बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)
Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal
शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा
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बंगाल में
(1) रासबिहारी का भारत त्याग
बारी का बुखार लेकर प्रताप के साथ बंगाल मे मैं अपने केन्द्र में आ उपस्थित
हुआ। बंगाल में हमारी विप्लव समिति का केन्द्र था कलकत्ता के निकट एक गाँव।
अनेक कारणों से उस गाँव का नाम अब भी नही लिखा जा सकता। इसी स्थान
में मुझे पन्द्रह दिन तक खाट पर पड़े रहना पड़ा। और इसी स्थान के युवकों ने
उस समय बड़े यत्न से मेरी सेवा-शुश्रूषा की। प्रताप मुझे बंगाल में छोड़कर
राजपूताना चले गए। बात थी कि मैं स्वस्थ होने पर राजपूताना जाऊँगा और
इस बार बड़े यत्न के साथ राजपूतान' में विप्लव के केन्द्र स्थापित करने होंगे।
परन्तु जब उनके साथ मेरी फिर भेंट हुई, तब हम दोनों ही जेल में थे।
मैं जब इस प्रकार बीमार होकर खाट पर पड़ा था तब पूर्व बंगाल के एक
नेता श्रीयुत नगेन्द्रनाथदत्त उर्फ गिरिजा बाबू प्राय मेरे पास आया करते थे।
उनके साथ परामर्श करके हमने निश्च० किया कि रासूदा को अब किसी प्रकार
भी भारतवर्ष में नही रहने देना होगा। बहुत हो चुकी, भगवान् अनेक प्रकार से
उनको अब तक बचाते आए हैं। अब और अधिक उन्हें भारतवर्ष में बेखटके
रहना सहज नहीं है। हमारा दल चोट के बाद चोट खाकर फैलने का सुयोग नहीं
पाता। जिस समय हमारा दल उन्नति की ओर अग्रसर होने लगता है, ठीक उसी
समय एक ऐसी बड़ी चोट उस पर आ लगती है कि उम चोट के बाद सम्हलने में
फिर कुछ दिन लग जाते हैं। पहले दिल्ली षड्यन्त्र मामले की चोट सम्हालते-
सम्हालते हमारा एक वर्ष चला गया, उस चोट के बाद सम्हलकर फिर जब
गवर्नमेंट पर और ज़ोर की चोट करने लायक शक्ति-संचय किया ठीक उसी समय
फिर लाहौर षड्यन्त्र का मामला हो गया। इस चोट ने हमें एकदम पंगु कर
दिया। इस चोट से हमारा पंजाब और युक्तप्रदेश का दल भग्नप्राय हो गया।
बंगाल में भिन्न-भिन्न दलों को चोट के बाद चोट सहनी पड़ी। इस अवस्था में
रासबिहारी को भारतवर्ष में रखना हमें कुछ भी युक्तसंगत न जान पड़ा, क्योंकि
दल का अच्छा ज़ोर न रहने पर अंग्रेजों की विधि व्यवस्था के विरुद्ध टिका रहना
किसी प्रकार सम्भव न था। रासूदा को जो हम लोग इतने दिन तक बचाए रख
सके तो केवल अपने आर्गनिजेशन (संगठन) के सुप्रबन्ध के ज़ोर पर। दिल्ली