भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
उत्तम भक्ति का स्वरूप है।" भाव यह है कि कृष्णभावनाभावित प्रतिकूल-
भाव से भी हुआ जा सकता है; परन्तु यह शुद्ध भक्तियोग नहीं कहला
सकता। शुद्ध भक्तियोग के लिए इन्द्रियतृप्ति की प्राकृत अभिलाषा से मुक्त
होना आवश्यक है, क्योंकि ऐसी इच्छाओं के उठने में सकाम कर्म और
मनोधर्ममय ज्ञान ही कारण होते हैं। सामान्यतः लोग किसी न किसी
प्राकृत लाभ की इच्छा से नाना क्रियाओं में प्रवृत्त रहते हैं, जबकि अधिकांश
दार्शनिक वाग्चातुर्य और मनोधर्म के आधार से ब्रह्मानुभूति का प्रस्थापन
करना चाहते हैं। शुद्ध भक्तियोग ऐसे सब कर्म-ज्ञान से मुक्त होता है।
उस कृष्णभावना अथवा शुद्धभक्ति की शिक्षा रागानुगा सेवा के द्वारा
आचार्यों से ग्रहण करनी चाहिए।
यह भक्ति एक प्रकार का अनुशीलन, अर्थात् सेवन है। यह
निष्क्रियता नहीं है, जो आलसी मनुष्यों अथवा चुपचाप ध्यान में समय
बिताने वालों को प्रिय होती है। इस स्वभाव के मनुष्यों के लिए अन्य बहुत
से मार्ग हैं; परन्तु कृष्णभावना का अनुशीलन इन सब से भिन्न है। इस
संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी ने 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग किया है।
इसका अर्थ पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिन्हों का अनुगमन करते हुए सेवन
करना है। जब हम 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग करते हैं तो हमारा
अभिप्राय क्रिया से होता है। क्रिया के बिना केवल भावना (चेतना) से
लाभ नहीं हो सकता। सब प्रकार की क्रियाओं के दो वर्ग किये जा सकते
हैं। एक वे जिनका कुछ निश्चित लक्ष्य है और दूसरी वे जो किसी
प्रतिकूलता के निवारण के लिए की जाती हैं। इन्हें क्रमशः 'प्रवृत्ति' और
'निवृत्ति' कहा जाता हैं। द्वितीय श्रेणी की क्रियाओं के अनेक उदाहरण हैं।
जैसे रोगी को सावधान रहकर कुछ औषधि का सेवन करना होता है,
जिससे रोगरूपी प्रतिकूलता दूर हो जाय।
जो परमार्थ के सेवन और भक्तियोग के आचरण में संलग्न हैं, वे
सदा क्रियाशील रहते हैं। ऐसी क्रिया शरीर से अथवा मन से की जा सकती
है। विचार, संवेदन और संकल्प—ये सब मन की क्रियायें हैं। संकल्प होने
पर ही स्थूल शारीरिक अंगों से क्रिया प्रत्यक्ष बनती है। अतएव पूर्ववर्ती
आचार्यों और गुरुदेव का अनुगमन करते हुए मन को नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण
के चिन्तन और उनकी प्रसन्नता के साधन की चेष्टा में लगाए रखना
चाहिए। मन के अतिरिक्त देह, इन्द्रियों और वाणी की अपनी-अपनी
क्रियायें हैं। कृष्णभावनाभावित पुरुष वाणी को भगवत्-कीर्ति प्रचार में
नियुक्त रखता है। इसी का नाम 'कीर्तन' है। मन के द्वारा वह सदा
४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
भगवान् की लीला के चिन्तन में डूबा रहता है—किस प्रकार वे कुरुक्षेत्र में
गीता का गान कर रहे हैं अथवा भक्तों सहित वृन्दावन धाम में लीलामग्न
हैं। इस विधि से सदा-सर्वदा भगवान् की लीला का स्मरण किया जा
सकता है। यह कृष्णभावना की मानस-सेवा है। इसी प्रकार, शारीरिक
क्रियाओं से भी अनेक प्रकार से सेवा की जा सकती है। परन्तु ऐसा सम्पूर्ण
सेवा-कार्य श्रीकृष्ण से सम्बन्धित होना चाहिए। श्रीकृष्ण के परम्परागत
साक्षात प्रतिनिधि—गुरुदेव के चरणारविन्द का आश्रय लेने से यह सम्बन्ध
स्थापित हो जाता है। अतः शरीर द्वारा कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का
आचरण गुरुदेव की आज्ञा के अनुसार श्रद्धापूर्वक करना कर्तव्य है।
गुरु-पादाश्रय का नाम दीक्षा है। गुरुदीक्षा के दिन से श्रीकृष्ण और कृष्ण-
भावना के सेवक में एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। सद्गुरु से दीक्षित
हुए बिना कृष्णभावना से यथार्थ सम्बन्ध होता ही नहीं।
कृष्णभावना का यह सेवन प्राकृत नहीं है। सामान्यतः श्री भगवान्
की तीन शक्तियाँ हैं—बहिरंगा, अन्तरंगा और तटस्था। जीव तटस्था
शक्ति कहलाते हैं, जबकि प्राकृत सृष्टि बहिरंगा शक्ति अथवा अपरा प्रकृति
का कार्य है। फिर, एक वैकुण्ठ-जगत् है, जो अन्तरंगा शक्ति का प्रकाश
है। जीव तटस्था शक्ति इसलिए कहलाते हैं, क्योंकि अपरा बहिरंगा शक्ति
के अधीन कार्य करते समय वे प्राकृत कर्म करते हैं और जब अन्तरंगा परा
शक्ति के अन्तर्गत क्रियाशील रहते हैं, तो उनके कर्म कृष्णभावनाभावित हो
जाते हैं। भाव यह है कि महात्मा महाभागवत पुरुषों का कार्य माया के
आधीन नहीं होता; वे परा प्रकृति के आश्रय में कर्म करते हैं। भक्तियोग
अथवा कृष्णभावना में जो कुछ किया जाता है, वह सब प्रत्यक्ष रूप से परा
प्रकृति के नियन्त्रण में है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति एक प्रकार की
शक्ति है जिसे योग्यगुरु और श्रीकृष्ण दोनों की कृपा से दिव्य बनाया जा
सकता है।
कृष्णदास कविराज द्वारा विरचित 'चैतन्यचरितामृत' में श्रीचैतन्य
महाप्रभु कहते हैं कि किसी दुर्लभ भाग्यवान् पुरुष को ही श्रीकृष्ण की कृपा
से सद्गुरु का संग प्राप्त होता है। परमार्थ के यथार्थ जिज्ञासु को श्रीकृष्ण
ऐसा बुद्धियोग देते हैं, जिससे वह सद्गुरु की शरण में चला जाता है और
