बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुछ पूरक तथ्य / 373
जयचन्द बाबा के दाहिने हाथ बने बैठे थे। देखते ही लिपट गए। लेकिन मेरे
साथ दिल्ली चलने में असमर्थता प्रकट करते हुए बोले, "यहाँ एक अच्छा दल
तैयार कर लिया है। अभी कल परसों एक सफल डाका डाला है। हाथ में लिया
हुआ काम छोड़कर जाना ठीक नहीं। हाँ, चाहो तो पाँच-दस हजार रुपया ले
जाओ। डाके का माल भी है और बाबा का भंडार भी भरपूर है।" धन लाने की
मुझे आज्ञा न थी। मैं खाली हाथ वापस आ गया। शचीन्द्र और प्रतापजी को
निराशा हुई। जो काम जयचन्द्र के सिपुर्द होनेवाला था वह प्रतापजी को सौंपा
गया। मगर संयोगवश कैडक साहब उस तारीख को बीमार हो जाने से बाहर
नहीं निकले और बच गए। मैं उसी रात को जयपुर लौट आया।"
श्री प्रतापसिंह
बनारस षड्यन्त्र के सिलसिले में प्रतापसिंहजी के फरार होने और फिर उनकी
गिरफ्तारी पर प्रकाश डालते हुए श्री चौधरी ने लिखा है, "....प्रतापजी पर
बनारस षड्यन्त्र के सिलसिले में वारंट निकल गए और वे भागकर हैदराबाद
(सिन्ध) में जा छिपे। खुफिया पुलिस तलाश करती हुई जयपुर पहुँची और एक
ओसवाल गृहस्थ के पीछे पड़ी। कमजोरी में आकर उन्होंने हैदराबाद तो बता
दिया मगर फिर सँभलकर सिंध के बजाय निजाम की राजधानी का पता दे दिया।
डिप्टी सुपरिटेंडेंट आगे यह सुराग पाकर दक्षिण की ओर रवाना हुए। इधर
हमारी मंडली को प्रतापजी को बचाने की फिक्र हुई। इस बार भी मुझको चुना
गया। मारवाड़ी पोशाक में चल पड़ा। मुझे हिदायत थी कि मारवाड़ के
मनिमालिया स्टेशन पर उतरकर बारणों के गांव पाबेटिया में पहले तलाश कर
लूँ। शायद प्रतापजी वहीं हों। हमारे देहाती समाज में अनजान लोगों से खूब
पूछताछ होती है। इससे मेरे काम में बाधा पड़ रही थी। आखिर एक किस्सा
गढ़ लिया और जो कोई पूछता उसी को सुनाकर पिण्ड छुड़ाता। गाँव के निकट
पहुँचते-पहुँचते मालूम हो गया कि जिस घर मे प्रतापजी ठहरा करते थे, उसे
पुलिस ने घेर रक्खा है। मैं समझ गया कि पंछी अभी पकड़ में नहीं आया है, मैं
व्यर्थ में क्यों फँसूँ। मैंने सिन्ध की राह ली। हैदराबाद में पहुंचकर दिन-भर की
खोज के बाद प्रतापजी से भेंट हुई। उन्होंने एक खानगी दवाखाने में कम्पाउण्डर
की जगह काम शुरू कर दिया था और फुरसत के समय वाचनालयों में जानेवाले
नौजवानों में क्रान्तिकारी प्रचार करने लग गए थे। दूसरे ही दिन हम दोनों
बीकानेर के लिए चल पड़े। सोचा यह था कि मैं तो राजधानी में कोई नौकरी
कर लूँगा, प्रतापजी कहीं देहात में जा बसेंगे और दोनों मिलकर विप्लववादी दल
खड़ा करेंगे...लेकिन एक गलती ने इस योजना पर पानी फेर दिया। जोधपुर
स्टेशन पास आया तो प्रतापजी की इच्छा आशानाड़ा स्टेशन पर उतरकर
वहाँ के स्टेशन मास्टर से मिल लेने की हुई। वह दल का सदस्य था। मगर कुछ
दिन पहले उसके यहाँ बम का पार्सल पकड़ा जा चुका था और अपनी खाल बचाने