भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
पृष्ठ 85, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ ] भक्तिरसामृतसिन्धु
प्राप्ति होगी, जबकि भगवद्भक्त वैकुण्ठ-जगत् में प्रविष्ट हो जायेंगे।
देवोपासकों की तो गीता में वस्तुतः निन्दा ही है। उल्लेख है कि कामनाओं
ने उनकी बुद्धि हर ली है, इसीलिए वे नाना देवताओं के आराधन में
प्रवृत्त होते हैं। ‘विष्णुरहस्य’ में यह कहकर इन देवोपासकों की घोर
भर्त्सना है कि भयंकर जन्तुओं के साथ रहना अच्छा है, पर इनके साथ कभी
न रहे।
अयोग्य शिष्य न बनाना, बड़े मन्दिरों का निर्माण न करना तथा
बहुत ग्रन्थ न पढ़ना
एक अन्य नियम यह है कि अधिक शिष्य तो बनाए जा सकते हैं,
परन्तु ऐसा कोई व्यवहार न करे जिससे किसी कार्य अथवा कृपादृष्टि के
लिए किसी शिष्य के आधीन होना पड़े। नए मन्दिरों के निर्माण के
लिए अधिक उद्यम नहीं करना चाहिए और न भक्तिवर्धक ग्रन्थों के
अतिरिक्त अन्य पुस्तकों का अभ्यास ही करना चाहिए। वस्तुतः श्रीमद्-
भगवद्गीता यथारूप, श्रीमद्भागवत, 'चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत' तथा
इस भक्तिरसामृतसिन्धु का गम्भीर अध्ययन करने से कृष्णभावना की
विद्या का पर्याप्त ज्ञान हो सकता है। अन्य ग्रन्थों के पठन के आयास की
आवश्यकता नहीं रहती।
श्रीमद्भागवत (७.१३.३) में नारद मुनि ने महाराज युधिष्ठिर से
नाना वर्ण-आश्रमों के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए विशेषतः संन्यास के
नियमों का उल्लेख किया है। संन्यासी को अयोग्य व्यक्ति को शिष्य नहीं
बनाना चाहिए। उसे पहले यह देखना चाहिए कि शिष्य बनने का अभिलाषी
कृष्णभावना का यथार्थ जिज्ञासु भी है या नहीं, यदि नहीं, तो उसे स्वीकार
नहीं करना चाहिए। परन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभु की अहैतुकी करुणा इतनी
अगाध है कि उन्होंने सब सद्गुरुओं को सभी देशकाल में कृष्णभावना का
प्रचार करने की आज्ञा दी है। अतः श्रीचैतन्य महाप्रभु की परम्परा में
संन्यासी भी कृष्णभावना पर सर्वत्र उपदेश कर सकते हैं और यदि कोई
यथार्थ में शिष्य बनना चाहे तो उसे स्वीकार किया जा सकता है।
इसका कारण है—शिष्यों की संख्या बढ़ाए बिना कृष्णभावनामृत
का व्यापक प्रसार नहीं हो सकता। अतः कभी-कभी संकट उठाकर भी
भगवान् चैतन्य महाप्रभु की परम्परा का संन्यासी पूर्ण योग्य न होने पर भी
किसी व्यक्ति को शिष्य बना सकता है। बाद में सद्गुरु की कृपा से शिष्य
शनैः-शनैः उन्नति कर लेता है। परन्तु यदि कोई केवल मिथ्या सम्मान