भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५५
हो सकता है। भोग की तीन वस्तुएँ हैं—सुन्दर स्त्रियाँ, अलंकार एवं धन।
ये सभी श्रीकृष्ण के महलों में विद्यमान थीं, जिससे शिव, कुबेर, इन्द्र, आदि
की कल्पना तक परास्त हो जाती थी।
लेशमात्र दुःख भी कभी श्रीकृष्ण का स्पर्श नहीं कर सकता। एक
बार कुछ गोपियों ने याज्ञिक ब्राह्मणों की पत्नियों के पास जाकर कहा
था, "हे ब्राह्मणपत्नियो ! तुम यह जान लो कि श्रीकृष्ण को दुःख की गन्ध
भी नहीं छू सकती। उन्हें न हानि की, न ग्लानि की, न अपयश की और
न भय, उद्वेग या उत्पात की कोई चिन्ता है। वे तो बस व्रजांगनाओं से
घिरे हुए उनके साथ रासरस का दिन-रात उपभोग करते रहते हैं।
३६. भक्तसुहृद
भक्तिभाव से तुलसी का एक पत्ता अथवा अंजलि भर जल को
अपर्ण करने से भी भक्तवत्सल भगवान् अपने आत्मा को भक्तों के हाथ
बेच देते हैं।
श्रीकृष्ण भक्तसुहृद हैं, यह भीष्म के साथ उनके युद्ध में भलीभाँति
प्रकट हुआ है। जिस समय भीष्म बाणों की शय्या पर मरणासन्न अवस्था
में पड़े थे, तो श्रीकृष्ण भी वहाँ उनके आगे उपस्थित थे। भीष्म को युद्ध का
वह दृश्य स्मरण हो आया जब श्रीकृष्ण ने उन पर कृपा की थी। श्रीकृष्ण
की प्रतिज्ञा थी कि वे कुरुक्षेत्र के युद्ध में किसी भी दल की ओर से अस्त्र
को हाथ भी नहीं लगायेंगे, पूर्ण रूप से तटस्थ रहेंगे। अर्जुन के सारथि होते
हुए भी उनका प्रण था कि वे किसी अस्त्र-शस्त्र के प्रयोग से उसकी सहायता
नहीं करेंगे। परन्तु श्रीकृष्ण की इस प्रतिज्ञा को भंग कराने के लिए भीष्म
ने एक दिन अर्जुन के विरुद्ध ऐसा अतुल पराक्रम प्रकट किया कि श्रीकृष्ण
अपने रथ से उतरने को बाध्य हो गए। एक खण्डित रथ के पहिए को
उठा कर पितामह की ओर दौड़े, मानो कोई सिंह गजराज को मारने
के लिए जा रहा हो। मरण-शय्या पर इस मार्मिक दृश्य को स्मरण करके
भीष्मदेव ने अपने भक्त अर्जुन के प्रति वात्सल्यवश अपनी प्रतिज्ञा भंग
करने में भी संकोच न करने के लिए भगवान् श्रीकृष्ण का जय-जयकार
किया।
४०. प्रेमवश्य
श्रीकृष्ण भक्त के प्रेमभाव से वशीभूत हो जाते हैं। इसमें प्रेम ही
प्रधान है, सेवा का प्रकार नहीं। वैसे तो कोई भी श्रीकृष्ण की पूर्ण सेवा
१५६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
नहीं कर सकता। वे अपने में सब प्रकार से पूर्ण एवं तृप्त हैं; अतः भक्त
से किसी प्रकार की सेवा की उन्हें अपेक्षा नहीं है। श्रीकृष्ण के लिए भक्त
का प्रेम और स्नेह ही उन्हें वशीभूत करता है। श्रीकृष्ण की इस प्रेम-
वश्यता का एक सुन्दर उदाहरण तब अभिव्यक्त हुआ जब सुदामा विप्र
उनके महल में आया। पूर्व में वह श्रीकृष्ण का सहपाठी रह चुका था;
अब दरिद्रता-निवारण के लिए स्त्री की प्रेरणा से श्रीकृष्ण के पास आया
था। श्रीकृष्ण ने उसका हार्दिक सत्कार किया और स्त्रियों सहित ब्राह्मण
समझ कर उसका पद-प्रक्षालन किया। मित्र से मिलते हुए श्रीकृष्ण
उसके साथ शैशव के प्रेमविहारों की स्मृति से प्रेमाश्रु बहाने लगे।
श्रीकृष्ण की प्रेमवश्यता का एक अन्य उदाहरण श्रीमद्भागवत
(१०.६.१८) में है। शुकदेव गोस्वामी परीक्षित से कहते हैं, "हे राजन् !
अपने को पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ती माता यशोदा को पसीने से तर
और बहुत श्रान्त हुआ जानकर श्रीकृष्ण स्वयं बँध गए।" बालकृष्ण अपने
चपल क्रीड़ा से माता को बहुत तंग करते, इसलिए माता उन्हें बाँधना चाहती
थीं। वे घर में से रस्सी ले आईं और उन्हें बाँधने लगीं। परन्तु रस्सी में
गाँठ नहीं लग सकी। उन्होंने रस्सी कितनी भी बढ़ायी, पर वह छोटी ही
रही। इससे उन्हें बहुत अधिक परिश्रम हुआ और शरीर से स्वेद-स्राव हो
चला। उस समय श्रीकृष्ण स्वयं माता के बन्धन में आ गए। भाव यह है
कि श्रीकृष्ण को प्रेम से ही बाँधा जा सकता है। भक्त उन्हें प्रेम करते हैं,
इसलिए वे उनके प्रेमवश्य हैं।
४१. सर्वशुभंकर
जो सदा सब का हितकारी हो, उसे सर्वशुभंकर कहते हैं।
इस धराधाम से श्रीकृष्ण के अप्रकट हो जाने पर उद्धव उनकी
लीलाओं का स्मरण करके कहने लगा, "अपने अद्भुत लीला-चरित से सब
मुनियों को कृतार्थ किया, क्रूर राजवंशों की सारी आसुरी क्रियाओं को
समाप्त किया, पुण्यात्माओं को बचाया और युद्ध में सभी क्रूरकर्मी पुरुषों को
मार डाला। अतः वे सभी के लिए कल्याणकारी हैं।"
४२. प्रतापी
शत्रुओं को संकट में डालने वाला प्रतापी कहलाता है।
जिस समय श्रीकृष्ण इस पृथ्वी पर विद्यमान थे, तब जैसे प्रतापी
सूर्य सम्पूर्ण अन्धकार को कन्दराओं की शरण में खदेड़ देता है, वैसे ही उनके
शत्रुरूप उलूक उनकी दृष्टि से दूर जा छिपे।
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५७
४३. कीर्तिमान्
निर्मल चरित के कारण प्रसिद्ध पुरुष कीर्तिमान् कहलाता है ।
श्रीकृष्ण के यश का प्रसारण उस चन्द्रकौमुदी के समान है जो
कालिमा को भी शुभ्र ज्योत्स्ना में बदल देती है । अर्थात्, यदि कृष्णभावना
का सम्पूर्ण जगत् में प्रसार किया जाय तो भवरोग का उद्वेग और
अन्धकार शुद्धता, शान्ति और समृद्धि की शुभ्र ज्योत्स्ना में परिणत हो
जायगा ।
