भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 472, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंदेना। लेकिन अगर हम सभी मनुष्यों को अपराधी मान भी लें तो ईश्वर द्वारा उन्हें
दी जाने वाली सज़ा कैसी है? आप कहते हैं कि वह उन्हें गाय, बिल्ली, वृक्ष,
जड़ी-बूटी या जानवर बनाकर दुनिया में भेजता है। आप इन सज़ाओं की संख्या 84
लाख बताते हैं। मैं पूछता हूँ, इसका मनुष्य पर कौन-सा सुधारात्मक प्रभाव पड़ता
है? आप को ऐसे कितने लोग मिले जो कहते हों कि पाप करने के कारण पिछले
जन्म में वे गधा बने थे? एक भी नहीं। अपने पुराणों के उद्धरण रहने दीजिये। आप
की पौराणिक कहानियों में उलझने की फुरसत मेरे पास नहीं है। आप तो यह
बताइये, क्या आप जानते हैं कि इस दुनिया में सबसे बड़ा पाप ग़रीब होना है,
लेकिन आप के अनुसार यह लोगों को ईश्वर द्वारा दी गयी सज़ा है। मैं पूछता हूँ,
आप उस अपराधविज्ञानी को, उस विधिवेत्ता या विधायक को कैसे उचित ठहरायेंगे
जो आदमी को अनिवार्यतः और ज़्यादा अपराध करने के लिए मजबूर करने वाली
सज़ाएँ तजवीज़ करे? क्या आपके ईश्वर ने इस चीज़ पर गौर नहीं किया? या उसे
भी ऐसी बातें अनुभव से सीखनी पड़ती हैं? लेकिन मानवता को अकथनीय दुख
झेलकर इसके लिए कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है!
किसी ग़रीब और अनपढ़ चमार या भंगी के घर पैदा होने वाले आदमी की
नियति आप के ख़याल से क्या होगी? वह ग़रीब है इसलिए पढ़-लिख नहीं सकता।
तथाकथित ऊँची जाति में पैदा होने के कारण स्वयं को श्रेष्ठ मानने वाले उसके
संगी-साथी उससे नफ़रत करते हैं और अछूत मानकर अलग-थलग रखते हैं।
उसका अज्ञान, उसकी ग़रीबी और उसके साथ किया जाने वाला बरताव समाज के
प्रति उसके हृदय को कठोर बना देगा। मान लीजिये, वह कोई पाप करता है, तो
उसकी सज़ा कौन भुगतेगा? ईश्वर? वह स्वयं, या समाज के ज्ञानवान लोग? घमण्डी
और स्वार्थी ब्राह्मणों द्वारा जान-बूझकर अज्ञानी बनाकर रखे गये उन लोगों की सज़ा
के बारे में आप क्या कहते हैं जिन्हें आप के पवित्र ज्ञान-ग्रन्थों, यानी वेदों की कुछ
पंक्तियाँ सुन लेने का दण्ड अपने कानों में पिघले हुए गरम सीसे की धार झेलकर
भरना पड़ता था? अगर उनका कोई अपराध था भी तो उसके लिए ज़िम्मेदार कौन
था और उसका नतीजा किसको भुगतना चाहिए था?
मेरे प्यारे दोस्तो, ये सिद्धान्त विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के मनगढ़न्त सिद्धान्त
हैं। वे इन सिद्धान्तों के जरिये ज़बरदस्ती हथियाई हुई अपनी शक्ति, सम्पन्नता और
श्रेष्ठता को उचित ठहराते हैं। याद आया, शायद अप्टन सिंक्लेयर ने कहीं लिखा
है कि आदमी को अमरता में विश्वास करने वाला बना दो और उसके पास
धन-सम्पत्ति आदि जो कुछ भी है, सब लूट लो। वह उफ़ नहीं करेगा, यहाँ तक
कि अपने को लूटने में खुद आप की मदद करेगा। धार्मिक उपदेशकों और
सत्ताधारियों की मिलीभगत से ही जेलों, फाँसियों, कोड़ों और इन सिद्धान्तों का
निर्माण हुआ है।
466 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़