भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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स्मरण कृष्णभावना का प्रधान सिद्धान्त है । प्राकृत हानि से उद्वेलित न हो,
वरन् भगवान् के चरणकमलों में मन को निवेशित किए रहे ।
भक्त को शोक और मोह के वशीभूत नहीं होना चाहिए । 'पद्म-
पुराण' में कहा है, "जिसका चित्त शोक अथवा क्रोध से आक्रान्त है, उसमें
श्रीकृष्ण के स्फुरण की सम्भावना कैसे हो सकती है ?"
देवता
भक्त देवताओं का अपमान न करे । देवभक्त न होने का यह अर्थ
नहीं कि उनका सम्मान ही न किया जाय । वैष्णव शिव अथवा ब्रह्मा का
भक्त नहीं होता, परन्तु ऐसे सभी उच्च देवों को प्रणाम करना उसका
कर्तव्य है । वैष्णवदर्शन के अनुसार चींटि तक को प्रणाम करना चाहिए,
फिर शिव-ब्रह्मा जैसे महापुरुषों के सम्बन्ध में तो क्या कहना है ।
पद्मपुराण का वाक्य है, "सब देवताओं के ईश्वर के भी ईश्वर
भगवान् श्रीकृष्ण की ही सदा आराधना करनी चाहिए; फिर भी ब्रह्मा,
शिव आदि की अवज्ञा कभी न करे ।"
किसी जीव को न सताना
महाभारत का वाक्य है, "कृपामय पिता जैसे पुत्र को नहीं सताता
है, इस प्रकार जो किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता है, उस शुद्ध अन्तः-
करण पुरुष पर भगवान् बहुत शीघ्र प्रसन्न होते हैं।"
आज के तथाकथित सभ्य समाज में पशुपीड़न का विरोध होता है;
परन्तु साथ में नियमित वधशालायें भी चलती रहती हैं । वैष्णव को यह
अच्छा नहीं लगता । वैष्णव पशुवध का समर्थन नहीं कर सकता और न
कभी किसी प्राणी को सता सकता है ।