।"
पार्वती ने अपने पति भगवान् शिव से कहा, "हे पंचमुख ! तनिक
पाण्डवों की ओर देखिये । श्रीकृष्ण के पांचजन्य नामक शंख की ध्वनि को
सुनकर वे अपने बल को फिर से प्राप्त हो गये हैं और अब सिंह के समान
गर्जन कर रहे हैं।"
इस अवस्था में एक बार श्रीकृष्ण ने ठीक राधारानी सा वेष
बनाया। उनका प्रयोजन अपने मित्रों में हास-परिहास का संचार करना
था। उन्होंने सोने के कुण्डल धारण कर लिये और अपने काले रंग को
ढकने के लिये राधारानी के वर्ण के समान कुंकुम का आलेप कर लिया।
उनकी इस वेष-भूषा को देखकर सुबल मित्र को बड़ा आश्चर्य हुआ।
श्रीकृष्ण कभी-कभी खेल-खेल में अपने अंतरंग सखाओं के साथ लड़ते
अथवा भुजाओं से कुश्ती करते। कभी गेंद खेलते तो कभी द्यूत। कभी वे
एक दूसरे को अपने कंधे पर उठाते और कभी कूदने में अपनी कुशलता
दिखाते गोपबालक भी पलने के आसन वाले झूले पर साथ-साथ बैठकर
तथा नाना प्रकार के परिहास और जलाशयों में एक साथ विहार करके
श्रीकृष्ण को प्रसन्न करते थे। ये सब क्रियाएँ अनुभव कहलाती हैं। सब
सखा श्रीकृष्ण के संग में इकट्ठे होते तो वे तुरन्त इन सब कार्यों, विशेषतया
नाचने में प्रवृत्त हो जाते। उनकी कुश्ती के सम्बन्ध में एक मित्र श्रीकृष्ण
से कहता है, "सखा ! हे अघारी ! तुम बड़े अभिमान के साथ आज मित्रों
में घूम-घूमकर अपनी भुजाओं के बल का प्रदर्शन कर रहे हो इसका कारण
कहीं यह तो नहीं कि तुम मुझसे ईर्ष्यालु हो। मैं यह भली प्रकार से जानता
हूँ कि तुम कुश्ती में मुझे हरा नहीं सकते। मुझे हरा न सकने की निराशा
में मैंने तुम्हें बहुत देर तक अकेले बैठे देखा है।"
श्रीकृष्ण के सारे सखा बड़े ही साहसी थे। किसी भी कठिनाई
से नहीं डरते थे। उन्हें पूरा विश्वास था कि श्रीकृष्ण सब उद्यमों में
सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६१ ]
उन्हें विजयी बनायेंगे। वे आपस में बैठकर कर्तव्य-अकर्तव्य का विचार
करते, एक दूसरे को हितकार्य में प्रवृत्त करते । कभी-कभी वे एक-दूसरे के
मुख में पान खिलाते अथवा एक-दूसरे के शरीरों में चन्दन का आलेप
करते । कभी-कभी हास-परिहास के लिये वे विचित्र रूपों में अपने मुखों
को सजाते । श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य कार्य स्पर्धापूर्वक श्रीकृष्ण
को हराना था। वे उनके वस्त्रों को खींच लेते, तो कभी उनके हाथ में
पकड़े हुए पुष्पों को । कभी-कभी वे एक-दूसरे को अपने शरीर की सज्जा में
प्रवृत्त करते और ऐसा न करने पर हाथापाई का प्रसंग भी उठ आता ।
श्रीकृष्ण और उनके सखाओं के ये सामान्य कार्य हैं।
श्रीकृष्ण के सखाओं का एक अन्य महत्त्वपूर्ण कार्य गोपियों के पास
श्रीकृष्ण का और श्रीकृष्ण के पास गोपियों का दूत बनकर जाना है। वे
गोपियों से श्रीकृष्ण का परिचय कराते और फिर श्रीकृष्ण के लिये दूत का
कार्य करते । जब गोपियों और श्रीकृष्ण में प्रणयकलह हो जाती तो
श्रीकृष्ण की उपस्थिति में तो ये सखा श्रीकृष्ण का ही पक्ष लेते, परन्तु जब
श्रीकृष्ण वहाँ नहीं होते तो गोपियों का साथ देते। इस प्रकार कभी एक
का पक्ष लेते हुए और कभी दूसरे का पक्ष लेते हुए वे बड़ी चातुरी के साथ
