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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 373, कुल 408 में से

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पृष्ठ 373

कुछ पूरक तथ्य / 371
शहीद मोतीचन्द और जयचन्द
श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' के द्वितीय भाग के छठे परिच्छेद में निमेज
के महन्त की हत्या के अपराध में फांसी पानेवाले दो युवकों—श्री मोतीचन्द
और माणिकचन्द या जयचन्द के फांसीघर से लिखे जाने वाले एक पत्र का
उल्लेख किया है। यह श्री मोतीचन्द और जयचन्द भी इसी राजस्थानी क्रान्ति-
कारी मंडली के थे। इनमें श्री जयचन्द के नाम का उल्लेख शचीन्द्र बाबू स्मृति-
भ्रम से कर गए हैं, क्योंकि श्री जयचन्द निमेज के महन्त हत्याकांड के अभियुक्त
अवश्य थे किन्तु वे अन्त तक पुलिस के हाथ नही आ सके। इस फरार अवस्था में
जयचन्दजी बहुत दिनों तक हरिद्वार में बाबा काली कमलीवाले की संस्था के
मुख्य पद पर रहे और उधर ही क्रान्तिकारी दल का संगठन भी करते रहे।
राजस्थान के वर्तमान सर्वोदयी नेता श्री रामनारायण चौधरी भी उस समय
इसी मंडली में थे। श्री मोतीचन्द और जयचन्दजी का परिचय देते हुए उन्होंने
अपनी पुस्तक 'वर्तमान राजस्थान' में लिखा है—
“... उन्होंने (श्री अर्जुनलाल सेठी ने) महाराष्ट्र और कश्मीर जैसे दूर-दूर
के प्रान्तों से चुन-चुनकर नौजवान इकट्ठे किये थे। ये कंचे जीवट के लोग थे,
इसके दो दृष्टान्त मुझे याद हैं। श्री मोतीचन्द उस युवक दल के अगुआ थे। एक
बार उनका ऑपरेशन हुआ। डा० उलजंगसिंह की राय मे वह इतना गम्भीर
था कि क्लोरोफार्म सुंघाये बिना चीरा लगाने की उनकी हिम्मत न हुई। मोती-
चन्द का आग्रह था कि होश में ही चीरफाड की जाय। आखिर वैसा ही हुआ और
मोतीचन्द ने उफ तक न की। डाक्टर दांतों तले उंगली दबाकर रह गया। आरा
के महन्त की हत्या के अपराध में जब उन्हें फांसी लगी तो कहते हैं, बलिदान की
खुशी मे उनका वजन कई पोड बढ़ गया था।
“लेकिन असली अपराधी तो थे जयचन्द, जो अन्त तक पुलिस के हाथ न
आए। उनके साथ मेरा गहरा सम्बन्ध हो गया था। उनका किस्सा विचित्र था।
वे काश्मीर राज्य के पूंछ ठिकाने में किसी छुटभैया के लड़के थे। एक दूसरे युवक
के साथ अनन्य मित्रता हो गई। प्लेग आया तो दोनों में कौल-करार हुआ कि जो
बच रहे वह घर से निकल पड़े और उम्रभर अपने साथी के लिए तपस्या करे।
जयचन्द बच गए। सीधे हरद्वार जाकर जाड़े में गंगाजी में और गर्मी में बालू रेत
में तपस्या करने लगे। गाने का शौक था। एक दिन सेठीजी का वहाँ भाषण था।
उसमें संगीत का भी कार्यक्रम था। जयचन्द कोने में बैठे सुन रहे थे। सेठीजी की
पारखी दृष्टि ने उन्हें पहचान लिया कि काम का आदमी है। साथ ले आए। वह
निर्भय इतने थे कि कई बार वारण्टधारी पुलिस के बीच से निकल गए। चलने
में इतने तेज कि एक बार घुड़सवार पुलिस का पीछा बचाते हुए सत्तर मील तय
करके शाम को मेरे पास पहुँच गए। दो मंज़िल से कूदकर भाग जाने का उन्हें
इतना पक्का विश्वास था कि हमारे प्रबल आग्रह पर भी वे धीरे बोलने या दूसरी