देवर्षि नारद के वीणा पर श्रीकृष्ण की कीर्ति का गान करने पर
शिवजी का कण्ठ नीला न रहा । यह देखकर परपुरुष की आशंका से गौरी
ने शिवजी को त्याग दिया; नीलाम्बरधारी बलराम जी ने अपने वस्त्र को
श्वेत देखकर फेंक दिया; तथा यमुनाजल को दूध हुआ देखकर गोपियाँ
उससे मक्खन का मन्थन करने लगीं। भाव यह है कि कृष्णभावना के प्रसार
से सब कुछ शुद्ध और शुभ्र हो जाता है।
४४. रक्तलोक
जो पुरुष सम्पूर्ण लोक का प्रीतिभाजन हो, उसे रक्तलोक कहते हैं ।
श्रीकृष्ण की लोकप्रियता का उदाहरण श्रीमद्भागवत (१.११.६)
में है जब वे हस्तिनापुर से घर लौटे थे । कुरुक्षेत्र के युद्ध में द्वारका से
उनकी अनुपस्थिति के कारण सारे द्वारकावासी बहुत हतप्रभ हो गए थे ।
फिर जब वे लौटे तो सारे निवासियों ने बड़े ही हर्षोल्लास सहित उनका
अभिवादन किया और कहा, "हे नाथ ! जब आप यहाँ से चले जाते हैं तो
आपके बिना एक-एक क्षण रात्रि के समान अंधकारमय, करोड़ों वर्ष के जैसा
हो जाता है । हमारे लिए आपका विरह असह्य है ।" इस वाक्य से पता
चलता है कि श्रीकृष्ण सम्पूर्ण देश में कितने लोकप्रिय थे ।
ऐसी ही घटना तब घटी जब श्रीकृष्ण उस यज्ञमण्डप में आए, जिसका
आयोजन राजा कंस ने अपने ही मरण के लिए किया था । श्रीकृष्ण को
पधारते देखकर सारे ऋषिवृन्द जयजयकार करने लगे । श्रीकृष्ण कुमारा-
वस्था में थे, अतः सब ऋषियों ने सादर आशीर्वाद दिया । वहाँ आए
देवताओं ने भी श्रीकृष्ण का स्तवन किया तथा चारों ओर से नगर की
नारियों की हर्षध्वनि होने लगी । भाव यह है कि उस स्थान में ऐसा कोई
नहीं था, श्रीकृष्ण जिसके अनुराग के पात्र न हों ।
४५. साधुसमाश्रय
यद्यपि श्रीकृष्ण परात्पर भगवान् के रूप में किसी से पक्षपात नहीं
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करते, तथापि भगवद्गीता के अनुसार जो श्रद्धा-प्रेम से उनके नाम का भजन
करता है, उस भक्त के प्रति उनका विशेष आकर्षण रहता है। श्रीकृष्ण
के जगत् में अवतरण-काल में एक भक्त ने वह उद्गार प्रकट किया था,
"हे पुरुषोत्तम ! यदि आप जगत् के कल्याण के लिए अवतरण न करते तो
असुरों की भयंकर क्रियाओं के कारण न जाने सज्जनों की क्या दशा होती।"
अपने आविर्भाव के प्रारम्भ से ही श्रीकृष्ण सब प्रकार के आसुरी जीवों के
परम वैरी थे, यद्यपि असुरों से उनके द्वेष और भक्तों से प्रेम में भेद नहीं
है, क्योंकि श्रीकृष्ण के हाथ से मरा कोई भी असुर तत्काल मुक्तिलाभ
कर लेता है।
४६. नारीगणमनोहारी
जिस पुरुष में विशेष गुण हों, वह सुन्दरियों के समूह को मोहित
करने वाला होता है।
द्वारका की महिषियों के सम्बन्ध में एक भक्त ने कहा, "साक्षात्
भगवान् की सेवापरायणा द्वारका की महिषियों की महिमा का क्या कहना।
भगवान् की महिमा इतनी अगाध है कि नारद आदि सब ऋषिवृन्द उनके
नाम-कीर्तन से ही दिव्य रस का आस्वादन कर सकते हैं; फिर उन महिषियों
का क्या कहना जो निरन्तर उनका दर्शन और सेवन करती थीं?" द्वारका
में श्रीकृष्ण की १६१०८ महिषियाँ थीं। ये सभी श्रीकृष्ण के प्रति आकृष्ट
रहती थीं, ठीक उसी प्रकार जैसे लोहा चुम्बक की ओर। एक भक्त का
उद्गार है, "हे कृष्ण ! आप चुम्बक हैं और व्रजांगनायें लोहे जैसी हैं।
आप जहाँ भी जाते हैं, वे आपके पीछे-पीछे दौड़ती हैं।"
४७. सर्व आराध्य
जो सब देव-मनुष्यों के लिए सबसे पहले पूजा के योग्य हो, उसे
सर्वाराध्य कहते हैं।
श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि सब जीवों के ही नहीं, वरन् बलराम,
शेष जैसे विष्णुरूपों के भी आराध्य हैं। बलदेव श्रीकृष्ण के स्वयं प्रकाश हैं,
परन्तु वे भी उन्हें आराध्य मानते हैं। जब श्रीकृष्ण युधिष्ठिर के राजसूय
में पधारे तो वे ऋषि, देव, सहित सारे सभासदों के आकर्षण के केन्द्र बन
गए और सभी ने उनका अग्रपूजन किया।
४८. समृद्धिमन्
श्रीकृष्ण वीर्य, श्री, यश, रूप, ज्ञान और वैराग्य—सभी ऐश्वर्यों में
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १५६
पूर्ण हैं। उनके द्वारका-निवास के समय यदुवंश में ५६ करोड़ सदस्य थे ।
ये सभी श्रीकृष्ण के विश्वासपात्र और आज्ञानुचर थे। नगर में नौ लाख
प्रासाद थे जिनके सारे निवासी श्रीकृष्ण को प्राणाराध्य समझते थे ।
श्रीकृष्ण के इस ऐश्वर्य को देखकर किसे आश्चर्य नहीं होगा । विल्वमंगल
ठाकुर ने कृष्णकर्णामृत के एक श्लोक में यही उद्गार अभिव्यक्त किया
है, "हे कृष्ण ! तुम्हारे वृन्दावन के ऐश्वर्य का क्या कहना । व्रजांगनाओं
के चरणों के भूषण चिन्तामणि से भी बढ़कर हैं और उन्होंने पारिजात के
पुष्पों का श्रृंगार धारण कर रखा है। गायें बिलकुल गोलोक धाम की
सुरभि गायों जैसी हैं। अहो ! आपके ऐश्वर्य-सागर को कौन माप
सकता है ।"
४६. वरीयान्
जो सम्पूर्ण मान्य पुरुषों में प्रधान हो उसे वरीयान् कहते हैं।
जिस समय श्रीकृष्ण द्वारका में निवास कर रहे थे, तो शिव, ब्रह्मा,
इन्द्र, आदि सब देवता उनके दर्शन के लिए आते थे। एक दिन प्रतिहारी
कहने लगा, "हे ब्रह्माजी—शिवजी ! कुछ देर सामने बैठकर प्रतीक्षा करें;
हे देवराज ! चाटुकारी करना व्यर्थ है, चुपचाप बैठो; हे वरुण ! तुम भागो
यहाँ से । ये सब देवता द्वार पर कोलाहल क्यों कर रहे हैं? अभी