कानाफूसी करते ।
श्रीकृष्ण के सेवक समय-समय पर उनके लिये फूल चुनते, उनके
शरीर को अलंकारों से सजाते-सँवारते, उनके आगे नाचते-गाते, उन्हें
गोचारण में सहायता देते, उनके शरीर की मालिश करते, उनके लिये
सुन्दर-सुन्दर पुष्पों के हार बनाते और कभी-कभी उन्हें हवा करते । ये सब
श्रीकृष्ण के सेवकों के प्रधान कर्तव्य हैं। श्रीकृष्ण के सखा और सेवक दोनों
मिलकर सेवा करते और उनकी इन सब क्रियाओं का नाम अनुभाव है ।
जब श्रीकृष्ण कालिय नाग का अनुशासन करके यमुना से निकले
तो श्रीदामा सबसे पहले उनका आलिंगन करने के लिये दौड़ा; परन्तु वह
चाहते हुए भी अपने स्तम्भित हाथों को ऊपर न उठा सका ।
जब श्रीकृष्ण अपनी वंशी बजाते तो उससे निकली ध्वनि स्वाति
नक्षत्र में आकाश में होने वाली मेघों की गर्जना जैसी लगती । वैदिक
ज्योति शास्त्र के अनुसार यदि स्वाति नक्षत्र की वर्षा सागर पर गिरे तो
वह मोती को जन्म देती है और यदि सर्प पर गिरे तो रत्नों की उत्पत्ति
होती है । इसी प्रकार जब स्वाति नक्षत्र के मेघगर्जन के समान श्रीकृष्ण
की वेणु गरजी तो श्रीदामा के शरीर पर उत्पन्न स्वेदकण मुक्ताहल की
सी शोभा पाने लगे ।
२६२] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्ण और श्रीदामा को परस्पर आलिंगन करते देखकर श्रीमती
राधारानी तनिक ईर्ष्या से भर गईं और अपने क्रोध को छिपाकर बोलीं,
"हे सुबल ! तुम बड़े भाग्यवान् हो, जो पूज्यों की उपस्थिति में भी तुम्हें
और श्रीकृष्ण को परस्पर आलिंगन करने में जरा संकोच नहीं हुआ ।
अवश्य ही तुमने पूर्वजन्म में महान् तप-त्याग किया होगा।" श्रीमती
राधारानी प्रायः श्रीकृष्ण का आलिंगन किया करती थीं। परन्तु पूज्यों की
उपस्थिति में उनके लिये ऐसा करना सम्भव न था; जबकि सुबल ऐसा
खुले रूप से कर सका । अतएव राधारानी ने उसके सौभाग्य की भूरि-भूरि
प्रशंसा की ।
जिस समय श्रीकृष्ण ने कालिय दह में प्रवेश किया तो उनके
अंतरंग सखा इतने उद्विग्न हो उठे कि उनके शरीर का रंग उड़ गया और
वे भयंकर धड़धड़ ध्वनि करने लगे । ऐसी अवस्था में वे तुरन्त अचेतन
होकर भूमि पर गिर पड़े । इसी प्रकार जब वन में अग्नि लगी तो श्रीकृष्ण
के सभी सखाओं ने अपने गोधन की चिन्ता किये बिना चारों ओर से
उन्हें घेर लिया और अग्नि की ज्वाला से उनकी रक्षा करने लगे। सखाओं
के इस व्यवहार को मनीषि जनों ने व्यभिचारी कहा है। व्यभिचारिभाव
में कभी-कभी मद, दक्षता, भय, आलस्य, हर्ष, गर्व, श्रम, धृति, व्याधि,
विस्मृति और दैन्य आदि भाव होते हैं। ये सब श्रीकृष्ण के व्यभिचारिभाव
के सामान्य लक्षण हैं ।
जब श्रीकृष्ण और उनके सखाओं में सम्भ्रम के भाव से सर्वथा
रहित रति होती है जिसमें वे एक-दूसरे को समान समझते हैं तो ऐसे सख्य
भाव को स्थायी कहते हैं। श्रीकृष्ण से ऐसी घनिष्ठ सख्यरति में प्रेम के
प्रणय, प्रेम, स्नेह तथा राग आदि लक्षण प्रकट रहते हैं । स्थायी का
उदाहरण अक्रूर से कहे अर्जुन (ये अर्जुन भगवद्गीता के अर्जुन से
भिन्न हैं) के वाक्य से प्रकट होता है—"हे गान्दिनीनन्दन ! कृपया
श्रीकृष्ण से पूछियेगा कि मैं अपनी भुजाओं में उनका आलिंगन कब
कर सकूँगा ?"
