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सर्वकोश
बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 135, कुल 408 में से

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पृष्ठ 135

दिल्ली में / 133
श्री चरणों में आत्मोत्सर्ग करके जीवन को भगवान् के भाव से पूर्ण कर डालने की
आन्तरिक चेष्टा हम मे से बहुतों ने की, परन्तु निष्कलंकियों की बातों में हमें खूब
आनन्द भले ही आता हो, उनकी सब बातों में हम पूर्ण रूप से आस्था नही कर
सके।
एक बात हम सभी ने सुनी है कि धर्म-कर्म करते-करते हमारा देश एकदम
उजड़ गया है। बड़े ही दुःख के साथ एक बात स्वीकार करनी पड़ती है कि दस-
बारह बरम के विप्लव-कार्य के तजुरबे में हमने देखा है कि जो लोग धर्म-धर्म बहुत
पुकारा करते थे उनमें सौ में से निन्यानवे आदमी बाद को लोकहित के कार्य में
निरुत्साह हो जाते थे और अन्त मे इने-गिने, दो-एक आदमियों के सिवाय और
सभी प्रायः तामसिक वृत्ति के हो जाते थे। धर्म और आन्तरिकता की पूरी परख
होती है त्याग में; और इस त्याग की कसौटी पर कसे जाने पर अधिकांश धार्मिक
कहलानेवाले लोग तामसिक और स्वार्थपरायण प्रमाणित हुए है। हमारा विश्वास
है कि आर्य-सभ्यता में दो बड़े ऊंचे सिद्धान्त है—अधिकारभेद और गुरुवाद, इन
दोनों की ओर एकदम ध्यान न देकर जब हम धर्म-कर्म करते जाने को कहते हैं तब
स्वधर्म छोड़कर परधर्म करने लगते है, और इसी कारण हमारी दुर्गति होती
है। इसी से सात्विकता की ओट में हम प्रायः तामसिकता को आश्रय देते है और
धर्म के नाम पर केवल अधर्माचरण करने लगते है।
लक्ष्मीनारायण में सचमुच तेज था, उन्होने सचमुच आन्तरिक भाव से भग-
वान् का स्मरण करना आरम्भ किया था, किन्तु सांसारिकता और आध्यात्मिकता
के बीच वे सामञ्जम्य नही रख सके और लक्ष्मी की देखा-देखी उनके बन्धुओं ने
भी कर्म को त्यागकर केवल भक्ति को ग्रहण कर लिया था, किन्तु विपत्ति के दिन,
हम सब के पकड़े जाने पर इन्ही लक्ष्मी के बन्धुओ ने जिन्होने इतने दिन तक भग-
वान् का नाम लेना ही जीवन का एकमात्र कर्त्तव्य बना रखा था; पुलिस के पंजे
में पड़कर अपने को बचाने के लिए हम सबके विरुद्ध गवाही दी थी और तो और
लक्ष्मीनारायण के विरुद्ध गवाही देने से भी वे नही चूके ।
विपत्ति में पड़ने से पहले तक लक्ष्मीजी उनके विषय मे कहते थे कि इस

  • मय वे लोग बिलकुल भक्ति-साधना मे लिप्त हैं, इसी से उनके द्वारा मैं विप्लव
    का कोई काम-काज कराना नहीं चाहता, इसके सिवाय इस समय भगवान् को
    स्मरण करना ही एकमात्र काम है, अपने हाथ से हमें कुछ करना नहीं है, श्री
    कल्कि-भगवान् प्रकट होंगे, और पूर्णतः उन्ही की शरणागत होना इस समय हमारा
    प्रधान कर्त्तव्य है। लक्ष्मीनारायणजी बहुत दिनों से बहुत विपत्तियों के बीच
    विप्लव समिति में काम-काज करने आते थे, इसी से दूसरे साथियों की अपेक्षा
    उनकी मानसिक शक्ति बहुत अधिक थी। हमारा विचार है इसी कारण
    विपत्ति में पड़कर भी वे अपने को भूले नही, किन्तु उनके दिखाए कर्मविमुखता
    के आदर्श में अनेक लोग उलटे रास्ते पड़ गए, इसीलिए असल परीक्षा के समय ये
    लोग मनुष्योचित व्यवहार न कर सके।