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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 408 में से

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पृष्ठ 145

बंगाल में / 143
रासबिहारी बचपन से ही इनके संसर्ग में थे, पर इनकी प्रकृति के साथ
उनकी प्रकृति का मेल न था। ज़रा बड़े होकर जब वे देहरादून नौकरी करने गए
तभी वे अपने कार्य की धारा की अपने आप ही सृष्टि करने लगे। प्रकृति देवी
जैसे सबसे अलक्षित ही अपने सब कार्यों की सृष्टि कर डालती हैं, रासुदा भी वैसे
ही अपने नेताओं से अज्ञात एक विशाल दल खड़ा कर डालते हैं, बेशक कार्य कुछ
आगे बढ़ जाने के बाद केन्द्र के नेताओं को उन्होंने बहुत कुछ बतला दिया था ।
रासबिहारी इनके समान केवल त्रास (Terrorism) के पक्षपाती न थे, इसी
कारण उनकी कार्यप्रणाली एक और ही किस्म की थी। किन्तु इनके साथ मत
का मेल न रहने पर भी रासबिहारी विरोध और दलबन्दी के पक्षपाती न थे,
इसी से इनके साथ जहाँ तक सम्भव होता था मिल-जुलकर ही काम करते थे।
एक और कारण से भी केन्द्र के नेताओं के साथ हमारा भारी विरोध रहता
था। ये नेता लोग समझते थे कि आध्यात्मिकता का गूढ़ मर्म केवल वे ही लोग
प्राप्त कर सके थे, इसी से उनके साथ मतभेद होते ही वे कह देते कि हम लोग
बिलकुल पाश्चात्य आदर्श में मतवाले हो गये हैं, मानो त्रास फैलाने (Terro-
rism) की अपेक्षा खालिस विप्लव की चेष्टा अधिक पाश्चात्य आदर्श से अनु-
प्राणित थी, विरुद्ध पक्ष के मत का खण्डन करने की यह अकाट्य युक्ति आजकल
बहुत लोगों की ज़बान पर सुनी जाती है।
ये लोग अनेक प्रकार से प्रचार करते थे कि वैराग्य-साधना अथवा ध्यान-
धारणा और समाधि का मार्ग ही भगवान् को पाने का एकमात्र श्रेष्ठ मार्ग नहीं
है। इसी से ये लोग प्रचार करते थे कि संसार को त्यागे बिना संसार के सब कार्यों
को ठीक प्रकार करते हुए संसार में अनासक्त होकर रहना ही श्रेष्ठ मार्ग है,
किन्तु व्यवहार क्षेत्र में ये अपनी क्षुद्र टोली को राजनीति से प्रयत्नपूर्वक पृथक्
कर रखने की भरपूर चेष्टा करते थे। इसी से हमारे साथ इनका नित्य ही विरोध
होता। जिस दिन पंजाब का विप्लवायोजन विफल होने के बाद हमने इस केन्द्र
में आकर ज़रा दम लेने के लिए आश्रय लिया उसी दिन इन लोगों ने चुटकी
लेकर हम से कहा था, "बहुत कूद-फांद हो चुकी, अब ज़रा शान्त होकर बैठकर
भगवान् की आराधना करो।"
हमारा विचार है कि इनकी प्रकृति विप्लव धर्म की विरोधी थी, इसी से ये
लोग अनेक घटनाचक्र में पड़कर क्रमशः इस विप्लव के चक्कर से बहुत दूर हटते
गए। ये लोग मुँह से ज्ञान, कर्म और वैराग्य के बीच समन्वय करके चलने के
आदर्श का प्रचार भले ही करते थे, किन्तु कार्यक्षेत्र में और सब प्रकार से संसार
के कार्य में लिप्त रहकर भी राजनीति से, विशेषतः जिस राजनीति के आदर्श का
अनुसरण करने से अग्रेज सरकार के साथ विरोध होना जरूरी होता उस मार्ग से
बड़े यत्न के साथ बच-बचकर चलने की चेष्टा करते थे। निःसन्देह जब तक ये
लोग दूसरे विप्लवियों के संस्पर्श में थे, तब तक सब तरह से भीषण विपत्ति की
भी परवाह न करते हुए उन सब विप्लवियों की सहायता करते थे, किन्तु इनकी