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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 366, कुल 408 में से

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पृष्ठ 366

[364 / बन्दी जीवन]

उदास से होने लगे। एक दिन एकाएक भयभीत हुए धीरेन्द्र मेरे पास या खड़े
हुए। धीरेन्द्र ने बताया कि वह पांच सो रुपये जेब में लेकर एक्सचेंज के दफ्तर को
यहाँ के रुपयों को अमेरिका के डालरों में बदलवाने जा रहे थे कि ट्राम से उतर-
कर धीरेन्द्र ने देखा कि उनकी जेब कट गई है। निराशा, क्रोध एवं एक प्रकार की
अव्यक्त घृणा भीतर ही भीतर मुझे एकदम बेचैन करने लगी। मैं क्या कहूँ और
क्या न कहूँ। गाली दूँ अथवा मारपीट करने लगूं या उन्हें पकड़कर बलपूर्वक खूब
हिला डालूं । मैं विह्वल होकर बार-बार उनके आपाद मस्तक का असहाय के रूप
में निरीक्षण कर रहा था । खैर, ईश्वर की इच्छा से मैंने अपने को संभाल लिया ।
शान्त और दृढ़-चित्त होकर मैंने धीरेन्द्र से फिर कहा, “कोई परवाह नहीं है यदि
तुम अब भी जाने के लिए प्रस्तुत हो तो मैं फिर रुपयों का प्रबन्ध अभी कर डालूंगा।
जो गया है जाने दो। परन्तु इतना रुपया तुम्हें इस लापरवाही से क़मीज की
जेब में न ले जाना चाहिए था ।" मनोविज्ञान की आधुनिकतम शाखा मे ऐसा कहा
गया है कि मन के अन्तस्तल मे अचेतन मन में शंका एवं द्विधा रहने के कारण
मनुष्यों के आचरण बहुत विचित्र होने लगते है। यदि धीरेन्द्र परिपूर्ण हृदय से
हमारे काम में आकर सम्मिलित हुए होते तो इस लापरवाही से वे कभी इस रुपये
को न ले जाते ।