द्वारकानाथ को मिलने का अवकाश नहीं है ।"
५०. परमईश्वर
जो स्वतन्त्र हो तथा जिसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन न कर सके,
उसे ईश्वर कहते हैं ।
श्रीकृष्ण की पूर्ण स्वतन्त्रता और ईश्वरत्व के सम्बन्ध में श्रीमद्-
भागवत कहती है कि यद्यपि कालिय महान् अपराधी था; फिर भी श्रीकृष्ण
ने उसे अपना चरणचिन्ह प्रसाद रूप में प्रदान किया, जबकि नाना प्रकार से
स्तुति करने पर भी ब्रह्मा की ओर देखा तक नहीं ।
श्रीकृष्ण का यह विचित्र व्यवहार सर्वथा योग्य ही है क्योंकि सम्पूर्ण
वैदिक शास्त्रों में उन्हें पूर्ण स्वतन्त्र कहा गया है। श्रीमद्भागवत के आदि
में आए 'स्वराट्' शब्द का भी यही तात्पर्य है। परम् ब्रह्म की स्थिति ऐसी
ही है । परतत्त्व चैतन्य ही नहीं है, पूर्ण स्वतन्त्र भी है ।
जहाँ तक सबके लिए श्रीकृष्ण की आज्ञा की दुर्लंघ्यता है, उसके
सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (३.२.२१) में उद्धवजी विदुर से कहते हैं, "भगवान्
१६० ] भक्तिरसामृतसिन्धु
श्रीकृष्ण त्रिगुणमयी माया के अधीश्वर हैं। वे सम्पूर्ण ऐश्वर्यों के भोक्ता हैं,
इसलिए उनके समान अथवा उनसे अधिक कोई नहीं हो सकता।" सारे
लोकपाल आकर उन्हें भेंट चढ़ाते थे और अपने मुकुटों से भगवान् के
चरणपीठ की वन्दना करते थे। एक भक्त बोला, “हे कृष्ण ! ब्रह्मा को
सृष्टि की आज्ञा देकर और शिव को संहार की आज्ञा करके आप ही सृष्टि-
संहार कर रहे हैं। आप केवल अपनी आज्ञा और अंशरूप विष्णु के द्वारा
सृष्टि का पालन करते हैं। हे कंसारि ! दिशा-दिशा में खड़े सारे ब्रह्मा,
शिव आदि आपके वशवर्ती हैं।
५१. सदास्वरूपसम्प्राप्त
श्रीकृष्ण का स्वरूप कभी नहीं बदलता, यहाँ तक कि प्राकृत-जगत्
में अवतरित होने पर भी उनका स्वरूप अविकृत रहता है। साधारण जीवों
का अप्राकृत स्वरूप ढक जाता है। वे नाना देह धारण करते हुए देहात्म-
बुद्धि के भेद से कर्म करते हैं। परन्तु श्रीकृष्ण का शरीर कभी नहीं बदलता।
वे अपने आदि स्वरूप में ही प्रकट होते हैं; इसलिए प्रकृति के गुणों के अधीन
नहीं हैं। श्रीमद्भागवत (१.११.३८) के अनुसार परमेश्वर की यह विशेषता
है कि वह माया के गुणों से कभी प्रभावित नहीं होता। इसका प्रत्यक्ष
उदाहरण भगवान् के शरणागत भक्त हैं जो माया से परे हो जाते हैं।
माया से पार होना बड़ा कठिन है, परन्तु भगवान् के संरक्षण में स्थित
सन्तपुरुष माया से पार हो जाते हैं। फिर स्वयं भगवान् के सम्बन्ध में क्या
कहना है ? यद्यपि भगवान् कभी-कभी इस प्राकृत-जगत् में प्रकट होते हैं, पर
प्रकृति के गुण उनका स्पर्श नहीं कर सकते। वे शुद्ध सत्त्व में स्थित रहकर
पूर्ण स्वतन्त्रता से कार्य करते हैं। भगवान् का यह एक विशेष गुण है।
५२. सर्वज्ञ
जो सबके मनोभाव को और सम्पूर्ण देशकाल की घटनाओं को
जानता हो, उसे सर्वज्ञ कहते हैं ।
श्रीभगवान् की सर्वज्ञता का एक सुन्दर उदाहरण श्रीमद्भागवत
(१.१५.११) में है। इसका सम्बन्ध उस घटना से है जब दुर्वासा मुनि वन में
पाण्डवों के निवास पर गए थे। पूर्व योजना के अनुसार दुर्योधन ने वन में
पाडवों के पास दस हजार शिष्यों के साथ दुर्वासा को अतिथिरूप में भेजा।
दुर्योधन ने ऐसी व्यवस्था की जिससे दुर्वासा का दल उस समय पाण्डवों के
यहाँ पहुँचे, जब पाण्डव भोजन कर चुके हों। भोजन न मिलने पर दुर्वासा
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६१ ]
शाप देकर पाण्डवों का नाश कर दें, ऐसा दुर्योधन का अभिप्राय था। दुर्योधन
के इस कुचक्र को जानकर श्रीकृष्ण पाण्डवों के पास आए और कहने लगे कि
मुझे भूख लगी है, कुछ खाने को दो। द्रौपदी उनके सामने खाली बर्तन ले
आई। परन्तु श्रीकृष्ण ने देखा कि उसमें साग का एक टुकड़ा शेष है। वे
तुरन्त उसे खा गए। दुर्वासा का दल उस समय नदी में स्नान कर रहा
था। द्रौपदी के अर्पण को खाने से श्रीकृष्ण की तृप्ति होते ही वे सब भी
तृप्त हो गए, उनकी भूख जाती रही। इसलिए फिर वे भोजन के लिए
युधिष्ठिर के स्थान पर नहीं लौटे। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने पाण्डवों को
दुर्वासा की क्रोधाग्नि से बचाया। दुर्योधन ने उन्हें यह सोचकर पाण्डवों के
पास भेजा कि वे इतनी बड़ी संख्या का आतिथ्य नहीं कर सकेंगे और तब
दुर्वासा क्रुद्ध होकर पाण्डवों को शाप दे देंगे। परन्तु श्रीकृष्ण ने अपनी युक्ति
और सर्वज्ञता के गुण के कारण इस आपत्ति से उनका रक्षण कर लिया।
५३. नित्यनूतन
भक्तजन निरन्तर श्रीकृष्ण का स्मरण और नामकीर्तन करते हैं, पर
फिर भी कभी तृप्त नहीं होते। उनकी इसमें कभी अरुचि नहीं होती; वे
नित्य नव-नव उत्साह के साथ भगवत्स्मरण और नामकीर्तन करते ही रहते
हैं। इसका कारण यह है कि श्रीकृष्ण नित्यनूतन हैं। श्रीकृष्ण ही नहीं,
उनका ज्ञान भी नित्यनूतन है। भगवद्गीता ५००० वर्ष पहले सुनाई गई
थी, परन्तु आज भी करोड़ों लोग बार-बार उसे पढ़ते हैं और हर बार उसमें
नया प्रकाश मिलता है। अतः श्रीकृष्ण एवं उनके नाम, यश, चिद्गुण और
उनसे सम्बन्धित सभी कुछ नित्यनूतन है।
द्वारका की सारी महिषियाँ लक्ष्मीदेवी थीं। श्रीमद्भागवत (१०.
