भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
आया और वे सब प्रकार के जगत्-व्यवहार को भूल बैठे। इस पागलपन में
उन्हें अपने दैनिक कर्तव्यों की भी सुध न रही। वे कभी भूमि पर सो जाते,
कभी धूलि में लौटने लगते, कभी हँसने और कभी दौड़ने लग जाते। ये
सब लक्षण उन्हें पागल सिद्ध कर रहे थे। श्रीकृष्ण के एक सखा ने उनकी
निन्दा करते हुए कहा, "हे नाथ ! कंस को मार कर अब आप मथुरा के
नरेश बन गये हैं। यह बड़ा मंगलमय समाचार है। परन्तु वृन्दावन का भी
कुछ विचार करें। वहाँ के सारे निवासी आपके विरह में निरन्तर रोने के
कारण अन्धे हो चले हैं। वे व्याकुलता से पूर्ण हैं और उन्हें आपके मथुरा
नरेश बन जाने पर तनिक भी हर्ष नहीं है।"
कभी-कभी श्रीकृष्ण के विरह में मृत्यु के लक्षण भी होते हैं। एक
बार श्रीकृष्ण से कहा गया, "हे कंसारि श्रीकृष्ण ! तुम्हारे विरह की पीड़ा
में गोप-बालक बहुत अधिक कष्ट पा रहे हैं और अब पर्वत की घाटियों
में मन्द-मन्द श्वास लेते हुए पड़े हैं। उनकी दयनीय अवस्था से सहानुभूति
दिखाते हुए वन के मृग तक आँसू बहा रहे हैं।"
स्कन्दपुराण के मथुराखण्ड में गोपबालकों के साथ निरन्तर गोधन
की देखभाल करते हुए कृष्ण-बलराम का वर्णन है। जब श्रीकृष्ण द्रुपद
नगर में कुम्भकार के घर में अर्जुन से मिले तो अपने शारीरिक रूप की
समानता के कारण उनमें अंतरंग घनिष्टता हो गई। यह योग में सिद्धि,
अर्थात् समान देहों के आकर्षण से होने वाली मित्रता का उदाहरण है।
श्रीमद्भागवत (१०.७१.२७) में उल्लेख है कि जब श्रीकृष्ण इन्द्रप्रस्थ
नगरी में पधारे तो प्रेम और आनन्द से विह्वल हुए भीमने अश्रुपूरित नेत्रों
से और हँसते हुए मुख से अपने ममेरे भाई का तुरन्त आलिंगन कर लिया।
उनके पीछे-पीछे अर्जुन के साथ नकुल, सहदेव भी खड़े थे और वे
भी श्रीकृष्ण का दर्शन पाकर ऐसे अभिभूत हो गये कि श्रीअच्युत का
आलिंगन करके पूर्ण सन्तोष प्राप्त किया। वृन्दावन के गोपबालकों के
सम्बन्ध में ऐसा ही कथन है। जिस समय श्रीकृष्ण कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में
विराज रहे थे; उस समय सारे गोपबालक नाना प्रकार के कर्ण-कुण्डल
पहनकर उनके पास उन्हें देखने आये। अपने पुराने मित्र को देखकर
रोमांचित भुजाओं से उन्होंने श्रीकृष्ण का अलिंगन किया। ये सब श्रीकृष्ण
के सख्य में होने वाले पूर्ण सन्तोष के उदाहरण हैं।
श्रीमद्भागवत (१०.१२.१२) में कथन है कि महान् ध्यानयोगियों
के लिये कठोर तप-त्याग और योग का अभ्यास करने पर भी जिनके चरण-
कमलों की रज दुर्लभ है, वही श्रीभगवान् वृन्दावनवासियों के लिये सुगमता