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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 408 में से

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पृष्ठ 143

बंगाल में / 141
जापानियों को भारत की अवस्था का कुछ भी ज्ञान न था। किन्तु अब मुख्यतः
हमारी चेष्टा और त्याग के कारण प्रत्येक जापानी भारत के घटना-प्रवाह को
उत्सुकता से देख रहा है। मन्त्रिमण्डल के सदस्यों से लेकर वकीलों, पार्लमेण्ट के
मेम्बरों, पत्र-सम्पादकों और विद्यार्थियों तक मेरे बहुत-से जापानी मित्र हैं।
जापानी भाषा में गांधी और भारतीय आन्दोलन के विषय में बहुत-सी पुस्तकें
प्रकाशित हुई हैं, और पत्र-पत्रिकाओं में भारत पर लगातार लेख निकल रहे हैं।
इसी महीने टोकियो इम्पीरियल विद्यापीठ के एक प्रोफेसर ने जापानी में भारत-
विषयक एक विराट् ग्रन्थ लिखा है। अगले महीने मुझे भारत के विषय में तीन
दिन व्याख्यान देने होंगे। आज यहाँ के बहुत-से नवयुवक एशिया की स्वाधीनता
के कट्टर पक्षपाती हो गए हैं। बूढ़े लोग और जिम्मेदार अफ़सर भी फारस से
चीन तक फैली हुई नई जागृति से सहानुभूति रखते हैं। देशभक्ति तो जापानियों
की जातीय विशेषता ही है। और ये लोग जिनमें भी वह गुण देखते हैं उन्हीं पर
प्रेम और श्रद्धा करने लगते हैं। यही कारण है कि हमें शरण मिली है। जापानियों
की सहानुभूति और प्रेम न मिलता तो मैं बहुत पहले मर चुका होता। ······भाई
देश में वापस आने के विषय में मुझे यही कहना है कि जब तक भारत स्वाधीन
न हो मैं वापस आना नही चाहता । ······तुम्हारी बोदीदी (भावज) बंगला
सीख रही हैं।······
इन पत्रों से रासबिहारी के मन की वर्तमान अवस्था के विषय में बहुत कुछ
जाना जा सकता है। किन्तु वर्तमान अवस्था की बात छोड़कर जिस समय की
अवस्था लिख रहा था, उसी समय की बात फिर लिखता हूँ।
(2) केन्द्र की कहानी
रासूदा भारत छोड़कर चले गए; उन्हें जहाज पर चढ़ाकर हम और गिरिजा
बाबू अपने केन्द्र में वापस आ गये। केन्द्र के साथ हमारा सम्बन्ध खूब घनिष्ठ
नहीं था और ऐसा होने के अनेक कारण थे ।
प्रथमत. केन्द्र के नेताओं के साथ हमारे राजनीतिक मतों में मेल न था। वे
इस विप्लव समिति की स्थापना के आरम्भ से ही टैररिज़म (त्रास फैलाने) के
पक्षपाती थे। उन्होंने अब तक देश में सशस्त्र विप्लव करने के लिए कोई चेष्टा न
की थी। वे समझते थे कि यदि कुछ दिन तक देश के एक छोर से दूसरे छोर तक
अंग्रेज गवर्नमेंट के ऊँचे कर्मचारियों का रिवाल्वर और बम से काम तमाम कर
दिया जाय तो गवर्नमेंट घबड़ाकर देश को अनेक राजनीतिक अधिकार दे देगी।
और इस प्रकार तमंचे के जोर से अधिकार के बाद अधिकार प्राप्त करते हुए
अन्त में पूर्ण स्वायत्तशासन तक ले लेना सम्भव है, ऐमा उन लोगों के मन का
विश्वास था। भारत के लिए पूर्ण स्वायत्तशासन ले लेने का ही अर्थ होता
स्वाधीनता की प्रथम सीढ़ी पर पहुँच जाना, क्योंकि पूर्ण स्वायत्तशासन प्राप्त कर
लेने पर भारत के लिए स्वाधीनता पाना कुछ क्रठिन बात न होती। वे यह भी