११.३३) में कहा है कि लक्ष्मीदेवी बड़ी ही चंचला हैं, उन्हें कोई वश में नहीं
कर सकता। अतः किसी का भी भाग्य स्थिर नहीं रहता। परन्तु वही
लक्ष्मी देवी द्वारका में श्रीकृष्ण की सेवा को क्षणभर को भी नहीं छोड़ती
थीं। स्पष्टतः श्रीकृष्ण का आकर्षण नित्यनूतन है। लक्ष्मीदेवी भी उनका
संग नहीं छोड़ सकतीं।
श्रीकृष्ण के नित्यनूतन आकर्षण के सम्बन्ध में 'ललितमाधव' में
राधारानी का एक वाक्य है जिसमें श्रीकृष्ण को अपूर्व विश्वकर्मा कहा गया
है क्योंकि वे स्त्रियों के धर्म रूप पत्थरों को तोड़ने में दक्ष हैं। भाव यह है
कि पतिव्रता स्त्रियाँ चाहे सदा वैदिक विधान का आचरण करना चाहें, पर
श्रीकृष्ण अपनी माधुरीरूप हथौड़ी से उनके पातिव्रत्य रूप पत्थर को तोड़
१६२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
ही डालते हैं। श्रीकृष्ण की अधिकांश सखियों का विवाह हो चुका था;
परन्तु विवाह से पूर्व हुए श्रीकृष्ण के परिचय और उस श्रीअंग सौन्दर्य को
वे भुला न सकीं, जो विवाह के बाद भी उनके लिए मनोहारी था।
५४. सच्चिदानन्द विग्रह
श्रीकृष्ण का दिव्य शरीर सच्चिदानन्दमय है। सत् अर्थात् देशकाल
में सर्वव्यापी और चित् अर्थात् ज्ञानमय। श्रीकृष्ण को किसी से कुछ सीखना
नहीं है। वे स्वतन्त्र रूप से पूर्ण ज्ञानी हैं। आनन्द, अर्थात् अखिल रसराज।
निर्विशेषवादी ब्रह्मज्योति में लीन होना चाहते हैं, जिसमें केवल सत् और
चित् हैं। परन्तु श्रीकृष्ण में प्राप्त ब्रह्मसुख के मुख्यांश से वे वंचित रह जाते
हैं। ब्रह्मज्योति में लीन होने के दिव्य सुख का अनुभव मोह, मिथ्या देहात्म-
बुद्धि, राग, द्वेष और विषयासक्ति के विकारों से मुक्त होने पर ही होता है।
ब्रह्मानुभूति के लिए यह प्रारम्भिक योग्यता है। भगवद्गीता में उल्लेख है
कि प्रसन्नावस्था में स्थित हो जाना चाहिए। इसका प्रारम्भ शोक-निवृत्ति
से होता है। ब्रह्मभूत पुरुष तो प्रसन्नावस्था के साधक ही हैं। उस प्रसन्नता
की प्राप्ति वास्तव में श्रीकृष्ण का संग होने पर ही होती है। कृष्णभावना
सर्वथा पूर्ण है, अतः निर्विशेष ब्रह्म से प्राप्त वाला सुख उसमें अन्तर्निहित
(समाविष्ट) है। जो निर्विशेषवादी हैं, वे भी श्रीकृष्ण के श्यामसुन्दर रूप
पर मोहित हो जाते हैं।
ब्रह्मसंहिता का प्रमाण है कि ब्रह्मज्योति श्रीकृष्ण की अंगकांति है,
अर्थात् केवल श्रीकृष्ण का शक्तिप्रकाश है। श्रीकृष्ण ब्रह्मज्योति के स्रोत
हैं, जैसा भगवद्गीता में वे स्वयं कहते हैं। इससे निश्चय होता है कि
परतत्त्व की निर्विशेष विभूति अन्तिम नहीं है; श्रीकृष्ण ही परतत्त्व की
अवधि हैं।
वैष्णव सम्प्रदाय इसीलिए संसिद्धि के लिए ब्रह्मज्योति में कभी
लीन होना नहीं चाहते। वे श्रीकृष्ण को स्वरूप-साक्षात्कार का परम लक्ष्य
समझते हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण परम् ब्रह्म और परमेश्वर कहलाते हैं।
श्रीयामुनाचार्य प्रार्थना करते हैं, "हे भगवन् ! यह जो ब्रह्माण्ड है और
इसके अन्तर्गत जो कुछ देशकाल और एक-दूसरे से दस-दस गुण महत्त्व
वाले प्राकृत तत्त्वों के दस आवरण, प्रकृति के तीनों गुण, गर्भोदकशायी
विष्णु, क्षीरोदकशायी विष्णु, महाविष्णु, और उनसे परे परव्योम, ब्रह्म-
ज्योति, तथा वैकुण्ठ-धाम हैं-ये सब के सब आप की शक्ति की विभूति-
मात्र हैं।
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६३
५५. सर्वसिद्धिनिषेवित
सिद्धि के अनेक स्तर हैं। पूर्ण योगियों को प्राप्त सर्वोच्च प्राकृत
सिद्धियाँ आठ हैं—अणिमा, गरिमा इत्यादि । ये सब प्राकृत सिद्धियाँ तथा
सारी अप्राकृत सिद्धियाँ भी श्रीकृष्ण में पूर्ण रूप से रहती हैं।
५६. अचिन्त्य महाशक्ति
श्रीकृष्ण सर्वव्यापी हैं, वे ब्रह्माण्ड ही में नहीं, सम्पूर्ण जीवों के हृदय
में ही नहीं, वरन् अणु-अणु में विद्यमान हैं। महारानी कुन्ती ने अपने स्तवन
में श्रीकृष्ण की इस चिन्तनातीत दिव्य शक्ति का उल्लेख किया है। कुन्ती
देवी से वार्तालाप करते-करते ही वे उत्तरा के गर्भ में प्रविष्ट हो गए, जो
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से आक्रान्त थी। श्रीकृष्ण ब्रह्मा, शिव आदि को
भी मोहित कर सकते हैं और सम्पूर्ण शरणागत भक्तों के अमंगलमय
प्रारब्ध को विध्वंस करने में भी समर्थ हैं। ये उनकी अचिन्त्य शक्तियों के
कुछ उदाहरण मात्र हैं।
अस्तु, श्रील रूप गोस्वामी भगवान् श्रीकृष्ण की वन्दना करते हुए
कहते हैं, "सम्पूर्ण अपरा प्रकृति नराकृति श्रीकृष्ण की छायामात्र है।
उन्होंने असंख्य गौ, गौवत्स और गोपबालकों के रूप में अपना विस्तार किया
है और फिर उन सब में चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुए। उन्होंने
करोड़ों ब्रह्माओं को आत्मविद्या प्रदान की है, इसलिए वे ब्रह्माण्ड के अधी-
श्वरों के ही नहीं, वरन् चराचर जीवमात्र के आराध्य हैं। उन भगवान् को
मैं प्रणाम करता हूँ।"
जब श्रीकृष्ण इन्द्र को हरा कर स्वर्ग से पारिजात हरण करके ले
गए तो नारद जी उसके पास आकर उसे धिक्कारने लगे, "हे महेन्द्र !
श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव आदि को हरा रखा है, फिर तुझ जैसे तुच्छ देवता
किस कोटि में हैं ?" नारदजी के इस परिहास से इन्द्र हँस पड़ा। उनके
वाक्य में यह पुष्टि है कि श्रीकृष्ण ने ब्रह्मा, शिव तथा इन्द्र को सर्वथा
मोहित कर दिया था। फिर और जीवों के सम्बन्ध में श्रीकृष्ण की शक्ति
का तो कहना ही क्या है ।
भक्त के पापफल को दूर करने में श्रीकृष्ण की शक्ति का विवरण
ब्रह्मसंहिता में है, "इन्द्र से लेकर इन्द्रगोप कीड़े तक जीवमात्र प्रारब्ध भोग
रहा है। परन्तु श्रीकृष्ण की कृपा से कृष्णभक्त इनसे छूट जाता है।" यह
उस समय सिद्ध हो गया जब श्रीकृष्ण अपने मृत गुरुपुत्र को वापस लाने
यमालय गए। गुरु ने उनसे गुरुदक्षिणा के रूप में उनके मृत पुत्र को लौटा
लाने को कहा था। अतः श्रीकृष्ण तुरन्त यमलोक को गए और यमराज को
१६४] भक्तिरसामृतसिन्धु
आज्ञा दी, "उस जीव के कर्म की ओर ध्यान न देकर उसे तुरन्त मुझे लौटा
दो।" इस घटना का तात्पर्य यह है कि प्रकृति के नियमानुसार यम द्वारा
दण्डनीय प्राणी भी कृष्णकृपा से पूर्णतः छूट सकता है।
श्रीकृष्ण की अचिन्त्य शक्तियों का वर्णन शुकदेव गोस्वामी ने
श्रीमद्भागवत में इस प्रकार किया है, "जो अजन्मा होने पर भी नन्द
महाराज के पुत्र हैं, सर्वव्यापक होने पर भी यशोदा के अंक में खेलते हैं विभु
होते हुए यशोदा की प्रेम-रज्जु से बँध गए हैं, अनेकरूप होने पर भी जो
नन्द-यशोदा के आगे एकरूप में विचर रहे हैं, वे अनन्त अचिन्त्य शक्ति-
शाली श्रीकृष्ण मेरी बुद्धि को मुग्ध कर रहे हैं।" ब्रह्मसंहिता में भी उल्लेख
है कि यद्यपि अपने गोलोक वृन्दावन धाम में श्रीकृष्ण का नित्य-निवास है,
तथापि वे सर्वव्यापक हैं, यहाँ तक कि परमाणुओं में भी हैं।
५७. कोटिब्रह्माण्डविग्रह
श्रीमद्भागवत (१०.१४.११) में ब्रह्माजी कहते हैं, "महत्तत्त्व, अहं-
कार, मन, बुद्धि, आकाश, वायु, जल, अग्नि, पृथ्वी-इन प्राकृत तत्त्वों से यह
बृहत् अण्ड बना है। केवल एक ब्रह्माण्ड का रचयिता इस प्रकार का तुच्छ
शरीर वाला कहाँ और कहाँ मैं आप, जिनके रोमकूपों से प्रकाश में
परमाणुओं के समान असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं। आपके
महत्त्व के सामने मैं तो बिल्कुल नगण्य हूँ, अतः क्षमा करके मुझ पर कृपा
कीजिए।"
यदि कोई केवल एक ब्रह्माण्ड की भी जाँच करे तो उसमें असंख्य
लोक, निवास और देवलोक जैसी अद्भुत वस्तुयें पायगा। ब्रह्माण्ड का
पूर्ण विस्तार ५० करोड़ योजन है और वह अनेक अप्रमेय पाताल लोकों से
भी युक्त है। श्रीकृष्ण इस सब के उद्गम अवश्य हैं; परन्तु अपनी अचिन्त्य
शक्ति का विस्तार करते हुए वे सदा वृन्दावन में ही रहते हैं। ऐसे सर्व-
शक्तिमान् प्रभु की स्तुति में कौन समर्थ हो सकता है ?
