भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
स्पष्ट है कि वास्तव में प्राकृत वैज्ञानिक भी इन्हीं सिद्धियों के लिए यत्न-
शील हैं। अतः प्राकृत-सिद्धि और योगसिद्धि में वस्तुत कोई अन्तर नहीं
है। एक जर्मन मनीषी ने एक बार कहा था कि तथाकथित योगसिद्धियों
को आधुनिक वैज्ञानिकों ने पहले ही प्राप्त कर लिया है, इसलिए उसकी
उसमें कोई रुचि नहीं है। वह बुद्धिमानी से भारत आया और भक्तियोग के
द्वारा भगवान् से अपने नित्य सम्बन्ध को जाना।
निस्सन्देह, योगसिद्धि की श्रेणी में कुछ ऐसी पद्धतियाँ भी हैं, जिन्हें
आधुनिक वैज्ञानिक अभी तक विकसित नहीं कर सके हैं। जैसे, योगी सूर्य-
किरणों के द्वारा सूर्य में प्रविष्ट हो सकता है। इस सिद्धि को 'लघिमा'
कहते हैं। ऐसे ही, योगी अपने हाथ से चन्द्रमा आदि नक्षत्रों को छू सकता
है। आधुनिक अन्तरिक्षयात्रियों को चन्द्रमा तक जाने में बड़ी कठिनाइयों
का सामना करना पड़ता है, जबकि सिद्ध योगी केवल हाथ आगे बढ़ाकर
अंगुली से चन्द्रमा का स्पर्श कर सकता है। यह 'प्राप्ति' सिद्धि है। इस
शक्ति से युक्त योगी कहीं भी हाथ बढ़ाकर किसी भी अभिलाषित वस्तु
को प्राप्त कर सकता है। किसी स्थान से चाहे वह हजारों मील दूर बैठा
हो, परन्तु यदि चाहे तो वहाँ पर स्थित उद्यान के फल खा सकता है। इसी
का नाम 'प्राप्ति' है।
आधुनिक वैज्ञानिकों ने परमाणु अस्त्रों का निर्माण कर लिया है,
जो इस लोक के एक नगण्य भाग को नष्ट कर सकते हैं; परन्तु 'ईशिता'
नाम योग-सिद्धि द्वारा संकल्प मात्र से किसी भी लोक का सृजनसंहार
किया जा सकता है। एक अन्य 'वशिता' सिद्धि है, जिससे किसी को
भी अपने वश में कर सकते हैं। यह एक दुर्धर वशीकरण सी है। कभी-कभी
देखा जाता है कि इस वशिता शक्ति की आंशिक सिद्धि वाला योगी जन-
साधारण में आकर सब प्रकार का अनर्गल बोलता है, जनता के मन को
वश में करके धन अपहरण करता है और फिर भाग जाता है।
एक 'प्राकाम्य' नामक सिद्धि भी होती है। इसके द्वारा मन की कोई
भी कामना पूरी की जा सकती है। जैसे, नेत्र में जल को प्रवेश कराकर
फिर वापस निकालना योगी संकल्पमात्र से ऐसे-ऐसे अद्भुत कार्य कर
सकता है।
योगशक्ति की सर्वोच्च सिद्धि 'कामावसायिता' कहलाती है।
प्राकाम्य शक्ति से जहाँ प्रकृति के अन्तर्गत ही अद्भुत कार्य हो सकते हैं; इस
शक्ति से प्रकृति-विरुद्ध अर्थात् असम्भव कार्य भी सम्भव हो जाते हैं। योग की
इन सब प्राकृत सिद्धियों के द्वारा विशाल क्षणिक सुख उपलब्ध हो सकता है।