फिर, गुरुकृपा से कृष्णभावना में उन्नति करता है। इस प्रकार कृष्णभावना
का सम्पूर्ण परिमण्डल साक्षात् परा प्रकृति—गुरु और श्रीकृष्ण के आधीन
है। प्राकृत-जगत् से इसका कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। 'कृष्ण' नाम अंशों
सहित साक्षात् श्रीभगवान् का वाचक है। श्रीकृष्ण के असंख्य स्वांश,
प्रस्तावना [ ५
भिन्न-अंश और भिन्न-भिन्न शक्ति-प्रकाश हैं। दूसरे शब्दों में, 'कृष्ण' सब
कुछ है; 'कृष्ण' में सम्पूर्ण तत्त्व का समावेश है। परन्तु सामान्यतः हमें
कृष्णनाम से श्रीकृष्ण और उनके अंशों को ही समझना चाहिए। श्रीकृष्ण
बलदेव, संकर्षण, वासुदेव, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न, राम, नृसिंह, वराह, आदि
अंशों और विष्णुमूर्तियों में प्रकाशित हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार, ये सब
अंश और अवतार सागर की लहरों के समान ही असंख्य हैं। अस्तु,
श्रीकृष्ण के तत्त्व में इन सभी अंशों और शुद्धभक्तों का समावेश है।
ब्रह्मसंहिता के अनुसार श्रीकृष्ण के अंश पूर्ण आनन्दमय, चिन्मय और
नित्य हैं।
भक्तियोग का तात्पर्य उन कृष्णभावनाभावित क्रियाओं का
आचरण करना है, जो भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य आनन्द के अनुकूल हों,
उसका वर्धन करें। इसके विपरीत, जो क्रिया श्रीभगवान् के दिव्य आनन्द
के प्रतिकूल है, वह भक्ति नहीं हो सकती। उदाहरणार्थ, रावण, कंस,
हिरण्यकशिपु जैसे महादानव निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण किया करते थे;
परन्तु वे ऐसा उन्हें अपना शत्रु समझ कर करते थे। इसप्रकार के चिन्तन
को भक्तियोग अथवा कृष्णभावना नहीं कहा जा सकता।
निर्विशेषवादी कभी-कभी भक्तियोग को ऐसे भ्रान्त रूप में समझते
हैं कि श्रीकृष्ण को उनके लीलापरिकर और उपकरणों से अलग कर बैठते
हैं। जैसे, सब जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता का प्रवचन कुरुक्षेत्र में
किया। परन्तु निर्विशेषवादियों का कहना है कि श्रीकृष्ण का महत्त्व तो
है, पर कुरुक्षेत्र का नहीं है। भक्त भलीभांति समझते हैं कि श्रीकृष्ण से
सम्बन्ध के बिना कुरुक्षेत्र से उनका कोई प्रयोजन नहीं होता। इसके अति-
रिक्त, कृष्णनाम का अभिप्राय केवल श्रीकृष्ण तक सीमित नहीं है। श्रीकृष्ण
सदा अपनी लीला के परिकरों और उपकरणों से युक्त रहते हैं। जैसे कोई
कहे, "शस्त्रधारी को भोजन कराओ।" भोजन शस्त्रधारी मनुष्य ही करता
है, शस्त्र नहीं; शस्त्र उसकी पहचान का साधन अवश्य है। ऐसे ही,
कृष्णभावना में कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि आदि उन सभी उपकरणों और स्थलों
में भक्त की रुचि रहती है, जिनका श्रीकृष्ण से कुछ भी सम्बन्ध हो। वे
किसी साधारण युद्धभूमि में रुचि नहीं लेते। उनकी रुचि श्रीकृष्ण में,
उनकी वाणी में, उनके उपदेश आदि में है। श्रीकृष्ण वहाँ हैं, इसीलिए
कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि का इतना महत्त्व है।
कृष्णभावना क्या है—उपरोक्त वर्णन में यह सार रूप में निभृत
है। इस बोध के बिना यह समझने में अवश्य भूल होगी कि भक्त कुरुक्षेत्र
६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
की युद्धभूमि में क्यों रुचि रखते हैं। जिसकी श्रीकृष्ण में रुचि है, वह
उनकी विविध लीलाओं और क्रियाओं में भी रुचि लेता है।
'भक्तिरसामृतसिन्धु' में श्रील रूप गोस्वामी द्वारा वर्णित लक्षणों
के अनुसार शुद्धभक्त के स्वरूप का संक्षिप्त निरूपण इस प्रकार है : वह
सदा अनुकूल भाव से श्रीकृष्ण की सेवा के परायण रहता है। ऐसी कृष्ण-
भावनाभावित क्रियाओं की शुद्धता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है
कि वह सब प्रकार की प्राकृत इच्छाओं और मनोधर्म से मुक्त हो। भगवत्-
सेवा करने की इच्छा के अतिरिक्त अन्य सभी इच्छायें प्राकृत हैं। साथ
ही, उस मनोधर्मी का भी निषेध है, जिससे अन्त में शून्यवाद अथवा निर्वि-
शेषवाद का निष्कर्ष निकले। कृष्णभावनाभावित पुरुष के लिए ऐसा निष्कर्ष
निरर्थक है। यह बड़ा दुर्लभ है कि कोई दार्शनिक मनोधर्म के द्वारा वासुदेव
(भगवान् श्रीकृष्ण) की आराधना के निष्कर्ष पर पहुँच जाय। स्वयं भगवद्-
गीता इस कथन की पुष्टि है। अस्तु, दार्शनिक मनोधर्म का अन्तिम लक्ष्य
भी यह जान लेना है कि श्रीकृष्ण साक्षात् भगवान् हैं; वे सर्वव्यापक और
सब कारणों के परम कारण हैं, इसलिए उन्हीं के शरणागत हो जाना
चाहिए। यदि यह अन्तिम लक्ष्य उपलब्ध हो जाय, तो दार्शनिक उन्नति
अनुकूल है; परन्तु यदि उससे शून्यवाद अथवा निर्विशेषवाद सिद्ध होता
है, तो उसे भक्ति नहीं कहा जा सकता।
कर्म से प्रायः सकाम कर्मकाण्ड का अर्थ किया जाता है। ऐसे
बहुत से मनुष्य हैं, जिनकी वैदिक कर्मकाण्ड में प्रगाढ आसक्ति है। परन्तु
यदि कोई श्रीकृष्ण के बोध के बिना कर्मकाण्ड में आसक्त हो, तो उसके
कर्म कृष्णभावना के प्रतिकूल समझे जायेंगे। वास्तव में कृष्णभावना के
लिए श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि साधन पर्याप्त हैं। श्रीमद्भागवत में
भक्ति के नौ साधनों का उल्लेख है। इनके अतिरिक्त अन्य जो कुछ भी
