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भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)

Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary

श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 380 में से

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पृष्ठ 86

भक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५६
के लिए या अभिमानवश अपने शिष्यों की संख्या बढ़ाये तो वह निश्चित
रूप से कृष्णभावना के पथ से गिर जायगा।
विद्वत्ता दिखाने के लिये अधिक ग्रन्थों के अध्ययन स अथवा नाना
स्थानों पर व्याख्यान देकर कीर्ति अर्जित करने से भी सद्गुरु को कोई
प्रयोजन नहीं होता। इन सब दोषों से बचना चाहिए। यह भी उल्लेख है
कि नए मन्दिर बनाने का अधिक उत्साह न रखे। श्रीचैतन्य महाप्रभु की
परम्परा के सभी आचार्यों से जीवन में हम देखते हैं कि वे मन्दिर-निर्माण
में अधिक उत्साह नहीं रखते। परन्तु यदि कोई कुछ सेवा करना चाहे तो
ये संकोची आचार्य उस सेवक को बहुव्यय साध्य मन्दिरों के निर्माण की
अनुमति दे देंगे। मुगल सम्राट् अकबर का सेनाधिपति मानसिंह रूप
गोस्वामी की सेवा करना चाहता था। अतः रूपगोस्वामी ने बड़ी लागत से
विशाल गोविन्ददेव के मन्दिर का निर्माण करने की आज्ञा दे दी।
अस्तु, सद्गुरु को मन्दिर निर्माण का दायित्व स्वयं नहीं उठाना
चाहिए; परन्तु यदि किसी के पास धन हो, जिसे वह भगवत्सेवा में व्यय
करना चाहे तो रूप गोस्वामी जैसे आचार्य उस धन को भगवान् की सेवा
के लिए बड़ा-सा सुन्दर मन्दिर बनाने में लगा सकते हैं। दुर्भाग्यवश कभी-
कभी गुरुपद के अयोग्य व्यक्ति भी धनाढ्य पुरुषों से मन्दिर-निर्माण के
लिए धन माँगते हैं। यदि अयोग्य गुरु ऐसे धन का प्रयोग वास्तविक प्रचार-
कार्य किए बिना केवल बड़े-बड़े मन्दिरों में सुख से रहने में करे तो यह
शास्त्रविरुद्ध होगा। भाव यह है कि नाममात्र के परमार्थ के लिए सद्गुरु
मन्दिर-निर्माण में अधिक रुचि न दिखाये। उसका पहला और प्रधान
कर्तव्य प्रचार करना है। इस सन्दर्भ में श्रील भक्तिसिद्धान्त गोस्वामी
महाराज कहा करते थे कि गुरु ग्रन्थों का प्रकाशन करे। उपलब्ध धन से
महँगे मन्दिर बनाने की अपेक्षा कृष्णभावना आन्दोलन के प्रसार के लिए
नाना भाषाओं में प्रामाणिक ग्रन्थ छापने चाहियें।
व्यवहार में निष्कपटता तथा हानि-लाभ में समता
'पद्मपुराण' में एक वाक्य है, “कृष्णभावना-परायण पुरुषों को
प्राकृत हानि-लाभ से चिन्तित नहीं होना चाहिए। हानि में भी स्थिरबुद्धि
के साथ अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करे।” बद्धजीव प्राकृत
क्रियाओं के चिन्तन में डूबा रहता है। उसे इन विचारों से मुक्त होकर
कृष्णभावनाभावित हो जाना है। पूर्ववर्णन के अनुसार, निरन्तर कृष्ण-