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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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पृष्ठ 207

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १४७
इस पद्य में वैराग्य का उचित उपबन्ध से रहित वर्णन किया गया है, क्योंकि
इसमें कहा गया है कि— "भिक्षापात्र लेकर, भूख से व्याकुल, पेट को भरने के
में संलग्न आत्माभिमानी जन लकड़ी टेकता हुआ द्वार-द्वार घूमता फिरे यह
अच्छा है, परन्तु स्वजन के आगे रोज-रोज दीनता प्रगट करे यह अच्छा नहीं है।"
इस कथन के द्वारा ऐसा प्रतीत होता है कि स्वाभाविक शान्ति से पवित्र मानस
का एक मात्र विश्रामस्थल संतोष का त्यागकर स्वजनगत द्वेषवश उसे जीतने
की इच्छा से ही उक्त बात कही गयी है और "कठिन व्रत का कष्ट सहना अच्छा
परन्तु स्वजन-याचना नहीं" इस तरह का कथन उसी का हो सकता है जिसे
संबंधन का अभिमान बना है अर्थात् सांसारिक रागद्वेष-युक्त व्यक्ति ही वैसा
हो सकता है, पक्का वैरागी नहीं। ऐसी स्थिति में पूर्वोक्त भिक्षाव्रत का वर्णन
स्वतः अनुचित है ॥ २९ ॥
तत्त्वौचित्यं दर्शयितुमाह—
काव्यं हृदयसंवादि सत्यप्रत्ययनिश्चयात् ।
तत्त्वौचित्याभिमानेन यात्युपादेयतां कवेः ॥ ३० ॥
तत्त्वोचिताख्यानेन कवेः सूक्तं सत्यप्रत्ययस्थैर्यात्संवादि गृह्यतां याति ।
व्रतौचित्यं प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमोपगतमष्टादशतं तत्त्वौचित्यं विवेच-
यितुमाह-काव्यमिति । तत्त्वौचिताभिधानेन यथास्थितवस्त्वनुरूपवर्णनेन,
कवेः काव्यं, सत्यप्रत्ययनिश्चयादस्मात्काव्यात्सत्यस्य प्रतीतिर्भवतीत्या-
कारकविश्वासाद्धृदयसंवादि हृदयसम्मतं सदुपादेयतां ग्राह्यतां याति ।
कारिकार्थमेव व्याख्यातुमाह—तत्त्वोचितेति । तत्त्वोचिताख्यानेन वस्तु-
तत्त्वानुरूपवर्णनेन, कवेः, सूक्तं काव्यरूपं, सत्यप्रत्ययस्थैर्यात्सत्य-
प्रतीतिस्थिरतया, संवादि हृदयसम्मतं सत् गृह्यतामुपादेयतां याति
इति ।
व्रतौचित्य का प्रदर्शन करके अभी अठारहवें तत्त्वौचित्य की विवेचना करने
के अभिप्राय से कहा जा रहा है—काव्यमिति । सत्यज्ञान के निर्णय से हृदय-
संवादी, कविका काव्य वस्त्वनुरूपकथन से उपादेयता को प्राप्त करता है ।
कारिकार्थ की ही विवृति की जा रही है—तत्त्वेति । वस्तुतत्त्वानुरूप कथन
से कवि की वाणी सत्यबोध की स्थिरता से हृदयसम्मत होकर ग्राह्य कोटि में
आती है ।