किया जायगा, वह कृष्णभावना के प्रतिकूल होगा। अतः इन पतनों से अपने
को बचाना चाहिए।
श्रील रूप गोस्वामी ने भक्ति के निरूपण में 'ज्ञानकर्मादि' शब्द का
प्रयोग किया है। 'कर्म' शब्द से उन क्रियाओं की ओर संकेत है, जो शुद्ध
भक्तियोग के अनुकूल नहीं हैं। वैराग्य के बहुत से मिथ्या रूप भी कृष्ण-
भावनाभावित भक्तियोग के अनुकूल नहीं होते।
भक्ति के लक्षणों का प्रतिपादन करने के लिए श्रील रूप गोस्वामी ने
'नारदपंचरात्र' से एक श्लोक उद्धृत किया है—'कृष्णभावनाभावित होकर
सब प्रकार की उपाधियों और दोषों से मुक्त हो जाना चाहिए। ऐसी
१. पूर्व विभाग: साधन, भाव व प्रेमाभक्ति लहरी
प्रस्तावना [ ७
अवस्था में अपने यथार्थ स्वरूप को फिर प्राप्त करे। इस प्रकार स्वरूप को
प्राप्त हुआ पुरुष अपनी इन्द्रियों से इन्द्रियों के स्वामी, भगवान् श्रीकृष्ण
की सेवा के परायण रहता है।' अतएव इन्द्रियों का अपने यथार्थ स्वामी की
सेवा में तत्पर रहने का नाम ही भक्तियोग है। बद्ध अवस्था में इन्द्रियाँ
शरीर की माँगों की पूर्ति में लगी रहती हैं। जब वही इन्द्रियाँ श्रीकृष्ण के
आज्ञापालन में लग जाती हैं, तो उसे भक्ति कहते हैं।
जब तक मनुष्य समझता है कि वह किसी परिवार का अथवा
समाज का है और शरीर में आत्मबुद्धि रखता है, तब तक वह उपाधि-
बद्ध है। जब इस बात का पूरा बोध होता है कि वह किसी परिवार, समाज
अथवा देश का नहीं है, वरन् श्रीकृष्ण से उसका शाश्वत् सम्बन्ध है, उस
समय वह अनुभव करता है कि उसे अपनी शक्ति का उपयोग तथाकथित
परिवार, समाज और राष्ट्र के स्वार्थ के लिए न करके श्रीकृष्ण की सेवा
में करना चाहिए। यही जीवन का शुद्ध प्रयोजन और कृष्णभावनाभावित
शुद्ध भक्तियोग है।
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अथ पूर्व विभागः
रसोपयोगीस्थायिभाव
नामावली हेतु पाठ
रामलीलाप्रकाशन
अध्याय १
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण
श्रीमद्भागवत (३.२६.१२-१३) में माता देवहूति को उपदेश करते
हुए भगवान् कपिल ने शुद्ध भक्तियोग के ये लक्षण बताए हैं, "हे जननि !
जो मेरे शुद्धभक्त हैं, जिन्हें सकाम कर्म अथवा ज्ञान से कोई प्रयोजन नहीं,
उनका चित्त मेरी सेवा में इतना तन्मय रहता है कि वे मुझसे उस सेवा के
अतिरिक्त कभी और कुछ अभिलाषा नहीं करते । यहाँ तक कि मेरे धाम
में रहने की इच्छा भी वे नहीं करते ।"
मुक्ति के पाँच भेद हैं : सायुज्य (भगवान् से एक हो जाना);
सालोक्य (भगवान् के लोक में वास); सारूप्य (भगवान् के समान रूप
की प्राप्ति); साष्टि (भगवान् के समान ऐश्वर्य की प्राप्ति); और सामीप्य
(भगवान् के संग में रहना) । प्राकृत इन्द्रियतृप्ति की तो बात ही क्या, भक्त
तो किसी प्रकार मुक्ति भी नहीं चाहता । वह तो बस प्रेममयी भगवत्सेवा
में ही संतुष्ट रहता है । यह शुद्ध भक्तियोग का लक्षण है ।
श्रीमद्भागवत से उद्धृत कपिलदेव के उपरोक्त वाक्य में शुद्धभक्त
की यथार्थ स्थिति के साथ ही भक्तियोग के सामान्य लक्षणों का भी
विवेचन है । श्रील रूप गोस्वामी ने शास्त्र-प्रमाण के आधार पर भक्ति के
लक्षणों का आगे वर्णन किया है । वे कहते हैं कि शुद्ध भक्तियोग के छः
लक्षण हैं :
१. शुद्धभक्ति क्लेशघ्नी है, अर्थात् सब प्रकार के प्राकृत क्लेशों
को तत्काल शान्त कर देती है ।
२. शुद्धभक्ति शुभदा है, अर्थात् सब प्रकार से कल्याण करने
वाली है ।
३. शुद्धभक्ति अपने-आप अपरिमेय दिव्य आनन्द में स्थित कर
देती है ।
४. शुद्धभक्ति परम दुर्लभ है ।
५. शुद्धभक्ति मोक्ष को भी तुच्छ बना देने वाली है ।
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ ६
६. शुद्धभक्ति श्रीकृष्णकर्षिणी है, अर्थात् श्रीकृष्ण को आकर्षित
करने का एकमात्र साधन है।
श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं, परन्तु शुद्धभक्ति उन्हें भी अपनी ओर
आकृष्ट करने वाली है। भाव यह है कि शुद्धभक्ति श्रीकृष्ण से भी अधिक
दिव्य बलवती है; कारण, वह श्रीकृष्ण की अंतरंगा शक्ति है।
क्लेशघ्नी (भक्ति से क्लेशों की शान्ति)
भगवद्गीता में भगवान् कहते हैं कि अन्य सब कर्तव्य त्याग कर
जीव को उनके शरणागत हो जाना चाहिए। शरणागत जीवों की सम्पूर्ण
पापों से रक्षा करने का उनका वचन है। श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि
इस जन्म के पाप और पूर्वकृत पाप—दोनों क्लेश के कारण हैं। सामान्यतः
पापकर्म अविद्या के कारण घटते हैं। परन्तु अविद्या के नाम पर पापफल से
बचा नहीं जा सकता। पाप के फल दो प्रकार के होते हैं: प्रारब्ध और
अप्रारब्ध। जिन पापकर्मों को हम वर्तमान में भोग रहे हैं, वे प्रारब्ध हैं।
जो अभी फलोन्मुख नहीं हुए हैं, वे संचित पापकर्म अप्रारब्ध कहलाते हैं ।
उदाहरण के लिए, जैसे कोई मनुष्य बहुत अपराध करने पर भी अभी पकड़ा
न गया हो। परन्तु जब उसका पता लगेगा, तुरन्त ही वह बंदी बना लिया
जायगा । इसी प्रकार, अपने अप्रारब्ध पापों का फल हमें भविष्य में प्राप्त
होगा, जबकि प्रारब्ध पापकर्मों का फल अभी भोगना पड़ रहा है।
इस प्रकार पापकर्मों और उनके परिणाम में होने वाले क्लेशों की
एक श्रृंखला सो चलती रहती है। इस प्रकार बँधा हुआ जीव जन्म-