जब श्रीकृष्ण की श्रेष्ठता का पूर्ण ज्ञान हो, परन्तु फिर भी उनसे
सख्यरस के व्यवहार में सम्भ्रम की गन्ध का भी अभाव हो तो उस
अवस्था को प्रणय कहते हैं। इस प्रणय का एक उज्ज्वल उदाहरण
है—जब शिव आदि देवता भगवान् के कीर्तिमय ऐश्वर्यों को बखानते हुए
सादर प्रणाम कर रहे थे तो श्रीकृष्ण के सामने उनके कन्धे पर हाथ रख
कर खड़ा अर्जुन उनके मोरपंख से धूलि झाड़ने लगा ।
सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६३
जिस समय दुर्योधन द्वारा राज्य से निर्वासित होकर पाण्डव वन में
अज्ञातवास कर रहे थे उस समय कोई भी उनके निवास को नहीं जान
सका। ऐसे समय में देवर्षि नारद भगवान् श्रीकृष्ण से मिलने आए और
कहने लगे, "हे मुकुन्द ! आप परम पुरुष स्वयं भगवान् हैं। परन्तु फिर
भी आपकी मित्रता के कारण पाण्डव को विश्व के साम्राज्य के अपने
उचित अधिकार से वंचित होना पड़ा है और अब वे वन में अज्ञात वास
कर रहे हैं। यहाँ तक कि उन्हें दूसरों के यहाँ दास्य कर्म तक करना पड़ा
है। ये सब लक्षण लौकिक दृष्टि से बड़े अमंगलमय प्रतीत होते हैं।
परन्तु प्रसन्नता का विषय है कि इन सब दुःखों के होते हुए भी उनमें आपके
प्रति जो विश्वास और प्रेम था उसमें कोई अन्तर नहीं आया है। वास्तव
में तो वे निरन्तर आपके सख्यरूप अमृत में निमग्न हुए आपके नामों का
ही कीर्तन किया करते हैं।"
श्रीकृष्ण के लिये स्नेह के आधिक्य का उदाहरण श्रीमद्भागवत
(१०.१५.१८) में है। गोचारण भूमि में विचरते श्रीकृष्ण को तनिक
श्रान्ति अनुभव हुई और वे विश्राम चाहने लगे । अतएव भूमि पर
लेट गये । उस समय बहुत से गोप-बालक वहाँ एकत्रित हो गये
और बड़े स्नेह से गीत गाने लगे, जिससे श्रीकृष्ण भली प्रकार से विश्राम
कर सकें ।
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कृष्ण और अर्जुन के सख्य का उदाहरण
तो प्रसिद्ध है ही। युद्ध के बीच द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने अनुचित
रूप से श्रीकृष्ण पर आक्रमण किया। उस समय के प्रचलित युद्धनियमों के
अनुसार शत्रु को अपने शत्रु के सारथि पर कभी आक्रमण नहीं करना
चाहिए। अश्वत्थामा ने नाना प्रकार से पाप का आचरण करते हुए
श्रीकृष्ण के विग्रह पर भी आक्रमण करने में संकोच नहीं किया, यद्यपि
श्रीकृष्ण अर्जुन का सारथ्य कर रहे थे । जब अर्जुन ने देखा कि
अश्वत्थामा श्रीकृष्ण को मारने के लिये नाना प्रकार के बाण चला रहा है
तो वह उन्हें रोकने के लिये एकदम श्रीकृष्ण के आगे आकर खड़ा हो
गया । उस समय बाणों की चोट लगने पर भी अर्जुन को श्रीकृष्ण के
लिये दिव्य प्रेम का अनुभव हो रहा था; बाणों की मार उसे फूलों की
बरसात लग रही थी ।
सख्यभक्तिरस में श्रीकृष्ण के लिये प्रेमभाव का एक अन्य उदाहरण
इस प्रकार है। वृषभ नामक गोपबालक वन में श्रीकृष्ण की माला के
लिये पुष्प चुन रहा था । तभी मध्याह्न काल हो आया और सूर्य
