औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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मिति भावः ), उत्तमदेवतयोः पार्वतीपरमेश्वरयोः संभोगशृङ्गारवर्णनमेव
प्रथममनुचितं, तत्रापि साधारणजनवत्तदीयसंभोगवर्णनन्तु नितरामनु-
चितमिति भावः ॥ १३ ॥
इस पद्य में जगदम्बा का वर्णन निम्न कोटि की ( फूहड़ ) नारी के अनुरूप
नखक्षतादि के द्वारा और त्रैलोक्याधिपति जगत्पिता शंकर का उसके दर्शन की
तीव्र लालसा के द्वारा किया गया है, जो कि अत्यन्त अनुचित है, जिससे प्रबन्धार्थ
में अनौचित्य का बड़ा ही विकट व्यवधान उपस्थित हो जाता है । तात्पर्य यह
है कि एक तो उत्तम देवतास्वरूप पार्वतीपरमेश्वर का संभोग वर्णन ही अनुचित
है । दूसरे साधारण मनुष्य के समान उनका संभोग वर्णन अत्यन्त ही अनुचित
है । इसलिये यहाँ अनौचित्य अपरिहार्यरूप से उपस्थित हो जाता है ॥ १३ ॥
गुणौचित्यं दर्शयितुमाह—
प्रस्तुतार्थोचितः काव्ये भव्यः सौभाग्यवान्गुणः ।
स्यन्दतीन्दुरिवानन्दं संभोगावसरोदितः ॥ १४ ॥
प्रबन्धार्थौचित्यस्योदाहरण-प्रत्युदाहरणे प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमानु-
गतञ्चतुर्थं गुणौचित्यं विवेचयितुमाह—प्रस्तुतार्थेति । प्रस्तुतार्थोचितो
वर्णनीयार्थानुरूपो गुण ओजः-प्रसादादिः, काव्ये, भव्यः कुशलो मुख्यार्थो-
त्कर्षकारित्वात्मकस्वकर्तव्यनिपुण इति यावत्, सौभाग्यवान्सौष्ठवमुपेतः
सन् संभोगावसरोदितः कान्तासम्पर्ककाले समुदितः प्रकाशितः, इन्दुश्चन्द्र
इव आनन्दं मोदं, स्यन्दति प्रवाहयतीत्यर्थः ।
प्रबन्धार्थगत औचित्य का उदाहरण-प्रत्युदाहरण दिखलाकर अभी अवसर-
प्राप्त चतुर्थ गुणगत औचित्य की विवेचना करने के अभिप्राय से कहा जा रहा
है—प्रस्तुतार्थेति । प्रस्तुतार्थ के अनुरूप ही ओजः, प्रसाद आदि गुण काव्य में
सुन्दर तथा अपने कर्तव्य में निपुण होते हैं और वह उसी तरह आनन्ददायक
होते हैं जैसे कान्तासंगम के समय नवोदित चन्द्रमा ।
प्रस्तुतार्थस्यौचित्येनौजःप्रसादमाधुर्यसौकुमार्यादिलक्षणो गुणः काव्ये
भव्यः सौभाग्यवत्तामवाप्तः सहृदयानन्दसन्दोहमिन्दुरिव स्यन्दति ।
कारिकार्थं विवृणोति—प्रस्तुतार्थेति । प्रस्तुतार्थस्य वर्ण्यमानार्थस्या
औचित्येन समुचितविन्यासेन, ओजःप्रसादादिलक्षणो वामनाभिमतो गुणो