जन्मान्तर में इन पापों के कारण दुःख भोग रहा है। वर्तमान में पूर्वपापों
का फल भोगते हुए भी भावी जीवन के लिए दुःखों के नए बीज बोता
रहता है । भीषण रोग, अभियोग, अधम जाति में जन्म, विद्या और रूप
का अभाव—ये सब प्रारब्ध पापकर्म के लक्षण हैं ।
पूर्व पापों के बहुत से फलों को हम वर्तमान में भोग रहे हैं और
क्रियमाण पापकर्मों का क्लेश आगे भोगना पड़ेगा। परन्तु यदि हम कृष्ण-
भावनाभावित हो जायें, तो ये सब पापकर्मफल अविलम्ब शान्त हो सकते
हैं। इसके प्रमाण में रूप गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत, ग्यारहवें स्कन्ध के
चौहदवें अध्याय से उन्नीसवें श्लोक को उद्धृत किया है। उद्धव को
उपदेश करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं, “हे उद्धव ! मेरी भक्ति
प्रज्ज्वलित अग्नि के समान है, जो ईंधनरूपी अपार पापराशि को भस्म
कर सकती है।” तात्पर्य यह है कि जैसे प्रचण्ड अग्नि ईंधन के बड़े से बड़े
१० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
अम्बार को भस्मसात् कर सकती है, वैसे ही कृष्णभावनाभावित भगवद्-
भक्ति सम्पूर्ण पापराशि को समूल नष्ट कर देती है। इसका उदाहरण
गीता में है। अर्जुन सोच रहा था कि युद्ध करना पाप है; परन्तु श्रीकृष्ण
ने स्वयं आज्ञा देकर उसे युद्ध में लगाया, जिससे लड़ना भी भक्तियोग बन
गया। यही कारण है कि अर्जुन को पापकर्म का फलरूपी कुछ भी दोष
नहीं हुआ।
श्रील रूप गोस्वामी श्रीमद्भागवत से एक और प्रमाण (३.३३.६) देते
हैं, जिसमें देवहूति अपने पुत्र भगवान् कपिल से कहती हैं, “प्रभो ! भक्तियोग
के श्रवण, कीर्तन, आदि नौ साधन हैं। जो कोई भी आपकी लीला का श्रवण
करता है, आपकी पावन कीर्ति का गान करता है, आपकी वंदना करता
है अथवा स्मरण आदि भक्ति का एक भी साधन अंगीकार कर लेता है,
वह चाहे परम अधम चाण्डाल-कुल में ही क्यों न जन्मा हो, परन्तु भक्ति-
योग के प्रताप से तत्काल पवित्र होकर यज्ञ करने के योग्य हो जाता है।”
अस्तु, जो पूर्णतया कृष्णभावनाभावित होकर यथार्थ में भक्तियोग में
तत्पर है, यह कैसे हो सकता है कि वह पवित्र न हो गया हो ? ऐसा नहीं हो
सकता। कृष्णभावना और भक्तियोग के परायण पुरुष निश्चित रूप से
प्राकृत पापकर्मों के सम्पूर्ण दोषों से मुक्त हो चुका है। अतएव भक्तियोग
में वस्तुतः सब पापों को भस्मभूत करने की शक्ति है। फिर भी भक्त
निरन्तर ध्यान रखता है कि उससे कोई पाप न बन जाय; यह भक्त की
विशेषता है। इस प्रकार श्रीमद्भागवत का निर्णय है कि भक्तियोग में
तत्पर होने पर चाण्डाल-कुल में उत्पन्न मनुष्य भी वैदिक यज्ञ करने का
अधिकारी बन जाता है। इस वाक्य में संकेत है कि चाण्डाल-कुल का
मनुष्य सामान्य रूप से यज्ञ करने के योग्य नहीं होता। वैदिक यज्ञों
का अधिकार ब्राह्मणों को है; अतः ब्राह्मण बने बिना कोई भी ये कर्म नहीं
कर सकता।
पूर्व कर्मों के अनुसार ही मनुष्य का जन्म ब्राह्मण अथवा चाण्डाल-
कुल में होता है। जिसका जन्म चाण्डाल-कुल में हुआ है, उसने अवश्य
पूर्वजन्म में पाप ही पाप किए होंगे। परन्तु यदि वह भक्ति-पथ को अंगी-
कार करके 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम
राम राम हरे हरे'—यह कीर्तन करे, तो वह तत्काल यज्ञ, आदि कर्मों
के योग्य हो जाय। भाव यह है कि उसका पापकर्मफल तुरन्त दूर हो
जाता है।
पद्मपुराण के अनुसार, पापकर्मों के चार प्रकार के फल होते हैं :
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ ११
१. अप्रारब्ध, २. बीज, ३. प्रारब्ध, और ४. कूट । यह भी उल्लेख
कि जो पुरुष भगवान् विष्णु शरणागत होकर पूर्णरूप से कृष्णभावना-
भावित भक्तियोग में तत्पर हों, उनके ये चारों प्रकार के पापफल तत्काल
विलीन हो जाते हैं।
'प्रारब्ध' फल उन्हें कहते हैं, जो वर्तमान में भोगे जा रहे हैं।
'बीजफल' हृदय में बीजरूप में रहते हैं। 'कूट' फल वे हैं, जो प्रकट होना
ही चाहते हैं। 'अप्रारब्ध' उन कर्मों का द्योतक है, जिनके फल अभी अंकु-
रित नहीं हुए। पद्मपुराण के इस वाक्य से ज्ञात होता है कि प्राकृत कर्मों
का बन्धन बड़ा दुर्बोध है। उसका आदि, फलन, परिणाम तथा दुःखरूप
में भोग—यह सब एक बड़ी श्रृंखला है। कोई रोग हो जाने पर यह
कहना बड़ा कठिन है कि वह किस कारण से हुआ, कहाँ से आरम्भ हुआ,
कैसे बढ़ रहा है, इत्यादि। परन्तु रोग का क्लेश अकस्मात् प्रकट नहीं
होता। उसे समय लगता है। जैसे चिकित्सा के क्षेत्र में पूर्वोपाय के रूप में
डाक्टर रोग के संक्रमण को रोकने के लिए टीका लगाते हैं, वैसे ही सब
प्रकार के पापकर्मों को फलित होने से रोकने के लिए पूर्णतया कृष्णभावना-
भावित कर्मों के परायण हो जाना आवश्यक है।
इस संदर्भ में, श्रीमद्भागवत (६.२.१७) में शुकदेव गोस्वामी ने
अजामिल की कथा का उल्लेख किया है। उसने अपना जीवन एक कुशल
और कर्तव्य-परायण ब्राह्मण के रूप में प्रारम्भ किया था; परन्तु यौवन में
वेश्या-संग से बिल्कुल भ्रष्ट हो गया । फिर भी, अपने पापमय जीवन के
अंत में नारायण नाम पुकारने के फलस्वरूप उसका सब पापों से उद्धार हो
गया। शुकदेव गोस्वामी ने कहा है कि तप, दान, व्रत आदि से पापों का
नाश तो हो जाता है; परन्तु हृदय से पाप-बीज का नाश नहीं होता,
