बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
पृष्ठ 138, कुल 408 में से
संदर्भ में पढ़ें136 / बन्दी जीवन
षड्यन्त्र के मामले के बाद रासूदा को पकड़ा देने के लिए साढ़े सात हज़ार रुपया
इनाम की घोषणा की गई थी, उसके एक वर्ष बाद लाहौर षड्यन्त्र के मामले में
रासबिहारी का कीर्ति-कलाप प्रकाशित हुआ । इसके फलस्वरूप पंजाब गवर्नमेंट
ने उन्हें पकड़ा देने के लिए और ढाई हज़ार रुपया देने की घोषणा की, अर्थात्
उन्हें पकड़ा देने के लिए इस समय सब मिलाकर दस हज़ार रुपया इनाम था;
और बनारस षड्यन्त्र के मामले के बाद युक्तप्रदेश की गवर्नमेंट ने ढाई हज़ार
इनाम और बढ़ा दिया। तब उन्हें पकड़ा देने का कुल पुरस्कार साढ़े बारह हज़ार
रुपये तक जा पहुँचा। इन सब कारणों से हमने निश्चय किया कि रासूदा को इस
बार भारत के बाहर भेजना ही होगा ।
इतने दिन तक हम लोग इस बात की ओर बड़े उदासीन थे। हम इतने दिन
तक समझते थे कि विप्लव वस्तुतः शुरू होने में काफ़ी देर है, इसी से हमने इतने
दिन तक उचित परिमाण में विदेश से अस्त्र-शस्त्र लाने का कोई विशेष आयोजन
नहीं किया था। किन्तु इस बार देश की अवस्था देखकर हमने समझ लिया कि
उपयुक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र रहें तो विप्लव आरम्भ करने में अधिक देर न
होगी। इसी से इस बार रासूदा को विदेश भेजकर नये सिरे से विप्लव का आयो-
जन करना तय हुआ। रासूदा भी देश छोड़ने से पहले कह गए थे "इसबार
भारत के प्रत्येक युवक और युवती को सशस्त्र करना होगा, उसके बाद देखेंगे
अंग्रेज़ किस तरह भारत पर शासन करते हैं।"
रासूदा पहले विदेश जाने के प्रस्ताव से वैसे सहमत न होते थे, वे कुछ दिन
और प्रतीक्षा करना चाहते थे; किन्तु हमारे अनुरोध को वे अन्त में न टाल सके।
किस प्रकार, कब और कहाँ जाना होगा ये सब बातें रासूदा से भेंट होने के बाद
ठीक की गईं। बात थी कि रासूदा विदेश जाते ही सबसे पहले यथेष्ठ परिमाण में
मोज़र पिस्तोलें और उनकी गोलियां भेज देंगे और बाद में विप्लव के लिए उप-
युक्त परिमाण में अस्त्र-शस्त्र भेजने का बन्दोबस्त कर चुकते ही देश चले आएँगे।
किस प्रकार अस्त्र-शस्त्र देश में आ पहुँचेंगे और विप्लव आरम्भ करने की विस्तृत
आयोजना कैसी होनी चाहिए, यह सब विदेश के उपयुक्त और जानकार समर-
कुशल व्यक्तियों के साथ परामर्श करके ठीक करने का विचार था।
काशी से रासूदा विनायक कापले को संग लेकर पहले नदिया आए और फिर
विदेश जाने के पहले तक कलकत्ता के पास ही कहीं रहे। विदेश जाने के चार
दिन पहले वे कलकत्ते की ही एक कलकलपूर्ण बस्ती में आकर रहे और एक दिन
दोपहर हम और गिरिजा बाबू जाकर उन्हें जहाज पर चढ़ा आए। यह अप्रैल सन्
1915 की बात है। मैं और रासूदा एक गाड़ी में और गिरिजा बाबू दूसरी गाड़ी में
जहाज तक गए। रासूदा का मुझसे बड़ा ही प्यार था। रास्ते में रासूदा मुझे
अपने अत्यन्त निकट खींचकर मेरे कन्धे पर हाथ रखकर बड़े स्नेह के साथ कहने
लगे, "भाई देश छोड़ते मुझे कितना कष्ट होता है यह तुमसे नहीं कह सकता,
देखो, खूब सावधान होकर सुनो। भाई, देश के काम को ठीक ढंग पर लाकर तुम
भी मेरे पास चले आना।" उनके साथ मेरी यही अन्तिम बात हुई थी।