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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 215

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १५५
विशेष) के चरणाघात से इसकी अँगुलियाँ क्षत हो गयी हैं, तथा धनुर्गुण के
चिह्न पहुँचे पर स्पष्ट लक्षित हो रहे हैं. इतना ही नहीं इसके विशाल वक्षःस्थल,
तथा हाथ पैर, ओठ एवं आँख की लालिमा भी इस बात की पुष्टि कर रही है।
पुत्री का उसे आश्रय देने का यह अभिप्राय समझ कर उसकी मां ने कहा कि
ऐ बेटी ! यदि ऐसी बात है तो आदरपूर्वक इसे घर ले आओ, क्योंकि विशिष्ट
अतिथि की प्राप्ति बहुत बड़े शुभकर्म का फल है।
अत्र स्वैररमणी रमणीयं दिवसावसाने युवानं पथिकमालोक्याभि-
प्रायसूचकं जननीमेवं ब्रूते — "यदसौ राजपुत्राकृतिः श्येनग्रहणाराचपरि-
चयोचितः सायंसमये प्राप्तः इत्युक्ते मात्राप्यभिप्रायपूरकमभिहितम्—
पुत्रि ! यद्येवं तत्कोष्ठाङ्कं प्रविशतु सुकृतैर्विशेषोऽतिथिः प्राप्तः पूज्य इत्ये-
तेन स्फुटाभिप्रायसूचकमौचित्यमुपचितमाचकास्ति ।
अस्मिन्पद्ये स्वच्छन्दविहारिणी काचिद्रमणी सायंकाले मधुराकृतिं
तरुणं पथिकमालोक्य स्वमातरमेवं प्रकारेण तात्पर्यव्यञ्जकं वाक्यं
कथयति—"यदयं पुरो वर्तमानो राजकुमाराकारः, श्येनग्रहस्य नाराचस्य
समग्रलोहनिर्मितबाणस्य च परिचयेन ज्ञानेनोचितो युक्तो दिनशेषे
समुपस्थितः, पुत्र्या इति कथनानन्तरं तज्जनन्यापि रात्रिविश्रामप्रदान-
रूपकन्याकातात्पर्यसमर्थने कथितम्—"पुत्रि ! यदि त्वदुक्तं वचः सत्यं
तर्हि नूनमयं प्रकोष्ठाभ्यन्तरं प्रविशतु, यतो हि पुण्यैः प्राप्तोऽसाधा-
रणोऽभ्यागतः पूज्य एव" एतत्कथनेन स्पष्टतात्पर्यव्यञ्जकमौचित्यमभि-
प्रायौचित्यमिति भावः, उपचितं समृद्धं यथा स्यात्तथा, चकास्ति
विद्योतते ।
इस पद्य में स्वैरविहारिणी कोई रमणी सायंकाल में सुन्दर तरुण पथिक को
देखकर "इसका आतिथ्य करना चाहिए" इस अभिप्राय से अपनी माता को कह
रही है कि यह पथिक राजकुमार जैसा लग रहा है, क्योंकि अँगुलियों में बाज के
नखों के और पहुँचे पर धनुष की डोरी के चिह्न हैं, इस सायंकाल के समय
यह प्रायः आश्रय की खोज कर रहा है । पुत्री की बात सुनकर उसके अभिप्राय
के समर्थन में उसकी माता ने कहा कि बेटी ! यदि ऐसी बात है तो शीघ्र
इसे कोठरी में बैठाओ, क्योंकि ऐसा अतिथि भाग्य से ही मिलता है, इसका
आदर करना ही चाहिए । इस कथन से यहाँ अभिप्रायौचित्य का बहुत ही सुन्दर
चित्रण हुआ है ।