जैसा यौवन में अजामिल के साथ हुआ । इस पाप-बीज का नाश एकमात्र
कृष्णभावनाभावित होने पर ही हो सकता है। श्रीचैतन्य महाप्रभु का
सन्देश है कि कृष्णभावना की प्राप्ति हरेकृष्ण महामन्त्र का जप-कीर्तन
करने से बड़ी सुगमतापूर्वक हो जाती है, अर्थात् भक्तिपथ को अंगीकार
किए बिना पापों से पूर्ण शुद्धि नहीं हो सकती ।
वैदिक कर्म, दान, तप आदि के द्वारा कुछ काल के लिए पापफल
से मुक्ति हो सकती है, परन्तु अगले ही क्षण वह फिर पाप में प्रवृत्त हो
जाता है। उदाहरणार्थ, मैथुन की अधिकता के कारण रोगग्रस्त हुए व्यक्ति
को चिकित्सा में भीषण कष्ट होता है; तब भी वह तात्कालिक रूप में ही
ठीक हो पाता है। परन्तु हृदय से मैथुन की इच्छा को निर्मल न कर पाने
१२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
से फिर विषयों में प्रवृत्त होता है और वही रोग एकबार फिर हो जाता
है। अतः चिकित्सा के उपचार से यौन-रोग के कष्ट से तात्कालिक छुटकारा
तो हो सकता है; परन्तु जब तक अभ्यास से यह समझ में नहीं आ जाता
कि मैथुन तुच्छ (निन्दनीय) है, तब तक बारम्बार होने वाले ऐसे कष्ट से
बचा नहीं जा सकता। इसी प्रकार वैदिक कर्म, दान, तप आदि से क्षणिक
रूप में पापकर्मों का परिहार हो सकता है, पर जब तक हृदय शुद्ध नहीं हो
जाता, तब तक बराबर पापकर्म बनते ही रहेंगे।
श्रीमद्भागवत में एक दूसरा दृष्टान्त कुंजर-स्नान का दिया गया है।
हाथी सरोवर में अच्छी प्रकार से स्नान करता है। फिर बाहर तट पर
निकलते ही सारी देह पर धूलि डाल लेता है। इस उदाहरण से बताया
गया है कि जिसे कृष्णभावना की शिक्षा नहीं मिली है, वह पापकर्म की
वासना से पूर्ण मुक्त नहीं हो सकता। यह न योग से, न मनोधर्म से और
न कर्म से ही सम्भव है। केवल भक्तियोग के परायण होने पर पाप-वासना
से बचा जा सकता है।
श्रीमद्भागवत (४.२२.३६) में एक अन्य प्रमाण भी है। सनकादि
कहते हैं, “हे राजन् ! मनुष्य का मिथ्या अहंकार इतना प्रबल है कि उसे
भवबन्धन की रस्सी में जकड़े रहता है। कृष्णभावना के परायण होकर केवल
भक्तजन ही इस दृढ बन्धन का सुगमता से छेदन कर सकते हैं। दूसरे,
जो कृष्णभावनाभावित नहीं हैं, परन्तु बड़े योगी अथवा कर्मी बनने के
लिए प्रयत्न कर रहे हैं, वे भक्तों की भाँति कर्म-बन्धन का मोचन नहीं
कर सकते। अतः सबको चाहिए कि मिथ्या अहंकार और प्राकृत कर्मों की
दृढ ग्रन्थी से छूटने के लिए कृष्णभावनाभावित क्रियाओं के परायण हो
जायें।”
मिथ्या अहंकार की यह दृढ ग्रन्थी अविद्या के कारण है। जीव जब
तक अपने स्वरूप को नहीं जान जाता, तब तक अवश्य अनुचित कर्म करेगा
और प्राकृत-बन्धन में फँसता जायगा। यह तत्त्वज्ञान का अभाव भी कृष्ण-
भावना से दूर हो सकता है, जैसा पद्मपुराण से प्रमाणित है: “कृष्ण-
भावनाभावित शुद्धभक्ति वह परमोच्च आलोक है, जो वासनारूप
अमंगलकारी सर्पों के लिए दावानल जैसा है। वन में आग लगने पर वहाँ
रहने वाले सब सर्प देखते-देखते समाप्त हो जाते हैं। अन्य पशु तो भाग
कर प्राणरक्षा कर लेते हैं, परन्तु सर्प तत्काल भस्म हो जाते हैं। इसी
प्रकार, कृष्णभावना रूपी प्रज्ज्वलित अग्नि इतनी प्रबल है कि उसके आगे
अविद्या रूप सर्प तुरन्त मर जाते हैं।
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १३
कृष्णभावना सर्व शुभदा है
श्रील रूप गोस्वामीपाद ने कृष्णभावना के शुभदत्व का विवेचन
किया है। वे कहते हैं कि यथार्थ शुभ सम्पूर्ण जगत् का कल्याण-कार्य करने
में है। आज नाना जनसमूह समाज, जाति और राष्ट्र आदि के कल्याण-
कार्य में तत्पर हैं। संयुक्त राष्ट्र के रूप में विश्व-हितक्रिया की दिशा में
भी प्रयत्न चल रहा है। परन्तु संकीर्ण राष्ट्रीयता के दोषों के कारण सम्पूर्ण
विश्व समाज के लिए कल्याण कार्य का व्यापक आयोजन व्यावहारिक रूप
से सम्भव नहीं है। कृष्णभावनामृत आन्दोलन इतना सर्वांग सुन्दर है कि
यह सम्पूर्ण मानवसमाज का परम उपकार (कल्याण) कर सकता है।
सभी इस आन्दोलन के प्रति आकृष्ट हो सकते हैं और इसके परिणाम का
अनुभव कर सकते हैं। अतएव श्रील रूप गोस्वामीपाद और अन्य सब
विद्वान् इस विषय में एकमत हैं कि कृष्णभावना आन्दोलन के द्वारा
सम्पूर्ण जगत् में भक्तियोग का व्यापक स्तर पर प्रचार-प्रसार करना मानव-
जाति का सर्वोत्तम परोपकार कार्य है।
कृष्णभावना आन्दोलन सम्पूर्ण विश्व को अपनी ओर आकृष्ट कर
सकता है और मनुष्यमात्र इस कृष्णभावना का आस्वादन कर सकता
है, ये दोनों पद्मपुराण के इस वाक्य से सिद्ध हो जाते हैं: “जो पुरुष पूर्ण
रूप से कृष्णभावनाभावित होकर भक्तियोग में तत्पर है, वह सम्पूर्ण जगत्
की सर्वोत्तम सेवा करते हुए जगत् के सब प्राणियों को तृप्त कर लेता है।
इतना ही नहीं, स्थावर-जंगम जन्तुओं तक का उसमें अनुराग हो जाता है,
वे भी कृष्णभावना आन्दोलन की ओर आकृष्ट हो उठते हैं।” मध्यभारत
के झारिखण्ड नामक अंचल में संकीर्तन-प्रचार के लिए जाते हुए श्रीमन्महा-
प्रभु चैतन्यदेव ने इसका प्रत्यक्ष उदाहरण उपस्थित किया है। उन्हें देखकर
शेर, हाथी, मृग आदि पशु भी अपनी रीति से हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन
करते हुए झूमझूम कर नाचने लगे थे।
