बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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इस प्रकार तय था कि देश में आर्गनिजेक्शन (संगठन) ठीक ढंग पर हो जाने
के बाद मैं भी विदेश जाकर उनका साथ दूंगा, कारण कि मेरे नाम भी वारण्ट
निकल गया था और देश में रहने से उस समय पकड़े जाने की बड़ी सम्भावना
थी। वारण्ट निकलना तो दूर की बात है, यदि केवल पुलिस की सन्देह दृष्टि में
पड़ जाएँ तो भी काम करने में बड़ी असुविधा हो जाती है। देश में भिन्न-भिन्न
स्थानों के विप्लवकारियों को परस्पर मिला देनेवाला कोई और रहता तो मैं भी
रासूदा के साथ ही विदेश चला जाता, किन्तु वैसे किसी और व्यक्ति के न रहने
से कार्य की खातिर उस विपत्ति के बीच भी मुझे देश में ही रहना पड़ा। काशी
छोड़ने से पहले रासूदा ने मेरी माताजी से यह प्रतिज्ञा ले ली थी कि मेरे विदेश
जाने के खर्च के लिए वे एक हज़ार रुपये देंगी। मैं ऐसे विप्लव कार्य में लिप्त हूँ,
यह बात मेरी माताजी बहुत दिन से जानती थीं और इन सब बातों में उनकी
यथेष्ठ सहानुभूति भी थी। मेरे बहुत जन्मों के सुकर्मों का फल था कि बंगाली के
घर में मुझे ऐसी माँ मिली थी।
रासूदा के विदेश जाने का रहस्यपूर्ण विस्तृत इतिहास लिखने का समय अभी
नहीं आया; केवल इतना ही यहाँ कहे देता हूँ कि बाहर से यह काम कितना ही
रहस्यपूर्ण क्यों न दिखाई दे, असल में यह बड़ा सहज और सरल था। इस प्रकार
जाने के लिए केवल साहस और भगवान् का भरोसा करने के सिवाय और किसी
चीज की आवश्यकता न थी। जिस समय रासबिहारी विदेश गए उस समय यूरोप
की लड़ाई भयंकर रूप से चल रही थी, और उस समय विदेश जाना या विदेश
से देश में आना कुछ कम कठिन बात न थी। इसके सिवाय रासबिहारी की-सी
दशा के आदमी के लिए एक जगह से दूसरी जगह घूमते फिरना कुछ कम खतरनाक
न था। अवश्य ही उस समय उनके पास हर वक़्त गोली-भरी पिस्तौल रहती थी
और हममें से भी कोई-न-कोई हर वक़्त उनके नज़दीक मौजूद रहता था। इसी से
उन्हें जीते-जी पकड़ लेना एक हिम्मत का ही काम था किन्तु सबसे अधिक वे
भगवान् के अनुग्रह पर ही निर्भर रहते थे। जब वे अन्तिम बार कलकत्ते आए तब
उन्होंने रिवाल्वर संग लेने मे भी अनिच्छा प्रकट की थी। रासबिहारी का बदन
दोहरा था, इसी से मेरी धारणा थी कि वे दौड़ बिलकुल नही सकते। एक दिन
मैंने उनसे पूछा, यदि पुलिस पकड़ने आवे तो आप दौड़ने की चेष्टा करेंगे कि
नहीं?” उसके उत्तर मे हँसते-हँसते बोले कि वे बिलकुल दौड़ न सकेगे, उस
अवस्था में शान्ति से आत्मसमर्पण कर देंगे। ऐसे ही और एक प्रश्न के उत्तर में
उन्होंने कहा था कि उनकी आयु जब तक पूरी न होगी वे पकड़े न जाएँगे। आयु
के ऊपर तो और किसी का हाथ नही है।
रासबिहारी अब जापान मे हैं। वहाँ वे जापानियों को अंग्रेज़ी पढ़ाते हैं,
‘एशियन रिव्यू’ मासिक पत्रिका की सम्पादकी करते हैं, जापान के विभिन्न स्थानों
में भारतवर्ष के विषय में वक्तृता आदि देते हैं, और भिन्न-भिन्न सामयिक पत्रि-
काओं आदि में लेख लिखते हैं। जापान में बहुत पहले ही वे अंग्रेजों के हाथ क़ैदी हो