बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाशी केन्द्र की कहानी / 89
इसी से हमने इस कार्य की ओर विशेष रूप से ध्यान नहीं दिया था। हम लोगों
का विचार था कि पहले देश के शिक्षित युवकों को सम्मिलित करके एक विराट्
देशव्यापी संघ का संगठन कर लिया जाय और फिर उसके बाद यदि देशी फौजों
को अपने भाव की दीक्षा दी जा सके तभी विप्लव की नींव पक्की होगी परन्तु
इस तैयारी के साथ-साथ हम लोगों ने विदेशियों से कुछ भी सम्पर्क नहीं रक्खा
और गदर के उद्योग में यही बड़ी भारी भूल थी। कई मर्तबा यह विचार भी
हुआ था कि इस तैयारी के साथ-साथ अधिक परिमाण में अस्त्र-शस्त्रों के मँगाने
का भी बन्दोबस्त होना चाहिए; किन्तु नेता लोग इस ओर से उदासीन थे। वे
कहते थे कि वह समय अभी दूर है। किन्तु जब समय आया तब फिर न इसका
बन्दोबस्त करने को समय रहा और न कोई ज़रिया ही मिला। सारे देश में तो
नहीं, किन्तु बंगाल और पंजाब में युवकों का जो संघ बनाया गया था उसकी
व्यापकता कुछ कम न थी किन्तु इस संघ का विकास और परिणति बंगाल में
जैसी हुई थी वैसी और कही भी नही हुई। व्यक्ति के भीतरी गठन और कुछ
समय-व्यापी साहचर्य के फल से यह संघशक्ति जैसी प्रस्फुटित होती है वैसी और
किसी तरह नहीं होती। यही कारण है कि सच्ची संघशक्ति बगाल में ही गठित
हुई थी, क्योकि पंजाब में जो विप्लव की तैयारी हुई थी उसका तो सारा ही
बन्दोबस्त खासकर उन सिक्खों ने ही किया था जो कि अमेरिका-प्रभृति देशों से
लौटकर भारत मे आए थे। इन विदेश से आये हुए सिक्खों के साथ देश का वैसा
घना हेल-मेल न था, और फिर इस दल का संगठन भी भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के
कुछ काल-व्यापी साहचर्य से नही हुआ था। देशवासी लोगभी उनकी ओर से कुछ
लापरवाह थे, किन्तु बंगाल की जनता बगाल के दल से इतनी उदासीन नही थी।
इसके सिवा यह बात भी है कि जिन व्यक्तियों के सहयोग से सघ संगठित होता है
उनके मन और प्राणों मे आदर्श की प्रेरणा जितनी गम्भीर होगी और उस आदर्श
का ठाठ जितना ऊँचा बाँधा जायगा उसी परिमाण में सघ भी शक्तिशाली होगा।
इस दृष्टि से बंगाल के बाहर का कोई भी संघ बंगाल की सघशक्ति के समान शक्ति-
शाली न था, — बंगाल मे भिन्न-भिन्न आदर्शों के घात-प्रतिघात की क्रीड़ा जैसे
अभिनव रूप में देख पड़ी, वैसी बगाल के बाहर देखने मे नही आई। हमारी इस
विप्लव की तैयारी के साथ भारत के जातीय जागरण का भिन्न-भिन्न ओर से क्या
सम्बन्ध था, और विप्लववादियों के व्यक्तिगत जीवन में वह किस प्रकार प्रति-
फलित हुआ था, इसकी चर्चा वहाँ होगी जहाँ बंगाल का वर्णन किया जायगा।
इसका प्रधान कारण यह है कि उस आदर्श के द्वन्द्व का जैसा अनुभव मुझे बंगाल
मे हुआ है वैसा अन्यत्र नहीं हुआ, और यहाँ तो मै मुख्य रूप से बंगाल के बाहरी
प्रदेश के आन्दोलन का वर्णन कर रहा हूँ। बगाल के बाहर तो हम लोग प्रधान-
तया विप्लव की तैयारी की मामूली बातों में ही लगे हुए थे किन्तु बगाल मे मानो
भारत के वास्तविक जातीय जागरण के लिए — क्या धर्म, क्या कर्म, क्या साहित्य
और क्या सामाजिक आचार-विचार — सभी कामों में हम लोग लगे हुए थे।