इसके अतिरिक्त, भक्तियोग में तत्पर कृष्णभावनाभावित पुरुष में
देवताओं के सारे गुण विकसित हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत (५.१८.१२) में
शुकदेव गोस्वामी ने कहा है, “हे राजन् ! श्रीकृष्ण के निष्किंचन निश्छल
भक्त में सब दैवी गुण पाये जाते हैं। भक्त की विकसित कृष्णभावना के
कारण देवता भी उसके संग में निवास करना चाहते हैं, अतः उसके देह
में सभी दैवी गुणों का विकास रहता है।”
दूसरी ओर, जो कृष्णभावनाभावित नहीं है, उसमें कोई सद्गुण नहीं
होता। संसार की दृष्टि से वह बड़ा विद्वान् हो सकता है, परन्तु अपनी
१४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
वास्तविक क्रियाओं में तो वह पशुओं से भी अधम दिखता है। यदि कोई
विद्वान् कहलानेवाला मानसिक स्तर से ऊपर नहीं उठ सकता, तो यह
निश्चित है कि उससे केवल प्राकृत कर्म ही बनेंगे; इस प्रकार वह सदा
अशुद्ध रहेगा। आधुनिक जगत् में ऐसे अनेक व्यक्ति हैं, जिन्होंने जड विद्या
के विश्वविद्यालयों में गम्भीर अध्ययन किया है; पर फिर भी वे कृष्ण-
भावना आन्दोलन को अंगीकार नहीं कर सकते । इसलिए उनमें
सद्गुणों का विकास नहीं हो सकता ।
विश्वविद्यालय की दृष्टि के अनुसार सुशिक्षित न होने पर भी कृष्ण-
भावनाभावित बालक परस्त्रीगमन, द्युत, मांसाहार और मद्यपान, आदि
कुकर्मों को तत्काल त्याग सकता है। दूसरी ओर, जो कृष्णभावनाभावित
नहीं हैं, वे उच्च शिक्षा-प्राप्त होने पर भी प्रायः मद्यप, मांसाहारी, लम्पट
और द्युत-परायण पाये जाते हैं। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि
एक कृष्णभावनाभावित पुरुष में सद्गुणों का बहुत अधिक विकास हो
जाता है, जबकि कृष्णभावनाविरहित ऐसा नहीं कर सकता। हमारा अनुभव
है कि कृष्णभावनाभावित नवयुवक भी चलचित्र, नाईट क्लब, नग्न नृत्य,
होटल, मद्यशाला आदि में रुचि नहीं रखता। वह इन सभी अनर्थों से
मुक्त हो जाता है और इस प्रकार अपने अमूल्य समय को धूम्रपान, मद्य-
पान, थेटर, नृत्य आदि में अपव्यय होने से बचाता है।
जो कृष्णभावना में नहीं है, वह आधे घण्टे भी एकाग्र होकर चुप-
चाप नहीं बैठ सकता । आजकल प्रचलित योग-पद्धति सिखाती है कि चुप
बैठे रहने से साधक को यह अनुभूति हो जायगी कि वह ईश्वर है । यह
पद्धति विषयी व्यक्तियों की समझ से उपयुक्त हो सकती है, परन्तु यह
भी सोचना चाहिए कि कितने समय तक वे चुप रह सकेंगे ? कोई कृत्रिम
रूप से मिथ्या ध्यान के लिए बैठ भी जाय, पर यौगिक अभ्यास के तत्काल
बाद फिर परस्त्रीगमन, मद्यपान, द्युत, मांसाहार, आदि अनर्थों में प्रवृत्त
हो जायगा । कृष्णभावनाभावित पुरुष इस कपट-ध्यान के लिए आयास
किए बिना ही शनैः-शनैः आत्मोन्नति करता जाता है। कृष्णभावना-परायण
होने के कारण वह अनायास इन सब अनर्थों को त्याग कर सच्चरित्र
का विकास कर लेता है। सच्चरित्र का विकास श्रीकृष्ण का शुद्धभक्त
बनने पर ही होता है। निष्कर्ष यह है कि जिसमें कृष्णभावना का अभाव
है, उसमें कोई भी यथार्थ सद्गुण नहीं हो सकता ।
कृष्णभावना का सुख
श्रील रूप गोस्वामी ने सुख को तीन कोटियों में बाँटा है। उनके
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १५
अनुसार सुख के तीन भेद ये हैं : १. विषयों का सुख २. परब्रह्म से अपने
को एक मानने का सुख तथा ३. कृष्णभावना से प्राप्त होने वाला
सुख ।
'तन्त्रशास्त्र' में शिवजी सती से कहते हैं, “हे साध्वि ! जिसने
भगवान् गोविन्द के चरणों में शरणागत होकर शुद्ध कृष्णभावना का विकास
कर लिया है, वह बड़ी सुगमता से निर्विशेषवादियों द्वारा अभिलाषित
सभी सिद्धियों को प्राप्त कर सकता है; इसके अतिरिक्त, वह शुद्धभक्तों
को मिलने वाले परमानन्द का आस्वादन कर सकता है ।”
शुद्ध भक्तियोग का सुख परमोच्च है, क्योंकि वह शाश्वत् है ।
प्राकृत सिद्धियों अथवा ब्रह्मैक्य से होने वाला सुख क्षणभंगुर होने के कारण
तुच्छ है । प्राकृत सुख से पतन का कोई प्रतिबन्ध नहीं है, यहाँ तक कि
निर्विशेष ब्रह्म के सायुज्य से प्राप्त अप्राकृत सुख तक से गिरने की पूरी
सम्भावना रहती है ।
देखा जाता है कि परम विद्वान् और लगभग तत्त्व-साक्षात्कार के
स्तर पर पहुँचे हुए मायावादी संन्यासी भी कभी-कभी राजनीतिक अथवा
सामाजिक परोपकार-कार्य में प्रवृत्त हो जाते हैं । इसका कारण यह है कि
निर्विशेष के ज्ञान में उन्हें कोई आत्यन्तिक सुख नहीं मिलता; इसीलिए वे
बाध्य होकर प्राकृत स्तर पर उतर आते हैं और एक बार फिर प्रापंचिक
कार्यों में फँस जाते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। परन्तु पूर्णतया कृष्ण-
भावनाभावित पुरुष किसी भी प्रकार के प्राकृत स्तर पर फिर कभी नहीं
उतरता । वे चाहे कितने भी मोहक और आकर्षक क्यों न हों, वह भली
भाँति जानता है कि कोई प्राकृत परोपकार कार्य कृष्णभावना के दिव्य
कर्मों की तुलना नहीं कर सकता ।
यथार्थ में सफल हुए योगियों को आठ प्रकार की सिद्धियाँ होती हैं ।
पहली 'अणिमा' सिद्धि के द्वारा इतना सूक्ष्म बना जा सकता है कि पत्थर
तक में प्रवेश किया जा सके । आधुनिक विज्ञान ने भी इस सिद्धि को प्राप्त
किया है—उसके द्वारा भू-खनन किया जाता है । इसी प्रकार अन्य सभी
