भक्तिरसामृतसिन्धु (श्रील रूप गोस्वामी - भक्ति रस शास्त्र सटीक)
Bhakti-Rasamrita-Sindhu with Hindi Commentary
श्रील रूप गोस्वामी / भक्तिवेदान्त व्याख्या द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभक्ति के अंगों के प्रमाण [ ५७
को कम से कम करके अपने समय को भगवत्स्मरण जैसे सेवा कार्य में
लगाया जा सके । व्रतवासरों पर गोविन्द की लीला का स्मरण और उनके
पावन नाम का निरन्तर श्रवण करना सर्वोत्तम है ।
अश्वत्थ आदि वृक्षों का सम्मान
'स्कन्दपुराण' में निर्देश है कि भक्त को तुलसी और आमलक का
जल से अभिसिंचन करना चाहिए । गौब्राह्मणों का सम्मान करके तथा
पूजन, प्रणति और ध्यान के द्वारा वैष्णवसेवन करे । ये सब कर्म भक्त के
पूर्व पापफलों के निवारण करने में सहायक हैं ।
श्रीकृष्णविमुखों के संग का त्याग
श्रीचैतन्य महाप्रभु से एक बार उनके एक गृहस्थ भक्त ने पूछा था
कि वैष्णव का सामान्य आचरण कैसा होना चाहिए । श्रीचैतन्य महाप्रभु
ने उत्तर दिया कि वैष्णव को अभक्तों के संग से सदा दूर रहना चाहिए ।
फिर उन्होंने समझाया कि अभक्त दो प्रकार के होते हैं, एक वे जो भगवान्
श्रीकृष्ण के विरोधी हों और दूसरे घोर विषयी । भाव यह है कि इन्द्रिय-
तृप्ति के अभिलाषी और भगवान् श्रीकृष्ण के विरोधी अवैष्णव हैं, उनका
संग कभी नहीं करना चाहिए ।
'कात्यायनसंहिता' में कहा है कि अग्नि की ज्वालाओं के मध्य में
स्थित लोहे के पिंजड़े के भीतर रहना अच्छा है, पर श्रीकृष्णविमुखों का
संग कभी न करे । इसी प्रकार 'विष्णुरहस्य' में कथन है कि विषयवासना से
प्रेरित होकर नाना देवों की उपासना करने वालों का सहवास करने की
अपेक्षा साँप, बाघ अथवा मगर का आलिंगन अच्छा है ।
शास्त्रों में भिन्न-भिन्न प्राकृत अभिलाषाओं के लिए नाना देवताओं
की उपासना का विधान है । उदाहरणार्थ रोगनिवृत्ति के लिए सूर्य की
उपासना कही गयी है; सुन्दर स्त्री के लिए पार्वती की और विद्या के लिए
सरस्वती की आराधना करनी चाहिए । इस प्रकार श्रीमद्भागवत में
नाना प्राकृत कामनाओं के लिए भिन्न-भिन्न देवों की उपासना का उल्लेख
है । ये उपासक चाहे देवों के अच्छे भक्त प्रतीत होते हैं, परन्तु इन्हें अभक्त
ही समझा जाता है । ये भक्त नहीं हैं ।
मायावादी कहते हैं कि किसी भी रूप की उपासना की जा सकती है
क्योंकि अन्त में एक ही लक्ष्य की, भगवान् की प्राप्ति हो जाती है । किन्तु
भगवद्गीता में स्पष्ट कहा है कि देवोपासकों को अन्त में देवलोकों की