५८. अवतारावलीबीज
गीतगोविन्द में जयदेव गोस्वामी ने गाया है, "भगवान् ने मत्स्यरूप
से वेदों का उद्धार किया है; कूर्मावतार में सम्पूर्ण जगत् का वहन किया
है; वराह अवतार में पृथ्वी को जल से निकाला है; नृसिंहरूप में हिरण्यक-
शिपु का वध किया है, वामन अवतार में बलि से छल किया है; परशुराम
के रूप में सम्पूर्ण क्षत्रिय-वंश का नाश किया है; राम अवतार में सब असुरों
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६५
का वध किया है; बलरामरूप में हल को धारण किया है; बुद्ध अवतार में
पशुओं को हिंसा से बचाया है, तथा कल्कि अवतार* में सारे नास्तिकों का
संहार किया है।" श्रीकृष्ण के ये केवल कुछ प्रधान अवतार हैं; श्रीमद्भागवत
से ज्ञात होता है कि श्रीकृष्ण के विग्रह से सागर में तरंगों के समान निरन्तर
असंख्य अवतार होते रहते हैं। सागर की तरंगों को कोई नहीं गिन सकता;
इसी प्रकार भगवत्-वपु से होने वाले अवतारों की गणना भी असम्भव है।
५६. हत-अरि-गतिदायक
मुक्ति का एक नाम अपवर्ग भी है। यह उस पवर्ग के विपरीत है,
जिसका अर्थ है नाना प्रकार के प्राकृत दुःख । पवर्ग में पाँच अक्षर हैं-
प, फ, ब, भ और म । ये निम्नलिखित पाँच दुःखों के वाचक हैं-'प'-पराभव
(पराजय) । संसार में अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए हमें पराजय ही
पराजय का सामना करना पड़ रहा है। वास्तव में हमारा काम जन्म, मृत्यु,
जरा और रोग को जीतना है। माया के कारण इन दुःखों पर विजय सम्भव
न होने के कारण हमें निरन्तर परास्त होना पड़ रहा है। अगला अक्षर
'फ' फेनिल से है। यह उस फेन का नाम है जो बहुत थक जाने पर मुख में
आ जाता है (जैसा घोड़ों में प्रायः देखने में आता है)। 'ब' अर्थात् बन्धन ।
'भ'-भीति (भय) तथा म - मृत्यु । अतः पवर्ग अस्तित्व के लिए संघर्ष
और परिणाम में होने वाले पराभव, श्रान्ति, बन्धन, भय और मृत्यु का
वाचक है। अपवर्ग उसे कहते हैं जिससे ये सब दुःख दूर हो जायें। श्रीकृष्ण
को इस अपवर्ग अथवा मुक्तिपथ का दाता कहा जाता है।
निर्विशेषवादियों और श्रीकृष्ण के शत्रुओं के लिए मुक्ति का अर्थ
ब्रह्मज्योति में लीन हो जाना है। वे श्रीकृष्ण का तिरस्कार करते हैं; पर
श्रीकृष्ण इतने अतिशय दयामय हैं कि अपने शत्रुओं और निर्विशेषवादियों
को भी मुक्ति देते हैं। इस सम्बन्ध में उल्लेख है, "हे मुरारे ! देवताओं के
द्वेषी असुर आपकी सेना का भेदन तो नहीं कर सके, परन्तु मित्रमण्डल को
भेद कर अमृतत्व को अवश्य प्राप्त हो गए हैं, यह कितना विचित्र है।"
यहाँ 'मित्र' शब्द श्लिष्ट है। मित्र का अर्थ सूर्य भी होता है और सखा भी।
श्रीकृष्ण के साथ युद्ध करने वाले असुर उनकी सेना का भेदन करना चाहते
थे; परन्तु ऐसे करने में वे युद्ध में मारे गए और मित्र, अर्थात् सूर्यमण्डल
का भेदन कर गए अथवा ब्रह्मज्योति में लीन हो गए। यहाँ सूर्यमण्डल का
- लेखक के ग्रन्थ भगवत् सन्देश (श्रीमद्भागवत) भाग १ में इन सब
अवतारों का विवरण है।
१६६ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
उदाहरण हैं, क्योंकि वह स्वयंप्रकाश वैकुण्ठ लोकों वाले परव्योम के समान
ही नित्य देदीप्यमान् रहता है । असुरगण मारे गए और श्रीकृष्ण के सैन्यबल
को भेदे बिना ही ब्रह्मज्योति के मित्र परिवेश में प्रविष्ट हो गए । इसी
दया के कारण श्रीकृष्ण शत्रु के भी उद्धारक कहलाते हैं ।
६०. आत्मारामगणाकर्षी
ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब श्रीकृष्ण ने शुकदेव और चारों कुमार
जैसे महान् जीव-मुक्त पुरुषों को भी आकृष्ट कर लिया । इस सम्बन्ध में
कुमार कहते हैं, “कैसा आश्चर्य है कि इच्छा से रहित पूर्ण मुक्त परमहंस
अवस्था में होने पर भी हम राधाकृष्ण की लीला का आस्वादन करने को
उत्कण्ठित हैं ।”
६१. असाधारण लोला वारिधि
'बृहद्वामन पुराण' में भगवान् स्वयं कहते हैं, “यद्यपि मेरी अनेक
मनोहर लीलायें हैं, पर गोपियों के साथ की रासलीला का स्मरण होते ही
न जाने क्यों मेरा मन उसके लिए फिर आतुर हो उठता है ।”
एक भक्त की वाणी है, “मैं लक्ष्मीपति नारायण को जानता हूँ और
अन्यान्य अनेक अवतारों को भी जानता हूँ । इन सभी अवतारों के चरित
मनोहारी हैं; फिर भी न जाने क्यों साक्षात् श्रीकृष्ण का रासलीलारस
अद्भुत रूप में मेरे दिव्य आनन्द को बढ़ा रहा है ।”
६२. श्रीकृष्ण प्रियभक्तों से परिवेष्टित हैं
श्रीकृष्ण कभी अकेले नहीं रहते । कृष्ण का अर्थ है उनके नाम, गुण,
यश, उनके मित्र, उनकी सामग्री, उनका परिकर, इत्यादि सभी कुछ । राजा
सदा मन्त्रियों, सचिवों, सेनाध्यक्षों तथा अन्य बहुत से व्यक्तियों से घिरा
रहता है । इसी प्रकार श्रीकृष्ण भी निर्विशेष नहीं हैं । विशेषतः अपनी
वृन्दावन लीला में वे गोपीजनों, गोपबालकों, माता, पिता तथा सम्पूर्ण
वृन्दावन वासियों से परिवेष्टित रहते हैं ।
श्रीमद्भागवत (१०.३१.१५) में गोपीजन शोक करती हैं, “हे कृष्ण !