२६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
ज्योति बड़ी प्रचण्ड हो उठी। परन्तु फिर भी वृषभ को वह चन्द्रिका के
समान शीतल प्रतीत हो रही थी। वास्तव में भगवान् की दिव्य प्रेममयी
सेवा करने की यही विधि है। जब भी भक्तों को कष्ट होता है तो पाण्डवों
के समान जैसा ऊपर वर्णन किया गया है, वे समझते हैं कि यह दुःख
भगवान् की सेवा के लिये महान् अवसर है।
श्रीकृष्ण से अर्जुन के सख्य का वर्णन करते हुए नारदजी ने श्रीकृष्ण
को स्मरण कराया, "बाण-विद्या को सीखने में लगा अर्जुन बहुत दिनों से
आपको देख नहीं पाया था। परन्तु जैसे ही आप वहाँ पहुँचे, उसने अपने
सम्पूर्ण कार्य रोक दिये और तुरन्त आपका आलिंगन किया।" तात्पर्य यह
है कि युद्धविद्या सीखने में तत्पर होने पर भी अर्जुन श्रीकृष्ण को क्षणभर
के लिये भी नहीं भूला और जैसे ही उसे श्रीकृष्ण को देखने का अवसर मिला,
अर्जुन ने तत्क्षण उनका आलिंगन किया।
श्रीकृष्ण के एक पत्री नामक सेवक ने उनका एक बार सम्बोधन
करते हुए कहा, "हे नाथ ! आपने गोपबालकों की अघासुर की भूख से,
कालिय के विष से और भयंकर वन-अग्नि से रक्षा की है; परन्तु मैं
आपकी विरह-अग्नि से पीड़ित हूँ, जो अघासुर की भूख, कालिय के
विष, और वन की अग्नि से भी अधिक है। ऐसे में इस विरह अग्नि से
आप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?" एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा,
"हे कंसारि ! जब से हमें छोड़ गये हो तब से विरह की ज्वाला असाधारण
हो उठी है। यह विरह व्यथा अधिक तीव्र हो उठती है जब हम यह जानते
हैं कि भाण्डीर वन में आप भानु तनया राधारानी रूपी शीतल नदी
की लहरों में श्रम खो रहे हैं।"
कोई मित्र श्रीकृष्ण से कहता है, 'हे कृष्ण ! हे अघारी ! राजा कंस
को मारने के लिये तुम्हारे मथुरा चले जाने पर सब गोपबालकों के शरीरों
में पाँच में से चार भूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश कृशता को
प्राप्त हो गये और पाँचवा, अर्थात् वायु भी उनकी श्वासमार्ग में बड़ी
तीव्रता से चलने लगा।" कंस के वध के लिये श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने
पर सब के सब गोप बालक विरह से ऐसे व्यथित हुए कि मृतप्रायः हो
गए। जब कोई मर जाता है तो कहा जाता है कि उसने पंचमहाभूतों को
छोड़ दिया है क्योंकि मृत देह पुनः इन पंचमहाभूतों में मिलकर विलीन हो
जाती है। इस सन्दर्भ में पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश, ये चार तत्त्व तो
बिल्कुल चले ही जा चुके थे; पाँचवा वायु तब भी बड़ा प्रधान था और
बड़ी ही तीव्र गति से उनके श्वास मार्ग में चल रहा था। भाव यह है कि
जब श्रीकृष्ण वृन्दावन को छोड़ गए, तब गोपबालकों को इस बात की
बड़ी चिन्ता हुई कि कंस से उनके युद्ध में क्या परिणाम होगा ।
एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा, "हे सखे ! एक मित्र को
तुम्हारे विरह ने ऐसा सताया कि उसके नेत्र रूपी कमल अश्रुधारा से
अभिपूरित हो गये। अतएव निद्रारूपी काले भ्रमरों ने उसके नेत्रों में
प्रवेश नहीं किया और उस स्थान को छोड़कर चले गये।" भ्रमर प्रायः मधु-
संचय के लिये कमल पर मँडराया करते हैं। श्रीकृष्ण के सखा के नेत्रों को
कमल की उपमा दी गई है और क्योंकि वे अश्रुधारा से पूर्ण थे, इसलिये
निद्रारूपी भ्रमर उसके नेत्ररूपी कमलों से मधु का संचय नहीं कर सके
और वहाँ से चले गये । भाव यह है कि विरह से अत्यधिक अभिभूत होने
के कारण उसके नेत्र भर आये और वह सो न सका । यह श्रीकृष्ण के विरह
में निद्रानाश का उदाहरण है।
आलम्बनशून्यता का उदाहरण इस प्रकार है—"श्रीकृष्ण के वृन्दावन
से मथुरा चले जाने पर श्रीकृष्ण के प्रियतम ग्वाल सखाओं के चित्त
एकदम हलका हो गये और रूई के समान हवा में इधर-उधर निरा-
श्रित होकर चक्कर खाने लगे।" भाव यह है कि श्रीकृष्ण के विरहवश
गोपबालकों के मन बिल्कुल सारहीन हो गये । अधृति का भी एक उदा-
हरण गोपबालकों में तब प्रकट हुआ जब श्रीकृष्ण मथुरा को गये थे।
विरह की व्यथा में ये सब बालक अपने गोधन का ध्यान करना भूल गये
और उन मधुर गीतों को भुलाने का प्रयास करने लगे जो वे गोचारण
करते समय गाया करते थे। श्रीकृष्ण के विरह में उनमें जीने की भी कोई
इच्छा शेष न रही ।
श्रीकृष्ण के विरह में होने वालीं जड़ता का वर्णन करते हुए एक
सखा उनसे बोला कि उनके विरह में गोपबालक पर्वत-शिखरों पर खड़े
पत्तों से रहित वृक्ष जैसे हो गये हैं। पत्तों अर्थात् वेशभूषा से रहित होने के
कारण वे अत्यन्त कृश और रूखे लगते हैं। उनमें फल-फूलों अर्थात् कान्ति
का भी सर्वथा अभाव हो गया है। इस प्रकार सब के सब गोपबालक पर्वत
के शिखरों पर खड़े वृक्षों के समान स्तम्भित लग रहे थे। कभी-कभी
उन्हें श्रीकृष्ण के विरह में व्याधि का अनुभव होता और इस प्रकार तीव्र
विरहज्वर से शिथिलप्रायः होकर वे यमुना तट पर इधर-उधर टहलने
-गते ।
श्रीकृष्णविरह में होने वाले उन्माद के भी अनेक उदाहरण हैं।
जब श्रीकृष्ण वृन्दावन से चले गये तो सारे गोपबालकों को उन्माद हो
२६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
आया और वे सब प्रकार के जगत्-व्यवहार को भूल बैठे। इस पागलपन में
उन्हें अपने दैनिक कर्तव्यों की भी सुध न रही। वे कभी भूमि पर सो जाते,
कभी धूलि में लौटने लगते, कभी हँसने और कभी दौड़ने लग जाते। ये
सब लक्षण उन्हें पागल सिद्ध कर रहे थे। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनकी
निन्दा करते हुए कहा, "हे नाथ ! कंस को मार कर अब आप मथुरा के
नरेश बन गये हैं। यह बड़ा मंगलमय समाचार है। परन्तु वृन्दावन का भी
कुछ विचार करें। वहाँ के सारे निवासी आपके विरह में निरन्तर रोने के
