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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 217, कुल 256 में से

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पृष्ठ 217

स्तस्यापह्नववचनेऽपलापवार्तायां, सख्या, समुपदिश्यमाने प्रतिपाद्यमाने,
"अयि वियोगविक्षिप्तचित्ते ! स्वामिकल्याणकामनयाऽम्बिकाचरणोपनमने
निजरक्षितधूपपात्राग्रभागकृतक्षतोऽपि भालदेशस्त्वया न परिज्ञातः"
इत्युक्तौ स्वैरापह्नवशिक्षामात्रमेव स्वकृतकदाचारशिक्षणमात्रमेव विज्ञायते,
न तु तस्यास्तत्सख्या वा कोऽपि नूतनोऽभिप्रायविशेषः परिज्ञायते इति
शेषः । अतोऽत्राभिप्रायानौचित्यं स्पष्टमिति भावः ॥ ३२ ॥
इस पद्य में बहुत दिनों के बाद स्वामी के आने पर उसकी व्यभिचारिणी
स्त्री के लिये ललाटस्थितनखक्षतगोपनयोग्य वचन का उपदेश देती हुयी उसकी
सखी कह रही है कि ‘ऐ विरहोन्मत्ते ! पति की कल्याणभावना से आकुल होकर
देवी-दुर्गा के पैर पर गिरने में तुमने स्वस्थापित धूपपात्र का भी ध्यान नहीं रखा,
जिससे तुम्हारे ललाट क्षत-विक्षत हो गये हैं" इस तरह के कथन से स्वेच्छाचार
को छिपाने की शिक्षा देना ही केवल अवगत होता है न कि उस स्वेच्छाचारिणी
अथवा उसकी सखी का कोई विशिष्ट अभिप्राय । अतः यह पद्य अभिप्रायानौचित्य
का उदाहरण होता है ॥ ३२ ॥
स्वभावौचित्यं दर्शयितुमाह—
स्वभावौचित्यमाभाति सूक्तीनां चारु भूषणम् ।
अकृत्रिममसामान्यं लावण्यमिव योषिताम् ॥ ३३ ॥
स्वभावोचितत्वं कविवाचामाभरणमाभाति, अकृत्रिममनन्यसामान्यं
लावण्यमिव ललनानाम् ।
अभिप्रायौचित्यप्रदर्शनानन्तरं क्रमानुगतमेकविंशतितमं स्वभावौचित्यं
विवेचयितुमाह--स्वभावौचित्यमिति । सूक्तीनां काव्यानां, चारु भूषणं
सुन्दरमाभरणं, स्वभावौचित्यं प्रकृत्यनुरूपवर्णनम्, अकृत्रिमं स्वाभाविकम्
असामान्यमनन्यसाधारणं, योषितां कामिनीनां, लावण्यं सौन्दर्यमिवाभाति
सर्वतोभावेन शोभते ।
कारिकामेव व्याख्यातुमाह--स्वभावोचितत्वमिति । स्वभावोचितत्वं
प्रकृत्यानुरूप्यं, कविवाचां काव्यानामाभरणं भूषणं सत् आभाति शोभते,
अकृत्रिमं कृत्रिमतारहितमनन्यसामान्यमनन्यसाधारणं ललनानां सुन्दरीणां
लावण्यं सौन्दर्यमिव ।
अभिप्रायौचित्य के प्रदर्शन के बाद क्रमानुसार इक्कीसवें स्वभावौचित्य
की विवेचना करने के लिये कहा गया है—स्वभावौचित्यमिति । काव्यों के लिये