तुम दिन में जब वृन्दावन में गोचारण के लिए जाते हो तो हमारा पल-
पल युग के समान बड़ी कठिनता से बीतता है । फिर संध्या समय जब तुम
लौटते हो तो तुम्हारी मुख-माधुरी पर आकृष्ट हुईं हम उसे निरन्तर निहारा
करती हैं । ऐसे में पलकों का कदाचित् गिर जाना असह्य हो जाता है; हमें
श्रीकृष्ण के गुण (२) [ १६७
लगता है विधाता जड़बुद्धि है; वह तुम्हारे दर्शन के योग्य नेत्र बनाना भी
नहीं जानता ।" भाव यह है कि गोपियों को पलकों को गिरने से क्षोभ
होता है, क्योंकि इससे श्रीकृष्ण के दर्शन में तनिक बाधा आती है। इससे
प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण के लिए गोपियों का प्रेम इतना अतिशय
तथा भावमय था कि उनका क्षण भर का विरह भी वे सहन नहीं कर
सकती थीं । फिर श्रीकृष्ण को देखने पर भी उन्हें क्षोभ होता । यह अद्भुत
पहेली है ।
एक गोपी श्रीकृष्ण से अपने हृदय का उद्गार प्रकट करती हुई कहती
है, "आपके संग में ब्रह्मरात्रि* भी हमारे लिए क्षणमात्र के समान बीत जाती
है।" ब्रह्मा के एक दिन का अनुमान भगवद्गीता के इस वाक्य से लगाया
जा सकता है— "मानवी गणना के अनुसार एक हजार चतुर्युग से ब्रह्मा का
एक दिन बनता है और इसी अवधि की उसकी रात्रि है" (पृ० १७) गोपियों
ने कहा कि उन्हें इस अवधि की रात्रि मिल जाय तो वह भी श्रीकृष्ण का संग
करने के लिए पर्याप्त न होगी ।
६३. वेणुमाधुर्य
श्रीमद्भागवत (१०.३५.१५) में गोपीजन यशोदा मैया से कहती हैं,
"जब तुम्हारा बालक अपनी वंशी बजाता है तो परम विद्वान् महान् ब्रह्मा,
शिव, इन्द्र आदि तक मोहित हो जाते हैं। उस वेणुरव से उनका सिर
विनम्र भाव से अवनत हो जाता है और वे एकाग्रचित्त हो जाते हैं।"
'विदग्धमाधव' में श्रील रूप गोस्वामी श्रीकृष्ण की वंशीध्वनि का
वर्णन करते हुए कहते हैं, "श्रीकृष्ण के वेणुनाद ने आश्चर्यपूर्वक शिवजी
डिण्डिम डमरू को बजने से रोक दिया । उसी नाद ने कुमार आदि ऋषियों
को ध्यान से विचलित किया है; सृष्टि-कार्य के लिए कमल पर आसीन
ब्रह्माजी चकित हो उठे हैं और सम्पूर्ण लोकों को धारण करने वाले शेष-
नाग झूमने लगे हैं, उसी वंशीध्वनि के कारण जो इस ब्रह्माण्ड के आवरण
का भेदन करके वैकुण्ठ-जगत् में जा पहुँची है ।
६४. श्रीकृष्ण का असमोर्ध्व रूपमाधुर्य
श्रीमद्भागवत (३.२.१२) में उद्धव विदुर से कहते हैं, "हे विदुर !
जिस समय श्रीकृष्ण इस धरा पर प्रकट होकर अपनी आत्ममाया की शक्ति
- ४,३०,००,००,००० सौर वर्ष ब्रह्मा के बारह घण्टे अथवा एक रात्रि के
तुल्य हैं ।
१६८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
का प्रकाश कर रहे थे, उनका शरीर माधुर्यातिशय के कारण परम अद्भुत
था। उनकी आत्ममाया द्वारा प्रकटित ऐश्वर्य सब के लिए आकर्षक था।
उनकी श्रीअंग माधुरी इतनी अतुलित थी कि उनके लिए शरीर पर
अलंकार धारण करना व्यर्थ था। वस्तुतः आभूषणों से विभूषित होने के
स्थान पर श्रीकृष्ण का सौन्दर्य ही उन्हें विभूषित रहा था।"
श्रीकृष्ण के श्रीअंग-माधुर्य और वेणु के आकर्षण के सम्बन्ध श्रीमद्-
भागवत (१०.२६.४०) में गोपियां उनसे कहती हैं, "हे कृष्ण ! यह सत्य है
कि हममें तुम्हारे लिए उपपति का सा भाव है, परन्तु तुम्हारी वंशी ध्वनि
को सुनकर त्रिभुवन में ऐसी कौन सी स्त्री है जो पतिव्रतधर्म से विचलित
न हो जाय ? स्त्रियों की तो बात ही क्या, पाषाण हृदय मनुष्य भी तुम्हारे
वेणुरव से द्रवित हो जाते हैं। तुम्हारी मधुर मुरली की तान और मनोहारी
रूपमाधुरी से तो वृन्दावन गाय, हिरन, पक्षी और वृक्ष भी मुग्ध और पुल-
कित हो उठे हैं।
श्रील रूप गोस्वामी रचित ललितमाधव में उल्लेख है, "एक दिन
श्रीकृष्ण को रत्नजड़ित दर्पण में अपने सुन्दर रूप की छाया दृष्टिगोचर हुई।
इस पर वे कहने लगे, "अहो ! यह रूप कैसा अद्भुत एवं अपूर्व है। यद्यपि
यह मेरा ही रूप है, फिर भी इसे देखकर मैं राधारानी के समान ललचाता
हुआ स्वयं इसका आलिंगन करके आनन्दित होना चाहता हूँ।" इस वाक्य
से सिद्ध होता है कि श्रीकृष्ण और उनकी छाया एकतत्त्व है। उनमें और
उनकी छाया में अथवा उनमें और उनके चित्र में अन्तर नहीं है। ऐसी
श्रीकृष्ण की दिव्य स्थिति है।
उपरोक्त वाक्यों में श्रीकृष्ण में स्थित कतिपय रस-सागरों और
गुणों का विवरण है। श्रीकृष्ण के दिव्य गुण सागर के समान हैं। सागर
की ओर छोर का माप कोई नहीं कर सकता; पर फिर भी एक विन्दु को
चखने से सम्पूर्ण सागर के स्वरूप को जाना जा सकता है। इसी भांति
ये सारे वाक्य श्रीकृष्ण की दिव्य अवस्था और गुणों का दिग्दर्शन कराते हैं।
श्रीमद्भागवत (१०.१४.७) में ब्रह्माजी कहते हैं, "हे भगवन् ! इस
धरा पर प्रकट होकर आपने जो-जो अचिन्त्य गुण, सौन्दर्य और लीलायें
प्रकट की हैं, उनकी गणना करने में कौन समर्थ हो सकता है ? आपके
सम्बन्ध में तो कोई अनुमान नहीं लगा सकता। यह सम्भव है कि जन्म-
जन्मान्तर में प्राकृत वैज्ञानिक सम्पूर्ण जगत् के परमाणुओं अथवा आकाश
के तारों को गिनने में सफल हो जायें; परन्तु फिर भी हे आनन्दनिधान !
