बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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कहते थे कि इस प्रकार अथवा किसी और प्रकार स्वायत्तशासन पाये बिना भारत
के लिए पूर्ण स्वाधीनता पाना सम्भव नहीं है। उनका विश्वास था, टैररिज्म (त्रास
फैलाने) के द्वारा ही सहज में और थोड़े समय में पूर्ण स्वायत्तशासन पाया
जा सकता है। यह कार्य-प्रणाली उन्हें बंगाल के किन्हीं स्वनामधन्य देशपूज्य नेता
से प्राप्त हुई थी। किन्तु इस टैररिज्म को भी सार्थक करने के लिए दल का जैसा
गठन करने की आवश्यकता थी वह भी वे न कर सके थे। जैसे किसी जगह के
एक मैजिस्ट्रेट को मारना होता तो एक युवक को रिवाल्वर देकर उस जगह
भेज देते, यद्यपि पहले से उस जगह पर दल के गठन की कोई चेष्टा न हुई होती
थी।
सुनियन्त्रित, उपयुक्त और शक्तिशाली संघ के बिना आजकल कोई कार्य
भी सफल नहीं हो सकता; और न भारत के लिए स्वायत्तशासन पाने का अर्थ
स्वाधीनता पाना ही है; ऐसे एक विराट् और कठिन कार्य को सफल करने के
लिए कैसे विशाल और शक्तिशाली संघ की आवश्यकता थी, हमारे केन्द्र के नेता
लोग यह बात भली प्रकार नहीं समझ सके। इसी से इनकी नायकता में बंगाल में
कोई भी विशेष दल नहीं उठ खड़ा होता; इनके दल का क्षुद्र दायरा ग्राम की
सीमा पार नहीं कर पाता। इस प्रकार कार्य करने से कृतार्थ न होने की ही
सम्भावना थी; इसी से केवल इनके यत्न से, कहा जा सकता है, त्रास (Terro-
rism) की कोई चेष्टा सार्थक नहीं हुई। इस कार्यप्रणाली के विषय में इनके
साथ मेरा प्रायः घोर विवाद होता था।
इस प्रकार दल का आदर्श केवल टैररिज्म रक्खा जाने के कारण ही मेरे
समान अनेकों युवक इनके आदर्श में जी-जान एक करके साथ न दे सकते थे।
और इस प्रकार के त्रास का आदर्श सचमुच चिन्ताशील युवकों के हृदयों को
आकर्षित नहीं कर सकता। यथार्थ में खूब ऊँचे, उदार और विशाल आदर्श की
प्रेरणा के बिना कोई व्यक्ति अपने जीवन की और अपने सर्वस्व की बाजी लगा-
कर देश के कार्य में योग नहीं दे सकता। इसी से टैररिज्म के आदर्श पर लोक-
संग्रह सम्भव न था। इसीलिए लोक-संग्रह के लिए अन्यान्य अनेक आदर्श लाये
जाते और विप्लव-समिति की कार्यप्रणाली के विषय में प्रायः सबको ही घोर
अँधेरे में रक्खा जाता। इस प्रकार केवल कुछ लोगों का संग्रह करके उनके द्वारा
केवल टैररिज्म के काम कराये जाते, यह बात हमारे मन के माफ़िक न थी।
रासबिहारी और उनके मतावलम्बी युवकों के साथ बातचीत होने के बाद जिस
दिन पहले-पहल इन सब नेताओं के साथ मेरा परिचय हुआ उस दिन मैं एकदम
स्तब्ध-सा हो गया था, सोचता था यह फिर कैसे दल में आ घुसा ! उनकी बातों
का प्रतिवाद मैंने उसी दिन किया था और रासबिहारी के साथ फिर बातचीत होने
पर उनसे भी इस विषय में शिकायत की थी। उसी दिन से रासबिहारी ने मुझसे
कह दिया कि कर्मयोग और धर्मसाधना की बातों के सिवाय अपनी कार्यप्रणाली
के विषय में कोई बात इनके साथ फिर मत करना।