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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 27, कुल 380 में से

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पृष्ठ 27

उत्तम भक्ति का स्वरूप है।" भाव यह है कि कृष्णभावनाभावित प्रतिकूल-
भाव से भी हुआ जा सकता है; परन्तु यह शुद्ध भक्तियोग नहीं कहला
सकता। शुद्ध भक्तियोग के लिए इन्द्रियतृप्ति की प्राकृत अभिलाषा से मुक्त
होना आवश्यक है, क्योंकि ऐसी इच्छाओं के उठने में सकाम कर्म और
मनोधर्ममय ज्ञान ही कारण होते हैं। सामान्यतः लोग किसी न किसी
प्राकृत लाभ की इच्छा से नाना क्रियाओं में प्रवृत्त रहते हैं, जबकि अधिकांश
दार्शनिक वाग्चातुर्य और मनोधर्म के आधार से ब्रह्मानुभूति का प्रस्थापन
करना चाहते हैं। शुद्ध भक्तियोग ऐसे सब कर्म-ज्ञान से मुक्त होता है।
उस कृष्णभावना अथवा शुद्धभक्ति की शिक्षा रागानुगा सेवा के द्वारा
आचार्यों से ग्रहण करनी चाहिए।
यह भक्ति एक प्रकार का अनुशीलन, अर्थात् सेवन है। यह
निष्क्रियता नहीं है, जो आलसी मनुष्यों अथवा चुपचाप ध्यान में समय
बिताने वालों को प्रिय होती है। इस स्वभाव के मनुष्यों के लिए अन्य बहुत
से मार्ग हैं; परन्तु कृष्णभावना का अनुशीलन इन सब से भिन्न है। इस
संदर्भ में श्रील रूप गोस्वामी ने 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग किया है।
इसका अर्थ पूर्ववर्ती आचार्यों के चरणचिन्हों का अनुगमन करते हुए सेवन
करना है। जब हम 'अनुशीलन' शब्द का प्रयोग करते हैं तो हमारा
अभिप्राय क्रिया से होता है। क्रिया के बिना केवल भावना (चेतना) से
लाभ नहीं हो सकता। सब प्रकार की क्रियाओं के दो वर्ग किये जा सकते
हैं। एक वे जिनका कुछ निश्चित लक्ष्य है और दूसरी वे जो किसी
प्रतिकूलता के निवारण के लिए की जाती हैं। इन्हें क्रमशः 'प्रवृत्ति' और
'निवृत्ति' कहा जाता हैं। द्वितीय श्रेणी की क्रियाओं के अनेक उदाहरण हैं।
जैसे रोगी को सावधान रहकर कुछ औषधि का सेवन करना होता है,
जिससे रोगरूपी प्रतिकूलता दूर हो जाय।
जो परमार्थ के सेवन और भक्तियोग के आचरण में संलग्न हैं, वे
सदा क्रियाशील रहते हैं। ऐसी क्रिया शरीर से अथवा मन से की जा सकती
है। विचार, संवेदन और संकल्प—ये सब मन की क्रियायें हैं। संकल्प होने
पर ही स्थूल शारीरिक अंगों से क्रिया प्रत्यक्ष बनती है। अतएव पूर्ववर्ती
आचार्यों और गुरुदेव का अनुगमन करते हुए मन को नित्य-निरन्तर श्रीकृष्ण
के चिन्तन और उनकी प्रसन्नता के साधन की चेष्टा में लगाए रखना
चाहिए। मन के अतिरिक्त देह, इन्द्रियों और वाणी की अपनी-अपनी
क्रियायें हैं। कृष्णभावनाभावित पुरुष वाणी को भगवत्-कीर्ति प्रचार में
नियुक्त रखता है। इसी का नाम 'कीर्तन' है। मन के द्वारा वह सदा