भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 209, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंलम्बी हो रही है। इसलिए इसे यहीं समाप्त करते हुए इतना ही कहेंगे कि हमेशा से
स्वार्थियों ने, पूँजीपतियों ने धर्म को अपनी-अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए इस्तेमाल
किया है। इतिहास इसका साक्षी है। 'धैर्य धारण करो! अपने कर्मों को देखो!' ऐसे
दर्शन ने जो यातनाएँ दी हैं, वे सबको मालूम ही हैं।
लोग कहते हैं कि ईश्वर के अस्तित्व को अगर नकारा जाये तो क्या होगा?
दुनिया में पाप बढ़ जायेगा। अन्धेरगर्दी मच जायेगी। लेकिन अराजकतावादी कहते
हैं कि उस समय मनुष्य इतना अधिक ऊँचा हो जायेगा कि स्वर्ग का लालच और
नरक का भय बताये बिना ही वह बुरे कार्यों से दूर हो जायेगा और नेक काम
करने लगेगा। वास्तव में बात यह है कि हिन्दुस्तान में श्रीकृष्ण निष्काम कर्म करने
का बहुत उपदेश दे गये हैं। गीता दुनिया की एक प्रमुख पुस्तक मानी जाती है,
लेकिन श्रीकृष्ण निष्काम भाव के साथ कर्म की प्रेरणा देते हुए भी अर्जुन को
मृत्योपरान्त स्वर्ग और विजय प्राप्त कर राजभोग का लालच देने से पीछे न रहे।
लेकिन आज हम अराजकतावादियों के बलिदान देखते हैं तो मन में आता है कि
उनके पैर चूम लें। साको और वेंजरी की कहानियाँ हमारे पाठक पढ़ ही चुके
हैं। न ईश्वर को प्रसन्न करने का कोई लालच है और न स्वर्ग में जाकर मौज़
मारने का लोभ, न पुनर्जन्म में ही सुख मिलने की आशा। लेकिन फिर भी
हँसते-हँसते लोगों के लिए, सत्य के लिए जीवन न्योछावर कर देना क्या कोई
मामूली बात है! अराजकतावादी तो कहते हैं कि एक बार मनुष्य स्वतन्त्र हुआ
तो उसका जीवन बहुत ऊँचा हो जायेगा। खैर, एक-एक प्रश्न पर लम्बी बहसें
हो सकती हैं, लेकिन यहाँ स्थानाभाव है।
अन्तरराष्ट्रीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का अध्ययन / 203