आपके दिव्य गुणों की गणना असम्भव ही रहेगी।"
अध्याय २३
श्रीकृष्ण का स्वरूप
श्रील रूप गोस्वामी लिखते हैं कि यद्यपि श्रीकृष्ण अनन्त रसराज
और सम्पूर्ण नायकों में शिरोमणि हैं, फिर भी उन्हें तीन प्रकार से भक्तों से
अपेक्षा है। भक्त के भाव के अनुसार भगवान् का पूर्णतम पूर्णतर और पूर्ण—
इन तीन रूप रूपों में आस्वादन होता है। सम्पूर्ण गुणों को प्रकाशित करने
वाला स्वरूप विद्वानों द्वारा पूर्णतम कहा जाता है। सम्पूर्ण गुणों से कुछ कम
गुणों को प्रकट करने वाला स्वरूप पूर्णतर और थोड़े गुणों का प्रदर्शन स्वरूप
पूर्ण कहलाता है। इस प्रकार श्रीकृष्ण का आस्वादन पूर्णता की तीन श्रेणियों
में होता है। श्रीकृष्ण गोलोक-वृन्दावन में पूर्णतम हैं, द्वारका में पूर्णतर हैं
और मथुरा में पूर्ण हैं।
श्रीकृष्ण का स्वरूप चार प्रकार का है । धीरोदात्त, धीरललित,
धीरप्रशान्त तथा धीरोद्धत । श्रीकृष्ण अखिल चिद्गुणों और लीलाओं के
भण्डार हैं; उस उस प्रकार की लीलाओं के अनुसार ही यहाँ उनकी चतु-
विधता कही गई है, अतः इसमे कोई विरोध (असंगति) नहीं होता ।
धीरोदात्त
जो स्वभाव से ही गम्भीर, विनयी, क्षमाशील, दयामय, दृढ़व्रती,
निरभिमान, उत्तम, शक्तिशाली और शरीर से आकर्षक हो, वह धीरोदात्त
नायक कहलाता है।
इस सन्दर्भ में देवराज इन्द्र का यह वाक्य महत्त्वपूर्ण है, “हे नाथ !
मैंने अवश्य आपका महान् अपराध किया है, परन्तु आपकी अद्भुत शक्ति,
भक्तवत्सलता, गोवर्धन-धारण करने से प्रकट हुई दृढ़ता, श्रीअंग-सौन्दर्य
तथा भक्त और अपराधियों की स्तुति से प्रसन्न हो जाने का विस्मापक
गुण—इन सब को देख कर मेरी बुद्धि और वाणी स्तब्ध रह जाती हैं।”
देवराज इन्द्र का यह वाक्य श्रीकृष्ण में धीरोदात्त नायक के सब
१७०] भक्तिरसामृतसिन्धु
लक्षणों को सिद्ध करता है। अनेक विद्वानों ने भगवान् रामचन्द्र को भी
धीरोदात्त माना है, परन्तु श्रीराम के सम्पूर्ण गुण भगवान् श्रीकृष्ण में आ
जाते हैं।
धीरललित
जो स्वभाव से परिहास करने में अति पारंगत, नित्य नवयौवन से
युक्त, कलाओं में चतुर और निश्चिन्त हो उसे धीरललित नायक कहा
जाता है। ऐसा नायक प्रायः प्रेयसी के परवश रहता है। श्रीकृष्ण के स्वरूप
में इस धीरललित गुण का वर्णन श्रीमद्भागवत में है। यज्ञपत्नी ने वृन्दावन
में अपनी सखी से कहा, “एक दिन जब सखियों के साथ राधारानी उद्यान
में विश्राम कर रही थीं, तो श्रीकृष्ण वहाँ आ पहुँचे और वहीं सबके सामने
रात्रि में राधारानी की रतिकला का वर्णन करने लगे। राधाजी ने लज्जा से
नेत्र नीचे की ओर कर लिए। इस अवसर पर श्रीकृष्ण राधाजी के स्तनों
पर बड़ी पाण्डित्यपूर्ण चित्रकारी करने लगे।” इस प्रकार धीरललित रूप में
श्रीकृष्ण ने गोपियों के साथ यौवन का विहार किया।
साधारणतः नाटककार धीरललित नायक के रूप में कामदेव का
नाम लेते हैं, परन्तु श्रीकृष्ण के स्वरूप में धीरललित के लक्षण अधिक
पूर्ण हैं।
धीरप्रशान्त
शान्त प्रकृति से युक्त, क्लेश सहन करने में समर्थ, विवेचन तथा
विनय, आदि गुणों वाला नायक धीरप्रशान्त कहलाता है। श्रीकृष्ण के
धीरप्रशान्तत्व का प्रकाश पाण्डवों से उनके व्यवहार में हुआ था। अपने
पाण्डवों के श्रद्धा-प्रेम के कारण वे उनके सारथि, परामर्शदाता, मित्र, दूत
और अंगरक्षक तक बने। विष्णुभक्ति का ऐसा ही फल होता है। युधिष्ठिर
के समक्ष धर्म का उपदेश करते हुए श्रीकृष्ण ने प्रगाढ़ पाण्डित्य का प्रकाश
किया, परन्तु अनुज के रूप में उनकी वाणी अतिशय विनीत थी, जिससे
शरीर-सौन्दर्य बढ़ गया। उनके नेत्रों की भंगी और बोलने के प्रकार से
स्पष्ट था कि वे नीति को प्रकाशित करने में पारंगत हैं। कदाचित विद्वज्जन
युधिष्ठिर को भी धीरप्रशान्त कहते हैं।
धीरोद्धत
जो बहुत ईर्ष्यालु, (अहंकारी), सहज ही क्रुद्ध होने वाला, चंचल
श्रीकृष्ण का स्वरूप [ १७१
चित्त तथा आत्मश्लाघा करता हो उसे विद्वान् धीरोद्धत कहते हैं। श्रीकृष्ण के
स्वरूप के ये गुण भी हैं। यवनराज कालयवन को पत्र लिखते समय श्रीकृष्ण
ने उसे पापात्मा मण्डूक कहा था। उन्होंने उसे परामर्श दिया कि वह
अविलम्ब किसी अन्धे कुएँ में निवास जा ढूँढे, क्योंकि कृष्ण नामक काला
सर्प ऐसे सभी पापी मेंढकों को खाने को तैयार बैठा है। श्रीकृष्ण ने काल-
यवन को याद दिलाया कि वे अपनी दृष्टिमात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को भस्म
कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण के उपरोक्त वाक्य में मात्सर्य का दोष प्रतीत होता है;
परन्तु देश, काल और लीला के अनुसार होने पर इसे भी महान् गुण माना
जाता है। श्रीकृष्ण के धीरोद्धत गुणों की महानता का रहस्य यह है कि वे
उनका प्रयोग केवल अपने भक्तों की रक्षा के लिए ही करते हैं। अर्थात्,
भक्तियोग के आदान-प्रदान में प्रयुक्त अवगुण भी गुण बन जाते हैं।
भीमसेन को भी धीरोद्धत नायक कहा गया है।
हिरन के रूप में लड़ने आए एक असुर को ललकारते हुए श्रीकृष्ण
कहते हैं, "मुझ कृष्ण रूप गजराज से हार कर या तो युद्ध से भाग जा
अथवा यम को याद कर ।" श्रीकृष्ण की यह निरंकुशता उनके उत्कृष्ट
गुणों की विरोधी नहीं है, क्योंकि परम पुरुष होने के कारण उनके चरित्र में
सभी कुछ हो सकता है।
भगवान् में प्राप्त होने वाले विरोधी गुणों के सम्बन्ध में 'कूर्म पुराण'
में उल्लेख है कि श्रीभगवान् न तो स्थूल हैं, न अणु हैं, वर्णहीन होने पर भी
श्यामवर्ण हैं। उनके नेत्र रक्तवर्ण हैं तथा वे सर्वशक्तिमान् और सम्पूर्ण
