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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 372, कुल 408 में से

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पृष्ठ 372

370 / बन्दी जीवन
कर आ सके। श्री शशांक ऐसे कर्मठ, साहसी, प्रत्युत्पन्न बुद्धि और मेधावी थे।
राजस्थान का क्रान्तिकारी दल
श्री रासबिहारी बोस से परिचय होने के पश्चात् श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल
को राजस्थान के क्रान्तिकारी संगठन का भी सहयोग मिलने लगा, जो बंगाल के
क्रान्तिकारियों के सम्पर्क में बहुत पहले से था। श्री शचीन्द्र ने 'बन्दी जीवन' में
राजस्थान के सम्बन्ध में बहुत कम लिखा है, यद्यपि वे बहुत-कुछ लिख सकते थे।
वास्तविकता तो यह है कि सन् 1914-15 में श्री रासबिहारी के साथ श्री शचीन्द्र
जिस विराट् विप्लव यज्ञ का आयोजन कर रहे थे, उसमें राजस्थान के क्रान्तिकारी
भी महत्त्वपूर्ण भाग लेने वाले थे। राजस्थान का यह क्रान्तिकारी संगठन बहुत
पुराना था और भारतीय विप्लववाद के आदि प्रवर्त्तक श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा
ने इसकी नींव डाली थी। कुछ विद्वान इतिहासज्ञों का यह भी मत है कि महर्षि
दयानन्द सरस्वती और स्वामी विवेकानन्दजी ने राजस्थान के अनेक राजाओं के
मन में स्वतन्त्रता-प्राप्ति के लिए सशस्त्र प्रयास करने की भावना उत्पन्न कर दी
थी। श्री श्यामजी कृष्ण वर्मा महर्षि दयानन्द के शिष्य थे। वे भारत की अनेक
रियासतों के दीवान रहे और फिर कुछ दिनों तक अजमेर म्युनिसिपैलिटी के अध्यक्ष
पद पर भी रहे। इसके पश्चात् हम अनेक क्रान्तिकारियों को अकस्मात् राजस्थान
की रियासतों के राजकीय पदों पर आसीन होते देखते हैं। दिल्ली षड्यन्त्र में
फाँसी पाने वाले श्री बालमुकुन्दजी जोधपुर के राजकुमारों के शिक्षक के पद पर
थे। लाला हरदयालजी के एक साथी बाबू ब्रजमोहनलाल जी स्कूल ऑफ आर्टस,
जयपुर के वाइस प्रिन्सिपल पद पर आसीन थे। खरना रियासत के राजा राव
गोपाल सिंह तो क्रान्तिकारी कार्यों में इतने सक्रिय थे कि सरकार को बहुत दिनों
तक उनको नज़रबन्द रखना पड़ा। प्रसिद्ध जैन विद्वान श्री अर्जुनलालजी सेठी
जयपुर में एक राष्ट्रीय विद्यालय चलाते थे और इस दल के नेता थे। श्री शचीन्द्र-
नाथ सान्याल ने 'बन्दी जीवन' के द्वितीय अध्याय में 'प्रताप की कहानी' शीर्षक
से जिन प्रताप सिंह की गौरव-गाथा लिखी है, वे और उनके पिता डा० केशरी-
सिंहजी बारहठ, जो एक समृद्ध जागीरदार थे, क्रान्तिकारी कार्यों में अपने को
सर्वथा होम चुके थे। ठाकुर केशरीसिंहजी के छोटे भाई श्री जोरावरसिंहजी
उनके अनेक रिश्तेदार भी विप्लव-पथ के पथिक बन चुके थे। ठाकुर केशरी
सिंहजी के परिवार वालों का तो दावा है कि लार्ड हार्डिग्ज पर बम वसन्त-
कुमार विश्वास ने नहीं, ठाकुर जोरावरसिंह ने फेंका था। इस केस में ठाकुर
जोरावरसिंह का वारण्ट निकला था, पर वे फरार हो गए और सन् 1938-39 में
जब कुछ प्रान्तों में कांग्रेस मिनिस्ट्री बन जाने के कारण उनका वारण्ट रद्द हो
जाने की सम्भावना होने लगी थी, फरार अवस्था में ही उनका देहान्त हो गया।