सिद्धियाँ भी वस्तुतः प्राकृत कलायें हैं । उदाहरणार्थ, एक योगसिद्धि से
मनुष्य इतना हल्का हो जाता है कि जल-वायु में तैर सकता है । आधुनिक
वैज्ञानिकों को इसमें भी सफलता मिली है । वे वायुमण्डल में उड्डयन
करते हैं, जल पर तैरते हैं और जल के नीचे यात्रा करते हैं ।
इन सब योगसिद्धियों की प्राकृत उपलब्धियों से तुलना करने पर
१६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
स्पष्ट है कि वास्तव में प्राकृत वैज्ञानिक भी इन्हीं सिद्धियों के लिए यत्न-
शील हैं। अतः प्राकृत-सिद्धि और योगसिद्धि में वस्तुत कोई अन्तर नहीं
है। एक जर्मन मनीषी ने एक बार कहा था कि तथाकथित योगसिद्धियों
को आधुनिक वैज्ञानिकों ने पहले ही प्राप्त कर लिया है, इसलिए उसकी
उसमें कोई रुचि नहीं है। वह बुद्धिमानी से भारत आया और भक्तियोग के
द्वारा भगवान् से अपने नित्य सम्बन्ध को जाना।
निस्सन्देह, योगसिद्धि की श्रेणी में कुछ ऐसी पद्धतियाँ भी हैं, जिन्हें
आधुनिक वैज्ञानिक अभी तक विकसित नहीं कर सके हैं। जैसे, योगी सूर्य-
किरणों के द्वारा सूर्य में प्रविष्ट हो सकता है। इस सिद्धि को 'लघिमा'
कहते हैं। ऐसे ही, योगी अपने हाथ से चन्द्रमा आदि नक्षत्रों को छू सकता
है। आधुनिक अन्तरिक्षयात्रियों को चन्द्रमा तक जाने में बड़ी कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है, जबकि सिद्ध योगी केवल हाथ आगे बढ़ाकर
अंगुली से चन्द्रमा का स्पर्श कर सकता है। यह 'प्राप्ति' सिद्धि है। इस
शक्ति से युक्त योगी कहीं भी हाथ बढ़ाकर किसी भी अभिलाषित वस्तु
को प्राप्त कर सकता है। किसी स्थान से चाहे वह हजारों मील दूर बैठा
हो, परन्तु यदि चाहे तो वहाँ पर स्थित उद्यान के फल खा सकता है। इसी
का नाम 'प्राप्ति' है।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने परमाणु अस्त्रों का निर्माण कर लिया है,
जो इस लोक के एक नगण्य भाग को नष्ट कर सकते हैं; परन्तु 'ईशिता'
नाम योग-सिद्धि द्वारा संकल्प मात्र से किसी भी लोक का सृजनसंहार
किया जा सकता है। एक अन्य 'वशिता' सिद्धि है, जिससे किसी को
भी अपने वश में कर सकते हैं। यह एक दुर्धर वशीकरण सी है। कभी-कभी
देखा जाता है कि इस वशिता शक्ति की आंशिक सिद्धि वाला योगी जन-
साधारण में आकर सब प्रकार का अनर्गल बोलता है, जनता के मन को
वश में करके धन अपहरण करता है और फिर भाग जाता है।
एक 'प्राकाम्य' नामक सिद्धि भी होती है। इसके द्वारा मन की कोई
भी कामना पूरी की जा सकती है। जैसे, नेत्र में जल को प्रवेश कराकर
फिर वापस निकालना योगी संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे अद्भुत कार्य कर
सकता है।
योगशक्ति की सर्वोच्च सिद्धि 'कामावसायिता' कहलाती है।
प्राकाम्य शक्ति से जहाँ प्रकृति के अन्तर्गत ही अद्भुत कार्य हो सकते हैं; इस
शक्ति से प्रकृति-विरुद्ध अर्थात् असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। योग की
इन सब प्राकृत सिद्धियों के द्वारा विशाल क्षणिक सुख उपलब्ध हो सकता है।
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १७
आधुनिक प्राकृत उन्नति की चकाचौंध से मोहित लोग मूर्खतापूर्वक
समझते हैं कि कृष्णभावनामृत आन्दोलन मन्दों के लिए है। वे सोचते हैं,
"विषय साधनों वाला मैं इन से श्रेष्ठ हूँ; मुझे सुन्दर आवास, परिवार
और मैथुन का सुख प्राप्त है।" वे नहीं जानते कि किसी भी क्षण वे अपनी
प्राकृत स्थिति से बाहर फेंके जा सकते हैं। अज्ञानवश उन्हें पता नहीं कि
यथार्थ जीवन नित्य है। शरीर के तात्कालिक सुख जीवन के लक्ष्य नहीं
हैं; अज्ञानरूपी घोर अन्धकार के कारण ही लोग प्राकृत सुखों की उन्नति
की चकाचौंध पर मोहित हो रहे हैं।
श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने इस सन्दर्भ में लिखा है कि प्राकृत
विद्या की उन्नति मनुष्य को उत्तरोत्तर अधिक मूढ कर देती है, क्योंकि
उसकी चकाचौंध से वह अपना यथार्थ स्वरूप भुला बैठा है। यह उसका
नाश है; कारण, मनुष्यजीवन का वास्तविक उद्देश्य प्राकृत बन्धन से छूटना
है। प्राकृत जड विद्या के विकास से लोग भवबन्धन में दिन-पर-दिन
और पड़ते जा रहे हैं। उनके लिए इस महाविनाश से उद्धार की कोई
आशा नहीं।
'हरिभक्तिसुधोदय' में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह से प्रार्थना
करते हैं, "देव ! आपके चरणारविन्द में मेरा बारम्बार यही निवेदन है कि
आपमें मेरी दृढ़ अनन्य भक्ति हो। बस, यही इच्छा है कि मेरी कृष्णभावना
में स्थिर निष्ठा हो, क्योंकि कृष्णभावना और भक्तियोग का मुख इतना
प्रबल होता है कि उसके साथ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष आदि सब
सिद्धियाँ अपने-आप सुलभ हो जाती हैं।"
वास्तव में शुद्धभक्त इनमें से किसी सिद्धि की अभिलाषा नहीं
रखता, क्योंकि कृष्णभावनाभावित भक्तियोग का सुख इतना दिव्य और
अपरिमेय हुआ करता है कि किसी अन्य सुख की उससे तुलना नहीं हो
सकती। सिद्धान्त है कि किसी भी अन्य क्रिया से मिलने वाले सुख का
सागर तक कृष्णभावना के सुख के एक बिन्दु के समान भी नहीं हो
सकता। अतएव जिस मनुष्य ने थोड़ा भी शुद्ध भक्तियोग का विकास कर
