बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुछ पूरक तथ्य / 369
चुटिया थी और कोट पहने थे। देखने पर बंगाली नहीं लगते थे।'
" राजा बाजार में ही कई और क्रान्तिकारियों से शचीन्द्र का परिचय हुआ।
उनमें से शिरीष बाबू शचीन्द्र को चन्द्रनगर ले गए और वहीं रासबिहारी के साथ
उनका परिचय कराया गया। उन्होंने आगन्तुक की गतिविधि देखी। शचीन्द्र मानो
बारूद से भरे अनार थे। इसलिए हर समय चंचल रहते थे। शचीन्द्र की यह
चंचलता देखकर रासबिहारी ने उनका नाम लट्टू रक्खा। शचीन्द्र मे असाधारण
कर्मशक्ति, सरलता और साधुता थी। उनमें जैसे कर्मशक्ति हर समय उबाल के
बिन्दु पर बनी रहती थी। रासबिहारी शचीन्द्र की यह चंचलता देखकर बोले,
‘उस के ग्रुप के साथ मिलना खतरनाक तो नही रहेगा ? यह तो बड़ा अस्थिर
लगता है। मैं सेना मे काम कर रहा हूँ। पता नही क्या गोलमाल कर डाले।'
" प्रतुल गांगुली उन दिनो फरार थे, अब वे इस बात के लिए नियुक्त हुए कि
वे शचीन्द्र के साथ उत्तर प्रदेश का दौरा करेंगे और फिर उनकी रिपोर्ट पर तय
होगा कि रासबिहारी कहाँ तक उनसे सहयोग करें। प्रतुल बाबू ने दौरा करने के
बाद अच्छी रिपोर्ट दी, जिसके फलस्वरूप शचीन्द्र का दल रासबिहारी के साथ
काम करने लगा और शचीन्द्र रासबिहारी के दाहिने हाथ बन गए।... "
इस विवरण मे प्रमाणित होता है कि बंग-भंग आन्दोलन के समय बंगाल मे
विप्लववाद की जो लहर उठी थी, उसी से अनुप्राणित होकर श्री शचीन्द्र ने अपने
नगर बनारस मे पहले युवकों का एक संगठन स्थापित किया। इसके पश्चात् वे
किसी प्रकार अमृत (शशांक) हाजरा के पास कलकत्ता जा पहुँचे और फिर उनका
श्री रासबिहारी से सम्पर्क हो गया। इसके पश्चात् तो वे श्री शचीन्द्र रासबिहारी
के पूर्ण रूप से ही अनुगत हो गए। बनारस षड्यन्त्र के एक मुखबिर के बयान के
अनुसार 1914 के नवम्बर की एक रात को जब श्री शचीन्द्र और श्री रासबिहारी
एक बम की टोपी की जाँच कर रहे थे, अकस्मात् वह बम फट गया और रास-
बिहारी तथा शचीन्द्र दोनो ही घायल हो गए। इन दिनों वे प्रथम विश्वयुद्ध की
स्थिति से लाभ उठाकर देश की सेनाओ मे विद्रोह उभारने का कार्य कर रहे थे।
पग-पग पर संकट और मृत्यु के दर्शन इसी प्रकार उनको करने पडते थे।
श्री अमृत हाजरा ने बर्हा डकैतीकांड मे भाग लिया था। बर्हा एक ग्राम का
नाम है, जहाँ एक धनी व्यक्ति रहता था। क्रान्तिकारी कार्यों के लिए धन की
आवश्यकता होने पर क्रान्तिकारियों ने उसके यहाँ डकैती डाली और नाव द्वारा
भाग निकले। किन्तु ग्रामवासी और पुलिसवालो ने क्रान्तिकारियों का पीछा
किया। नदी के दोनों किनारो पर ग्रामीणो की भीड और नदी में नाव द्वारा पुलिस
क्रान्तिकारियों पर गोली चलाते हुए उनका पीछा करने लगी। एक-दो क्रान्ति-
कारी मारे गए। उस अवसर पर अमृत हाजरा अपने मृत-साथी की लाश को
सामने रखकर जोर-जोर से वन्देमातरम् का नारा लगाते रहे। इस नारे को सुन-
कर ही ग्राम वाले समझ सके कि यह लोग साधारण डकैत नही, बल्कि क्रान्ति-
कारी है। इस पर अधिकांश ग्रामीण वापस लौट गए और शेष क्रान्तिकारी बच-