भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंमें कोई अनुकूलता नहीं है। केवल भारत में ही देखें तो बौद्ध और जैन धर्म
कहीं-कहीं ब्राह्मणवाद से बिल्कुल अलग हैं, जो स्वयं आर्यसमाज और सनातन धर्म
जैसे परस्पर विरोधी विश्वासों में बँटा हुआ है। इन सबसे अलग प्राचीन काल में
चार्वाक दर्शन में एक अपने ही ढंग का स्वतन्त्र विचार मिलता है। चार्वाक ने बहुत
पहले ही ईश्वर की प्रभुसत्ता को चुनौती दे दी थी। जीवन और जगत-सम्बन्धी
आधारभूत प्रश्न पर इन सभी मतों में भिन्नता है और हर कोई अपनेआप को ही सही
मानता है। यही है सारी बुराई की जड़।
प्राचीन काल के विद्वानों और चिन्तकों के प्रयोगों तथा उद्गारों को आधार
बनाकर अज्ञान के विरुद्ध आगे की लड़ाई लड़ने और इस रहस्यमयी समस्या का
समाधान खोजने के बजाय हम निकम्मे लोग – हमने सिद्ध कर दिया है कि हम
निकम्मे हैं – विश्वास की, अपने-अपने मतों में अटल और अडिग विश्वास की,
चीख़-पुकार मचाते रहते हैं। इस प्रकार हम मानवीय प्रगति को अवरुद्ध कर देने
के दोषी हैं।
प्रगति के समर्थक प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह अनिवार्य है कि वह पुराने
विश्वास से सम्बन्धित हर बात की आलोचना करे, उसमें अविश्वास करे और उसे
चुनौती दे। प्रचलित विश्वास की एक-एक बात के हर कोने-अन्तरे की विवेकपूर्ण
जाँच-पड़ताल उसे करनी होगी। यदि कोई विवेकपूर्ण ढंग से पर्याप्त सोच-विचार
के बाद किसी सिद्धान्त या दर्शन में विश्वास करता है तो उसके विश्वास का
स्वागत है। उसकी तर्क-पद्धति भ्रान्तिपूर्ण, ग़लत, पथ-भ्रष्ट और कदाचित
हेत्वाभासी हो सकती है, लेकिन ऐसा आदमी सुधरकर सही रास्ते पर आ सकता
है, क्योंकि विवेक का ध्रुवतारा सही रास्ता बनाता हुआ उसके जीवन में चमकता
रहता है। मगर कोरा विश्वास और अन्धविश्वास ख़तरनाक होता है। क्योंकि वह
दिमाग़ को कुन्द करता है और आदमी को प्रतिक्रियावादी बना देता है।
यथार्थवादी होने का दावा करने वाले को तो समूचे पुरातन विश्वास को
चुनौती देनी होगी। यदि विश्वास विवेक की आँच बरदाश्त नहीं कर सकता तो
ध्वस्त हो जायेगा। तब यथार्थवादी आदमी को सबसे पहले उस विश्वास के ढाँचे
को पूरी तरह गिराकर उस जगह एक नया दर्शन खड़ा करने के लिए ज़मीन साफ़
करनी होगी।
यह तो हुआ नकारात्मक पक्ष। इसके बाद शुरू होता है सकारात्मक कार्य,
जिसमें कई बार पुराने विश्वास की कुछ सामग्री पुनर्निर्माण के लिए इस्तेमाल की
जा सकती है। जहाँ तक मेरी बात है, पहले ही कह दूँ कि मैं इस विषय का ज़्यादा
अध्ययन नहीं कर पाया हूँ। मेरी बड़ी इच्छा थी कि प्राच्य दर्शन का अध्ययन करूँ,
लेकिन वैसा कोई संयोग या अवसर मुझे नहीं मिला, मगर जहाँ तक नकारात्मक
पक्ष का सम्बन्ध है, मैं पुराने विश्वास के सही होने की बात पर प्रश्नचिह्न लगाने
विचारों की सान पर क्रान्ति की तलवार / 463