भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 23, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंउनके साथियों के चुने हुए तेरह दस्तावेज़ों और उनके पत्रों-परचों के कुछ उद्धरणों
का एक संकलन 1998 में परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित हुआ, जिसके अब तक
पाँच संस्करण आ चुके हैं। ऐसे प्रकाशनों का सिलसिला नयी शताब्दी में भी जारी
रहा। हाल के वर्षों में दो ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। पहली, कुलदीप
नैयर की पुस्तक, 'Martyr Bhagat Singh : Experiments in Revolution, और
दूसरी ए.जी. नूरानी की पुस्तक, 'The Trial of Bhagat Singh। सन्दर्भ-स्रोतों और
व्याख्या की दृष्टि से कुलदीप नैयर की पुस्तक में तो कोई नयी बात नहीं है, लेकिन
सरकारी दस्तावेज़ों की विस्तृत एवं गहन पड़ताल ए.जी. नूरानी की पुस्तक की
विशिष्टता है। साथ ही, अपनी वस्तुपरकता के कारण भी यह पुस्तक विशेष रूप
से महत्त्वपूर्ण है।
भगतसिंह और उनके साथियों की राजनीतिक गतिविधियों के अतिरिक्त
उनके वैचारिक पक्ष के बारे में विगत पच्चीस वर्षों के दौरान इतना सबकुछ
प्रकाशित होने के बावजूद, अब भी भगतसिंह पर हमारा इतना ज़ोर क्यों? –
इतिहास के उन प्रतिष्ठित विद्वान महोदय के उसी प्रश्न पर हम वापस लौटते हैं,
जहाँ से हमने अपनी बात की शुरुआत की थी। हमारी यह स्पष्ट और दृढ़ सोच
है कि हिन्दी, अंग्रेज़ी, पंजाबी और अन्य सभी भारतीय भाषाओं को मिलाकर,
तमाम पुस्तकों और लेखों के बावजूद, अभी भारत के तमाम शिक्षित नागरिकों में
से कुछ लाख भी ऐसे लोग शायद मुश्किल से ही मिलेंगे, जो फाँसी के तख़्ते पर
सहर्ष चढ़ने वाले वीर युवा क्रान्तिकारी की छवि से अलग, उस मेधावी युवा के
युग-प्रवर्तक और प्रतिभाशाली चिन्तन से परिचित हों। हमारे देश में इतिहास के
शोध-ग्रन्थ और शोध-पत्र विश्वविद्यालयों-शोध संस्थानों के पुस्तकालयों में बन्द
रहने और उन विद्वानों के अध्ययन के लिए होते हैं, जिनका कोई सामाजिक
सरोकार नहीं होता और जो सिर्फ़ अपने कैरियर और प्रतिष्ठा को समर्पित होते हैं।
ऐसे विषयों पर आम पाठकों के लिए लिखी गयी पुस्तकों, जीवनियों, संस्मरणों
और लेखों की भी पहुँच वास्तव में बहुत सीमित लोगों तक ही होती है। इसके
कई कारण हैं। ज़्यादातर प्रकाशकों का एकमात्र या सर्वोपरि लक्ष्य पुस्तकालय
आपूर्ति करके पैसे कमाना होता है। न तो उनके प्रकाशनों की क़ीमत पाठकों की
जेब के अनुकूल होती है, न ही उनके पास आमजनों तक ऐसी सामग्री पहुँचाने
लायक विक्रय-वितरण का नेटवर्क ही होता है। पूँजीवादी प्रकाशकों के अतिरिक्त
पूँजीवादी पत्र-पत्रिकाओं का भी आज जो स्वरूप है, उसे देखते हुए यह सम्भव
नहीं कि उनके माध्यम से भगतसिंह के विचारों की वास्तविक अन्तर्वस्तु
जन-समुदाय तक पहुँच सके। सच तो यह है कि पूँजी-केन्द्रित प्रकाशन-तन्त्र या
व्यक्तिगत उपक्रम के द्वारा यह सम्भव ही नहीं है। क्रान्तिकारी विचारों की
ऐतिहासिक विरासत और नये-नये आयामों को व्यापक जनगण के अलग-अलग
भगतसिंह की वैचारिक विरासत और हमारा समय / 17