लिया हो, वह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से मिलने वाले अन्य सब प्रकार के
सुख को सहज में तिलांजलि दे सकता है।
खोलवेचा श्रीधर नामक श्रीचैतन्य महाप्रभु का एक परम भक्त था।
वह अत्यन्त अकिंचन था। वह केले के पत्ते बेचा करता था, जिससे उसकी
नगण्य सी आय थी। ऐसी स्थिति में भी वह अपनी आय का आधा भाग
गंगा-पूजन पर व्यय करता और शेष अंश से जैसे-तैसे काम चलाता।
१८] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीचैतन्य महाप्रभु ने एक समय इस अंतरंग भक्त को अपना साक्षात्कार
कराया था और उससे किसी इच्छित ऐश्वर्य को माँग लेने को कहा था ।
परन्तु श्रीधर ने श्रीमन्महाप्रभु से निवेदन किया कि वह किसी प्राकृत
ऐश्वर्य की इच्छा नहीं रखता । उसे अपनी स्थिति में पूर्ण सुख था; वह
बस इतना चाहता था कि श्रीचैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में उसकी
अनन्य निष्ठा और भक्ति हो । यह शुद्धभक्तों की स्थिति है । यदि वे
निरन्तर दिन में चौबीस घण्टे भक्तियोग में तत्पर रह सकें, तो फिर
उन्हें और कुछ नहीं चाहिए । उन्हें तो मुक्ति अथवा ब्रह्मैक्य के सुख की
इच्छा तक नहीं होती ।
'नारदपंचरात्र' में कहा है कि जिसमें भक्ति का कुछ भी विकास
हुआ हो, वह पुरुष धर्म, अर्थ, काम अथवा पाँच प्रकार की मुक्ति से होने
वाले सुख को बिलकुल तुच्छ समझता है । शुद्धभक्त के हृदय में ऐसा कोई
सुख प्रवेश तक नहीं कर सकता । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के सुख तो
दासियों के समान अभिवादन करते हुए भक्ति रूप महारानी के पीछे-पीछे
चला करते हैं । भाव यह है कि शुद्धभक्त को किसी भी स्रोत से मिलने
वाले सुख का अभाव नहीं रहता । उसे कृष्णसेवा के अतिरिक्त और कुछ
नहीं चाहिए । परन्तु यदि वह कोई अन्य इच्छा करे भी, तो उसके माँगे
बिना ही भगवान् उसे पूरा कर देते हैं ।
शुद्धभक्ति की सुदुर्लभता
परमार्थ की प्रारंभिक दशा में स्वरूप-साक्षात्कार के लिए नाना
प्रकार के तप, त्याग आदि साधनों का विधान है। यदि कोई साधक
विषय-वासना से रहित हो, तो भी भक्तियोग की प्राप्ति दुर्लभ है। स्वयं
साधन करने पर अधिक आशा नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण जिस किसी को
भक्ति का दान नहीं देते । श्रीकृष्ण प्राकृत सुख अथवा मुक्ति तो दे सकते
हैं, पर इतनी सरलता से किसी को भक्तियोग में नहीं लगाते । वास्तव
में भक्तियोग की प्राप्ति शुद्धभक्त की कृपा से ही होती है । चैतन्य-
चरितामृत (मध्य १६.१५१) में कहा है, "श्रीकृष्ण के शुद्धभक्त—गुरुदेव
और स्वयं श्रीकृष्ण की कृपा से ही भक्तियोग की प्राप्ति होती है । भक्ति
का कोई दूसरा मार्ग नहीं है ।"
भक्ति की दुर्लभता को 'तन्त्रशास्त्र' ने भी स्वीकार किया है।
शिवजी सती से कहते हैं : "हे साध्वि ! तत्त्वज्ञानी को भवबन्धन से मुक्ति
मिल सकती है और वैदिक यज्ञादि के पुण्यफल से पूर्ण विषय सुख हो
शुद्ध भक्तियोग के लक्षण [ १६
सकता है; परन्तु हजारों जन्मों तक यत्न करने पर भी इन साधनों से
भक्ति दुर्लभ ही रहती है ।"
श्रीमद्भागवत में प्रह्लाद महाराज का वचन है कि केवल निजी
प्रयास से अथवा अधिकारी पुरुषों के उपदेश से भक्तियोग की प्राप्ति नहीं
हुआ करती । इसके लिए विषयवासना से रहित शुद्धभक्त के चरणार-
विन्द का रजप्रसाद चाहिए ।
श्रीमद्भागवत (५.६.१८) में नारदजी युधिष्ठिर से कहते हैं, "हे
राजन् ! भगवान् मुकुन्द (श्रीकृष्ण) ही पाण्डवों और यादवों के शाश्वत्
स्वामी (रक्षक) हैं। वे तुम्हारे गुरु, सर्वविध शिक्षक, आराध्य देव हैं, इष्ट
और प्रेमास्पद हैं तथा सब प्रकार से कुलपति हैं। अधिक क्या, कभी-कभी
तो वे सेवक की भाँति तुम्हारी आज्ञा-पालन तक करते हैं। राजन् ! तुम
कितने भाग्यवान हो ! तुम पर भगवान् श्रीकृष्ण के इस कृपाप्रसाद की
दूसरे तो कल्पना भी नहीं कर सकते ।" इस श्लोक का भाव यह है कि
भगवान् मुक्ति सुगमता से दे देते हैं, परन्तु भक्तियोग किसी दुर्लभ जीव
को ही देते हैं। कारण यह है कि भक्तियोग से भगवान् स्वयं भक्त के
क्रीतदास हो जाते हैं ।
भक्ति का सान्द्रानन्द स्वरूप
श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि यदि ब्रह्मानन्द को करोड़ों गुणा
कर दिया जाय, तो भी भक्तिसुख के सागर के एक परमाणु की भी बरा-
बरी वह नहीं कर सकता ।
हरिभक्तिसुधोदय में प्रह्लाद महाराज भगवान् नृसिंह को अपनी
प्रार्थना से प्रसन्न करते हुए कहते हैं, "हे जगद्गुरु भगवन् ! आपके
साक्षात्कार के विशुद्ध सुखरूप सिन्धु में मग्न हुए मुझ को इस सुख की
तुलना में ब्रह्मानन्द गौ के खुर जैसा अत्यन्त तुच्छ लगता है ।" इसी प्रकार
श्रीधर स्वामी द्वारा विरचित श्रीमद्भागवत की 'भावार्थदीपिका' टीका
में प्रमाणित है, "भगवन् ! आपके भक्तिरसामृतरूप सागर में विहरण
करते हुए आपके कथामृत का आस्वादन करने वाले परमानन्दमग्न कोई-
कोई भाग्यवान् भक्तजन भक्तियोग के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
के सुख को तृण के समान समझते हैं ।"
श्रीकृष्णाकर्षिणी
श्रील रूप गोस्वामी का कथन है कि भक्ति श्रीकृष्ण को भी आकर्षित
कर लेती है। श्रीकृष्ण सर्वाकर्षक हैं; परन्तु भक्ति श्रीकृष्ण आकर्षिणी है। भक्ति