औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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सत्त्वौचित्य की विवेचना कर चुकने के बाद अभी अवसर-प्राप्त बीसवें
अभिप्रायौचित्य की मीमांसा करने अभिप्राय से कहा जा रहा है—अकदर्थन-
येति। जैसे स्वस्थ = निर्मल, आर्जव = कोमलता, विनय, सज्जनों के चित्त को
आवर्जित = आनन्दित करते हैं उसी तरह अक्लेशेन = सरलता से वक्तृतात्पर्य-
बोधक-काव्य सहृदयों के मन को मुग्ध कर देता है।
कारिका की ही व्याख्या की जा रही है—अक्लेशेनेति । सरलता से अभि-
प्रायबोधक काव्य निष्छल हृदय से किये गये विनय के सामने सज्जनों के हृदय
को अपूर्व आनन्द प्रदान करता है।
यथा दीपकस्य—
श्येनाङ्घ्रिग्रहदारितोत्तरकरो ज्याङ्कप्रकोष्ठान्तर,
आताम्राधरपाणिपादनयनप्रान्त पृथूरःस्थलः।
मन्येऽयं द्विजमध्यगो नृपसुतः कोऽप्यम्ब ! निःशम्बलः,
पुत्र्येवं यदि कोष्ठमेतु सुकृतैः प्राप्तो विशेषातिथिः॥
अभिप्रायौचित्यमुदाहर्तुमाह—यथा दीपकस्येति। श्येनेति। युवानं
राजपुत्रमागतमवलोक्य कस्याश्चित्स्वैरविहारिण्याः तत्पुत्र्याश्चोक्तिप्रत्युक्ति-
रूपेष प्रयुक्तमिदं पद्यम्। अम्ब ! हे मातः ! श्येनस्य तन्नामकपक्षिविशेष-
स्याङ्घ्रयोश्चरणयोर्ग्रहेण ग्रहणेन, दारितः क्षतः, उत्तरकरः कराग्रभागो
यस्य सः, ज्याङ्कौ मौर्वीगुणचिह्नं प्रकोष्ठान्तरे मणिबन्धमध्ये यस्य सः,
आताम्रस्ताम्रवर्णो रक्त इति यावत्, अधरस्य, पाण्योर्हस्तयोः, पादयो-
श्चरणयोर्नयनयोश्च, प्रान्तः प्रदेशो यस्य सः, पृथून्नतमुरःस्थलं हृदयं यस्य
सः, द्विजमध्यगो भूसुरमध्यवर्ती निःशम्बलो ऽनिराश्रयः, कोऽपि नृपसुतो
राजपुत्रोऽयं पुरोवर्तीति, मन्येऽनुमिनोम्यहमिति शेषः। एवमातिथेयितया
स्वात्मानं प्रकटयन्त्याः पुत्र्या वचनमाकर्ण्य तन्मातोत्तरयति—पुत्रि !
हे पुत्रि ? यद्येवं यदि त्वदुक्तं सत्यं तर्हि, सुकृतैः पुण्यैः प्राप्तो लब्धो
विशेषातिथिरसाधारणोऽभ्यागतः, कोष्ठं गृहाभ्यन्तरमेतु सादरं गृहमाया-
त्विति भावः।
अभिप्रायौचित्य का उदाहरण दिखाने के लिये कहा गया है—यथा दीप-
कस्येति। श्येनेति। किसी सुन्दर युवक पथिक को देखकर कोई स्वैरविहारिणी
अपनी माँ से कह रही है कि ऐ माँ ! आश्रय की खोज में भटकता हुआ यह
युवक पथिक कोई राजकुमार मालूम पड़ रहा है, क्योंकि पालित बाज (पक्षि-