कारण अन्धे हो चले हैं। वे व्याकुलता से पूर्ण हैं और उन्हें आपके मथुरा
नरेश बन जाने पर तनिक भी हर्ष नहीं है।"
कभी-कभी श्रीकृष्ण के विरह में मृत्यु के लक्षण भी होते हैं। एक
बार श्रीकृष्ण से कहा गया, "हे कंसारि श्रीकृष्ण ! तुम्हारे विरह की पीड़ा
में गोप-बालक बहुत अधिक कष्ट पा रहे हैं और अब पर्वत की घाटियों
में मन्द-मन्द श्वास लेते हुए पड़े हैं। उनकी दयनीय अवस्था से सहानुभूति
दिखाते हुए वन के मृग तक आँसू बहा रहे हैं।"
स्कन्दपुराण के मथुराखण्ड में गोपबालकों के साथ निरन्तर गोधन
की देखभाल करते हुए कृष्ण-बलराम का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण द्रुपद
नगर में कुम्भकार के घर में अर्जुन से मिले तो अपने शारीरिक रूप की
समानता के कारण उनमें अंतरंग घनिष्टता हो गई। यह योग में सिद्धि,
अर्थात् समान देहों के आकर्षण से होने वाली मित्रता का उदाहरण है।
श्रीमद्भागवत (१०.७१.२७) में उल्लेख है कि जब श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ
नगरी में पधारे तो प्रेम और आनन्द से विह्वल हुए भीमने अश्रुपूरित नेत्रों
से और हँसते हुए मुख से अपने ममेरे भाई का तुरन्त आलिंगन कर लिया।
उनके पीछे-पीछे अर्जुन के साथ नकुल, सहदेव भी खड़े थे और वे
भी श्रीकृष्ण का दर्शन पाकर ऐसे अभिभूत हो गये कि श्रीअच्युत का
आलिंगन करके पूर्ण सन्तोष प्राप्त किया। वृन्दावन के गोपबालकों के
सम्बन्ध में ऐसा ही कथन है। जिस समय श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में
विराज रहे थे; उस समय सारे गोपबालक नाना प्रकार के कर्ण-कुण्डल
पहनकर उनके पास उन्हें देखने आये। अपने पुराने मित्र को देखकर
रोमांचित भुजाओं से उन्होंने श्रीकृष्ण का अलिंगन किया। ये सब श्रीकृष्ण
के सख्य में होने वाले पूर्ण सन्तोष के उदाहरण हैं।
श्रीमद्भागवत (१०.१२.१२) में कथन है कि महान् ध्यानयोगियों
के लिये कठोर तप-त्याग और योग का अभ्यास करने पर भी जिनके चरण-
कमलों की रज दुर्लभ है, वही श्रीभगवान् वृन्दावनवासियों के लिये सुगमता
'सख्यरस में प्रेम के व्यवहार [ २६७
से दृष्टिगोचर हैं। भाव यह है कि इन भक्तों के महाभाग्य की कोई तुलना
नहीं है। गोपवालों का श्रीकृष्ण से जो सख्य सम्बन्ध है वह विशिष्ट
प्रकार की दिव्य भावानुभूति है और प्रायः माधुर्य प्रेमभाव जैसा है।
गोपबालकों और श्रीकृष्ण में होने वाले प्रेम व्यवहार का वर्णन बहुत
कठिन है। श्रील रूप गोस्वामी जैसे विरक्त भक्तों ने श्रीकृष्ण और उनके
गोपबाल सखाओं के अनिर्वचनीय भावों पर विस्मय व्यक्त किया है।
श्रीकृष्ण और उनके अन्तरंग सखाओं द्वारा परस्पर आस्वादित यह
विशेष प्रकार का प्रेमभाव आगे वात्सल्यप्रेम में विकसित होता है और
उससे आगे माधुर्यप्रेम का रूप धारण कर लेता है, जो श्रीकृष्ण और उनके
भक्तों में होने वाला सर्वोच्च रस है।