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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 408 में से

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पृष्ठ 134

132 / बन्दी जीवन
और प्रतापसिंह नये सिरे से कार्य चलाने के लिए दिल्ली आये। हमारे दिल्ली
आने का यह भी एक कारण था। क्रीड़क साहब के दिल्ली में न रहने से हमें
अपना एक विशेष कार्य अन्त में स्थगित ही रखना पड़ा, किन्तु दिल्ली की विप्लव
समिति के पुनर्गठन में हम पूर्ण उद्यम से लग गए।
दिल्ली में हमारे लिए मकान किराये पर ठीक कर देना, दिल्ली के पुराने
कार्यकर्त्ताओं के साथ आलाप-परिचय करा देना आदि साधारण कार्यों को छोड़
लछमीनारायण और कुछ न करते थे। अर्थात् दिल्ली का सब कार्यभार हमारे
हाथों सौंपकर उन्होंने विप्लव के कार्य से छुट्टी पाने का प्रबन्ध कर लिया।
हम लोग दिल्ली में एक मकान भाड़े पर लेकर प्रायः पन्द्रह दिन रहे। दिल्ली
से राजपूताना बहुत दूर नहीं है, मैं दिल्ली में ही रहा और प्रताप को दो बार जय-
पुर भेजा। हमारी इच्छा थी कि राजपूताना के कुछ युवकों को दिल्ली में लाकर
दिल्ली के विप्लव केन्द्र को सुगठित कर डालें। प्रताप राजपूताना में कार्य करते
और मैं दिल्ली के कार्यकर्ताओं के साथ मिलता-जुलता और उनमें से अपने दिल के
मुताबिक आदमी छांटता। इस प्रकार दिल्ली में कुछ दिन काम करने के फल-
स्वरूप खास्ताजी के मन में बुझी हुई आग फिर प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने
अपना पुराना उद्यम फिर पा लिया। हमने देखा लछमीनारा" के बदले खास्ता
जी ही दिल्ली का कार्यभार ग्रहण कर सकेंगे। उन्हीं की चेष्टा से इस बार हमारे
साथ दिल्ली के मुसलमान विप्लव दल का घनिष्ठ परिचय हुआ। मुसलमानों के
साथ ठीक हुआ कि वे हमें पिस्तोल, रिवाल्वर और गोली जुटा देंगे और हम
उन्हें बम जुटा देंगे। इसके सिवाय जिस प्रकार हम दोनों दल शीघ्र ही और भी
अधिक सम्मिलित रूप से कार्य कर सकें उसका भी विस्तृत आयोजन किया
जाने लगा। इतने दिन बाद मानो मालूम होने लगा कि दिल्ली में फिर से कार्य
का स्रोत बहने लगा। हमारे पास से बम लेने के लिए हो अथवा यथार्थ में
सहायता करने के लिए हो, दिल्ली में मुसलमान दल ने हमारी इस बार बड़ी
आर्थिक सहायता की।
इस प्रकार जिस समय दिल्ली का कार्य क्रमशः आगे बढ़ने लगा। मैं भी