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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 380 में से

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पृष्ठ 321

२६४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
ज्योति बड़ी प्रचण्ड हो उठी। परन्तु फिर भी वृषभ को वह चन्द्रिका के
समान शीतल प्रतीत हो रही थी। वास्तव में भगवान् की दिव्य प्रेममयी
सेवा करने की यही विधि है। जब भी भक्तों को कष्ट होता है तो पाण्डवों
के समान जैसा ऊपर वर्णन किया गया है, वे समझते हैं कि यह दुःख
भगवान् की सेवा के लिये महान् अवसर है।
श्रीकृष्ण से अर्जुन के सख्य का वर्णन करते हुए नारदजी ने श्रीकृष्ण
को स्मरण कराया, "बाण-विद्या को सीखने में लगा अर्जुन बहुत दिनों से
आपको देख नहीं पाया था। परन्तु जैसे ही आप वहाँ पहुँचे, उसने अपने
सम्पूर्ण कार्य रोक दिये और तुरन्त आपका आलिंगन किया।" तात्पर्य यह
है कि युद्धविद्या सीखने में तत्पर होने पर भी अर्जुन श्रीकृष्ण को क्षणभर
के लिये भी नहीं भूला और जैसे ही उसे श्रीकृष्ण को देखने का अवसर मिला,
अर्जुन ने तत्क्षण उनका आलिंगन किया।
श्रीकृष्ण के एक पत्री नामक सेवक ने उनका एक बार सम्बोधन
करते हुए कहा, "हे नाथ ! आपने गोपबालकों की अघासुर की भूख से,
कालिय के विष से और भयंकर वन-अग्नि से रक्षा की है; परन्तु मैं
आपकी विरह-अग्नि से पीड़ित हूँ, जो अघासुर की भूख, कालिय के
विष, और वन की अग्नि से भी अधिक है। ऐसे में इस विरह अग्नि से
आप मेरी रक्षा क्यों नहीं करते?" एक अन्य मित्र श्रीकृष्ण से कहने लगा,
"हे कंसारि ! जब से हमें छोड़ गये हो तब से विरह की ज्वाला असाधारण
हो उठी है। यह विरह व्यथा अधिक तीव्र हो उठती है जब हम यह जानते
हैं कि भाण्डीर वन में आप भानु तनया राधारानी रूपी शीतल नदी
की लहरों में श्रम खो रहे हैं।"
कोई मित्र श्रीकृष्ण से कहता है, 'हे कृष्ण ! हे अघारी ! राजा कंस
को मारने के लिये तुम्हारे मथुरा चले जाने पर सब गोपबालकों के शरीरों
में पाँच में से चार भूत अर्थात् पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश कृशता को
प्राप्त हो गये और पाँचवा, अर्थात् वायु भी उनकी श्वासमार्ग में बड़ी
तीव्रता से चलने लगा।" कंस के वध के लिये श्रीकृष्ण के मथुरा चले जाने
पर सब के सब गोप बालक विरह से ऐसे व्यथित हुए कि मृतप्रायः हो
गए। जब कोई मर जाता है तो कहा जाता है कि उसने पंचमहाभूतों को
छोड़ दिया है क्योंकि मृत देह पुनः इन पंचमहाभूतों में मिलकर विलीन हो
जाती है। इस सन्दर्भ में पृथ्वी, जल, अग्नि और आकाश, ये चार तत्त्व तो
बिल्कुल चले ही जा चुके थे; पाँचवा वायु तब भी बड़ा प्रधान था और
बड़ी ही तीव्र गति से उनके श्वास मार्ग में चल रहा था। भाव यह है कि