बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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शशांकमोहन हाजरा
लार्ड हार्डिंग्ज पर जो बम फेंका गया था, वह उसी प्रकार का था, जिसके खोल
कलकत्ता के राजाबाजार मुहल्ले में श्री शशांकमोहन हाजरा के घर से बरामद हुए
थे । इन श्री शशांकमोहन की चर्चा से ही 'बन्दी जीवन' की कहानी शचीन्द्र बाबू ने
प्रारम्भ की है । शशांकमोहन का एक अन्य नाम अमृत हाजरा भी था । वह कल-
कत्ता के एक बरफ के कारखाने में काम करते थे । किसी राजनीतिक डकैती के
सिलसिले मे पुलिस ने उनके घर की तलाशी ली, तो उसे वहाँ बम बनाने के नुस्खे
और बम के खोल भी हाथ लग गए । श्री शशांकमोहन ने अदालत मे इस बात से
इन्कार किया कि वे बम बनाते थे । उन्होने अदालत मे अपनी सफाई देते हुए कहा
कि पुलिस जिस चीज़ को बम के खोल बता रही है, वह तो एक नई प्रकार की
गैस की लालटेन का हिस्सा है, जो मैं ईजाद करना चाहता हूँ । उन्होने उन खोलो
से अदालत मे ही एक गैस की लालटेन बनाकर दिखा भी दी । किन्तु दूसरे प्रमाणो
के आधार पर उनका क्रान्तिकारी होना सिद्ध हो गया और 15 साल के काले
पानी की सजा उन्हें मिली ।
ऐसा प्रतीत होता है कि श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल का बंगाल के क्रान्तिकारी
दल से सम्पर्क श्री हाजरा के द्वारा ही हुआ था । श्री मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी
पुस्तक 'भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन का इतिहास' मे लिखा है :
“1912 मे ढाका अनुशीलन समिति के फरार अमृत या शशांक हाजरा तथा
अन्यान्य लोगो के मन मे यह विचार आया कि अलग-अलग दल बनाकर कार्य
करने से कार्य-सिद्धि नही होगी । इसी कारण चन्द्रनगर दल तथा अनुशीलन दल
का मिलन हुआ ।
“1908 के लगभग काशी के श्री शचीन्द्रनाथ सान्याल ने एक क्रान्तिकारी दल
की स्थापना की । इसका रूप अभी पूरा क्रान्तिकारी नही हुआ था, बल्कि अभी
वह केवल लाठी, कुश्ती, जिमिनास्टिक आदि सीखने की एक संस्था मात्र थी ।
शचीन्द्रनाथ सान्याल ने इसका नाम 'अनुशीलन समिति' रक्खा, पर बगाल की
अनुशीलन समिति से इसका कोई सम्बन्ध नही था । बाद को जब बंगाल मे अनु-
शीलन समिति गैर क़ानूनी करार दी गई, तो शचीन्द्रनाथ सान्याल ने अपनी संस्था
का नाम 'यंगमैन्स एसोसिएशन' रखा ।
“शचीन्द्र अपने दल को पूरा क्रान्तिकारी रूप नही दे पा रहे थे, इसलिए
उन्होने बंगाल की यात्रा की । वे ढाका के माखनसेन से मिले, पर उनसे मिलकर
उनका मन संतुष्ट नही हुआ क्योंकि वे धर्म के आधार पर राजनीतिक कार्य की
बात कह रहे थे, शचीन्द्र को यह बात पसन्द नही आई । ये 1913 मे ही अनुशीलन
समिति के नेताओं से मिले और उनके राजा बाजार वाले अड्डे पर गए ।
“वहाँ शचीन्द्र जिस रूप मे गए, वह रविसेन के अनुसार इस प्रकार था—
'जब शचीन्द्र पहले-पहल राजा बाजार आए, तब मैने देखा कि सिर पर मोटी