सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 146, कुल 408 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 146

144 / बन्दी जीवन
प्रकृति दूसरी तरह की थी इसीसे इन्होंने प्रायः इन सब विप्लवियों का संग छोड़
दिया था। जिस प्रकार वैराग्य की प्रवृत्ति वाले महापुरुष पहले-पहल संसार और
भोग में लिप्त रहते हैं, किन्तु स्वधर्मवश धीरे-धीरे उसी वैराग्य के मार्ग का अव-
लम्बन कर अन्त में संसार त्याग देते हैं, उसी प्रकार हमारे ये नेता लोग पहले-
पहल विप्लव समिति के साथ अन्तरंग रूप से लिप्त थे, पर स्वधर्मवश ये लोग
सब प्रकार के विप्लव के अनुष्ठान से धीरे-धीरे दूर सरक गए और अन्त में
विप्लव कार्य में योग देना तो इन्होंने छोड़ दिया लेकिन हां बस संसार को ही
नहीं छोड़ा इसी प्रकार राजनीति को ही छोड़ा पर और सब प्रकार से समाज की
सेवा ये लोग करते रहे।
इन सब कारणों से इनके साथ हमारा मन न मिलता था। जब तक रास-
बिहारी देश में थे तब तक वे इनसे दूर-दूर रहने पर भी इनको बड़ा मानकर
झुकते थे, मालूम होता है इसका प्रधान कारण यह था कि रासबिहारी बचपन
से ही इन्हीं की नायकता में ऊपर उठे थे, किन्तु क्रमशः रासूदा के चरित्र में भी
ऐसा परिवर्तन हो गया था कि भारत त्याग करने से पहले जब वे इनके पास
अन्तिम बार आए थे तब ये रासूदा के व्यक्तिगत प्रभाव को देखकर कह उठे थे,
"इसे किस प्रकार छिपा रक्खें? इसे जो देखेगा उसी की दृष्टि इस पर अटक जायगी,
इसे देखकर ही मानो मालूम होता है 'हां, एक मनुष्य—असल मनुष्य' बैठा है।"
जिस समय की यह बात है उस समय इनके मकान की मरम्मत का काम चलता
था, इसीलिए कुली-मजदूर आदि नित्य मकान के भीतर जाया-आया करते थे।
इन सब कुली-मजदूरों के जाने-आने का ख्याल करके ही उन्होंने यह बात कही
थी। एक दिन यही रासूदा के गुरु के समान थे, किन्तु अन्त में शिष्य के प्रभाव से
मुग्ध हो गए थे। रासबिहारी के विदेश चले जाने के बाद से क्रमशः हम लोग इन
सब नेताओं से दूर हटते गए। इस समय बंगाल में जो सब विप्लव दल थे उनमें से
ढाका के विप्लव दल के साथ हम सबसे अधिक घनिष्ठ रूप से मिल-जुलकर काम
करते थे।
(3) ढाका अनुशीलन समिति की कहानी
बंगाल में सभी विप्लव दलों की धारणा थी कि ढाका की अनुशीलन समिति
दूसरी विप्लव समितियों के साथ मिल-जुलकर काम करने को अनिच्छुक है,
अथवा बंगाल की कोई भी विप्लव समिति ढाका की अनुशीलन समिति के साथ
मिल-जुलकर काम न कर सकेगी। किन्तु वे लोग यह न जानते थे कि ढाका की
समिति चन्दननगर अथवा रासबिहारी के दल के साथ पूरी तरह मिल गई थी,
और यह मिलना यूरोपियन महायुद्ध से बहुत पहले ही हो गया था। मेरी जहां तक
जानकारी है उससे इतना कह सकता हूँ कि सब दोष-गुण मिलाकर यह ढाका की
अनुशीलन समिति बंगाल की अन्यान्य अनेक विप्लव समितियों की अपेक्षा श्रेष्ठ
थी। इनके समान बड़ा दल बंगाल में और किसी विप्लव समिति का न था। पूर्व