ऐश्वर्यों से युक्त हैं। भगवान् में विरुद्ध धर्मों का होना आश्चर्यदायक नहीं
है; प्रतीत होने पर भी उनके गुणों में वास्तव में कोई विरोध नहीं है।
आचार्यों के मुख से श्रीकृष्ण के गुणों का तत्त्व जानना चाहिए । तब यह
ज्ञात हो जायगा कि भगवान् की प्रबल इच्छा-शक्ति के अनुसार ये गुण
किस प्रकार कार्य करते हैं।
'महावराह पुराण' में प्रमाण है कि भगवान् के सारे दिव्य शरीर और
अंश शाश्वत् हैं। वे हानोपादनरहित पूर्णतः अप्राकृत और ज्ञानमय हैं तथा
परमानन्द से परिपूर्ण हैं। 'वैष्णव तन्त्र' के एक वाक्य में कहा है कि भगवान्
के सब शरीर और अंश अट्ठारह प्राकृत दोषों से नित्य मुक्त हैं, क्योंकि वे
सच्चिदानन्दमय हैं। विष्णुतन्त्र में इन अट्ठारह दोषों का उल्लेख है—मोह,
तन्द्रा, भ्रम, रूखापन, काम, चंचलता, मद, मात्सर्य, हिंसा, खेद, परिश्रम,
१७२ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
असत्य, क्रोध, आकांक्षा, आशंका, पराधीनता, विषमता, शठता तथा
ब्रह्माण्ड पर अधिकार करने की इच्छा ।
उपरोक्त सब वाक्यों के सम्बन्ध में यह समझना चाहिए कि महा-
विष्णु प्राकृत् जगत् में समस्त अवतारों के उद्गम हैं। परन्तु व्रजेन्द्रनन्दन
अधिक माधुर्यभर होने के कारण उस महाविष्णु के भी मूल हैं। इसके
समर्थन में ब्रह्मसंहिता कहती है, "जिस विष्णु के निश्वास काल में उसके
रोमकूपों से असंख्य ब्रह्माण्ड प्रकट-अप्रकट होते रहते हैं, वह महान् विष्णु
भी जिन का कलाविशेष मात्र है, उन आदि पुरुष भगवान् गोविन्द को मैं
नमस्कार करता हूँ।"
[ १७५ ]
अध्याय २४
श्रीकृष्ण के वैशिष्ट्य
भगवान् श्रीकृष्ण के विविध ऐश्वर्यों का वर्णन करके श्रील रूप
गोस्वामी उनके निम्नलिखित गुणों और आठ माधुरियों का वर्णन करते
हैं : शोभा, विलास, माधुर्य, मंगल्य, स्थैर्य, तेज, लालित्य तथा उदारता । ये
आठ गुण सामान्यतः महापुरुषों के लक्षण माने जाते हैं ।
शोभा
दीनों पर दया, शौर्य, स्पर्धा, उत्साह, दक्षता तथा सत्य—इन गुणों
से शोभित व्यक्ति महापुरुष माना जाता है । गोवर्धन-धारण-लीला में सभी
शोभायें श्रीकृष्ण में प्रकट हुई थीं । उस समय सम्पूर्ण वृन्दावन धाम पर
इन्द्र के मेघ मूसलाधार वर्षा का उत्पात कर रहे थे । पहले श्रीकृष्ण स्वर्ग का
नाश करने के लिए उद्यत हुए, परन्तु फिर देवराज की तुच्छता का विचार
करके इन्द्र पर दयार्द्र हो गए । श्रीकृष्ण के क्रोध को कोई नहीं सह सकता;
अतः इन्द्र का प्रतिकार करने के स्थान पर अपने प्रिय व्रजवासियों की
रक्षा के लिए गोवर्धन-धारण करके उन्होंने उनके लिए अपनी दया ही
प्रकट की ।
विलास
जो पुरुष सदा प्रसन्न रहता है और मुस्कराते हुए बात करता है,
उसे विलासी समझना चाहिए । श्रीकृष्ण में यह गुण उस समय प्रकट हुआ
जब वे कंस के यज्ञमण्डप में पधारे । वहाँ वर्णन है कि मत्तनयन श्रीकृष्ण
ने किसी के प्रति अविनय का प्रदर्शन किए बिना मल्लों के मध्य में प्रवेश
किया जब उन्होंने उन पर स्थिर दृष्टिपात किया तो ऐसे लगे मानो गजराज
वनस्पति को उखाड़ रहा हो । इस प्रकार स्मितकान्ति से युक्त श्रीकृष्ण
वीरतापूर्वक रंगमंच पर चढ़ गए ।
माधुर्य
जिसकी चेष्टा आदि स्पृहणीय हों, उसे मधुर कहते हैं । श्रीकृष्ण के
१७४ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
माधुर्य का एक उदाहरण श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है, "यमुना के
किनारे राधारानी की प्रतीक्षा करते हुए श्रीकृष्ण कदम्ब की माला बना
रहे थे। तभी राधारानी का वहाँ आगमन हुआ और उस समय मुरारि ने
उन पर अतिशय मधुर दृष्टि डाली।"
मंगल्य
जो सब अवस्थाओं में सबका विश्वासपात्र हो, उसे मंगल्य कहते हैं।
इस सम्बन्ध में श्रील रूप गोस्वामी कहते हैं कि दानव भी श्रीकृष्ण की
विश्वसनीयता पर निर्भर कर रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि न्याययुक्त
कारण के बिना श्रीकृष्ण भी आक्रमण नहीं करेंगे। अतः वे निर्भय होकर
द्वार खुले रखते थे । यद्यपि देवताओं को दानवों से भय था; परन्तु
श्रीकृष्ण हमारे रक्षक हैं, यह सोचकर वे भय की अवस्था में भी क्रीड़ामत
रहते थे। जिन्होंने कभी वैदिक विधि का आचरण नहीं किया, वे लोग भी
यह जानकर निश्चिन्त हो रहे हैं कि श्रीकृष्ण केवल श्रद्धा-भक्ति को ही
स्वीकार करते हैं। इसलिए वे कृष्णभावना के परायण होकर सम्पूर्ण
उद्वेगों से मुक्त हो गए हैं। भाव यह है कि देवताओं से लेकर असभ्य
मनुष्य तक सभी भगवान् श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपा पर निर्भर कर
सकते हैं।
स्थैर्य
नाना विघ्न उपस्थित होने पर भी अपने निश्चय पर अचल रहना
स्थैर्य है। बाणासुर-वध के प्रसंग में श्रीकृष्ण में स्थिरता प्रकट हुई है ।
बाण के हजार हाथ थे, परन्तु श्रीकृष्ण उन्हें एक-एक करके काटते गए।
यह बाण शिव और दुर्गा का बड़ा भक्त था। अतः उसका वध होता
देखकर शिव और दुर्गा श्रीकृष्ण पर बहुत क्रुद्ध हुए, परन्तु श्रीकृष्ण ने
उनकी ओर ध्यान ही नहीं दिया।
तेज
जो सबके चित्त को प्रभावित कर सकता है, उसे तेजस्वी कहते हैं।
श्रीकृष्ण के तेज के सम्बन्ध में श्रीमद्भागवत (१०.४३.१७) में शुकदेव
गोस्वामी परीक्षित महाराजा से कहते हैं, "हे राजन् ! श्रीकृष्ण मल्लों के
लिए वज्र के समान भयंकर हैं; साधारण मनुष्यों के लिए नरश्रेष्ठ; स्त्रियों
के लिए मूर्तिमान् कामदेव; गोप-गोपियों के लिए परम बन्धु; दुष्ट राजाओं
के लिए दण्ड देने वाले शासक; नन्द-यशोदा के लिए शिशु; भोजराज कंस