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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 210, कुल 256 में से

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पृष्ठ 210

१५० औचित्यविचारचर्चा
क्योंकि व्याकरण न भूख को मिटा सकता है, न काव्यरस प्यास को ही, शास्त्र
पढ़ लेने मात्र से ही कहीं कोई अपने कुल का उद्धार करता हुआ भी नहीं देखा
गया है" ऐसा जो कहा गया है वह दरिद्रता और दीनता के चलते अधैर्य की
स्थिति में प्रगट होने के कारण सत्य से दूर और साथ ही विपरीत भी है, अतः
पूर्णतः अनौचित्य से परिपूर्ण है । वस्तुतः सभी संपत्तियों की जननी विद्यामें ही
कुलोद्धार की क्षमता रखती हैं, अन्य कोई नहीं ॥ ३० ॥
सत्त्वौचित्यं दर्शयितुमाह—
चमत्कारं करोत्येव वचः सत्त्वोचितं कवेः ।
विचाररुचिरोदारचरितं सुमतेरिव ॥ ३१ ॥
सत्त्वोचितं कवेर्वचश्चमत्कारं करोति, सुमतेरिव विचार्यमाणं रुचिर-
मुदारचरितम् ।
तत्त्वौचित्यप्रतिपादनानन्तरं क्रमोपगतमेकोनविंशतितमं सत्त्वौचित्यं
विवेचयितुमाह—चमत्कारमिति । सत्त्वोचितमन्तर्बलोपयुक्तं, कवेर्वचः
काव्यं, सुमतेः सुधियः, विचारचरितोदारचरितं विवेकानुमोदितोदात्त-
चरित्रमिव, चमत्कारं विच्छित्तिविशेषं, करोति सम्पादयत्येव । कारि-
कार्थमेव विवृणोति—सत्त्वोचितमिति । सत्त्वमन्तर्बलं, तदुचितं तदनुरूपं
कवेर्वचः काव्यं, चमत्कारं करोत्याह्लादं जनयति । विचार्यमाणे विचारे
क्रियमाणे, रुचिरं मनोज्ञं, सुमतेर्विदुष उदारचरितमुदात्तचरित्रमिव ।
उदाहरण-प्रत्युदाहरणादि के द्वारा तत्त्वौचित्य का प्रदर्शन करने के बाद
उन्नीसवें सत्त्वौचित्य की विवेचना की जा रही है—चमत्कारमिति । किसी वस्तु
के अन्तर्बल के अनुरूप कवियों की वाणी विवेकानुमोदित सुधीजनों के उदात्त
चरित्र की तरह अपूर्व चमत्कृति प्रदान करती है। कारिका की ही व्याख्या करने
के लिये कहा गया है—सत्त्वोचितमिति । सत्त्व के अनुरूप वर्णन से कवि की सूक्ति
उसी तरह अपूर्व आनन्द प्रदान करती है जैसे विचार करने पर सुन्दर प्रतीत
होने वाला सज्जनों का उदात्तचरित्र ।
यथा मम चित्रभारते नाटके—
नदीवृन्दोद्दामप्रसरसलिलापूरिततनुः,
स्फुरत्स्फीतज्वालानिविडवडवाग्निक्षतजलः ।
न दर्पं नो दैन्यं स्पृशति बहुसत्त्वः पतिरपा-
मवस्थानां भेदाद्भवति विकृतिर्नैव महताम् ॥