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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 142, कुल 408 में से

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पृष्ठ 142

140 / बन्दी जीवन
इसका भावार्थ यह है :-
टोकियो, जापान
12-4-22
प्राणों के..., उन्हें मैं अमानुषिक निर्याातनों से बचा नहीं सका, यह धारणा
मुझे अत्यन्त अधीर किए रखती थी। जो हो, मैं यही कहकर अपने को सान्त्वना
देता था कि इस प्रकार आग में तपकर वे और भी निर्मल और उज्ज्वल हो उठेंगे ।
किन्तु भाई तुम्हारे पत्र में जगह-जगह जो निराशासूचक बातें थी वे मुझे बिलकुल
अच्छी नहीं लगीं । हमारा जीवन अनन्त है, इसी से हमारा कार्य भी अनन्त है ।
यदि सचमुच तुम्हारे अन्दर कोई मलिनता हो भी तो चिन्ता की कोई बात नहीं...
अवश्य ही अब गुप्त कार्य करने की कोई आवश्यकता नही है, इस विषय में तुम्हारे
साथ मेरी पूरी सहमति है । अब तक हमें अन्तर्राष्ट्रीय अवस्थाओं के विषय में
कुछ भी ज्ञान न था । हमने अब तक भारत की ओर ही ध्यान रखा था । किन्तु
अब अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति मैं कुछ-कुछ समझने लगा हूँ । इससे मेरे पहले विचारों
में बहुत परिवर्तन हो गया है । एक बात याद रखो—हमें अन्त में सारे संसार
का प्रश्न हल करना होगा, हमारे भाग्य में यही लिखा है । संसार मे नवीन युग
लाकर सत्य और शान्ति की स्थापना का दायित्व भारत के ही सिर पर है ।
भारत की स्वाधीनता इसी उद्देश्य का साधन है, यह स्वयं उद्देश्य नहीं है।
(2)
टोकियो,
9 जुलाई, 1922
प्राणों के......तुम्हारी चिट्ठी कल मिली। लिखते हो मेरे पत्र से तुम्हारी
आशा पूरी नही हुई । तुम्हारे हृदय की इच्छा क्या थी ? मुझे तो प्रतीत होता है
अपने पत्र में मैंने सब बात स्पष्ट करके लिखी थी । अवश्य ही ऐसी अनेक बातें
हैं जो पत्र में नही लिखी जा सकतीं । जब तक फिर हमसे भेंट नही होती तब तक
उन बातों के विषय में तुम्हारी उत्सुकता तृप्त नहीं हो सकती । तो भी सबसे
बढ़कर जानने लायक बात यही है कि मेरी दृष्टि पहले से बहुत विस्तृत हो गई
है, इस बात का मैंने पिछले पत्र में भी संकेत किया था। पूर्ण स्वाधीनता भारत
को चाहिए ही, क्योंकि उसकी स्वाधीनता पर सारे संसार का पुनरुद्धार निर्भर
है। यह स्वयं एक साध्य नहीं, प्रत्युत एक उद्देश्य का साधन है, और वह उद्देश्य
है साम्राज्य-सत्ता और सैनिक आधिपत्य का संहार और सब लोगों के रहने को
एक नये अच्छे संसार की सृष्टि । यही भारत का उद्देश्य है, और इसीलिए
तुम्हारा और मेरा उद्देश्य है,..... मैं जापान को बहुत चाहता हूँ और उस पर
श्रद्धा करने लगा हूँ, मुझे दृढ़ विश्वास हो गया है कि उपयुक्त समय आने पर
जापान एशिया की स्वाधीनता के लिए सिर उठाएगा । जब मैं पहले यहाँ आया,