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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १४५
व्रतोचित्य का उदाहरण प्रस्तुत किया जा रहा है—यथा ममेति । अत्रेति—
इस वनप्रदेश में वृक्ष, वल्कल को धारण किये हुए तथा पत्तों से युक्त अन्यपक्ष
में पलाशदंडधारी पुष्पपरागस्वरूप भस्म से विभूषित तथा चञ्चल भ्रमरपंक्तिस्वरूप
जपमाला-मंडित होने के कारण, तपस्वी के समान दिखाई पड़ते हैं । अर्थात् जैसे
तपस्वी वल्कल, पलाश भस्म, और जपमाला से विभूषित रहते हैं उसी तरह ये
वृक्ष भी उन वस्तुओं को धारण किये हुए हैं, अतः तपस्वी-से लग रहे हैं । मेरा
विचार है कि इस पद्य में "पलाशिनः" पद का जो व्यवहार किया गया है वह
उचित नहीं हुआ, क्योंकि "पलं = मांसम्, अश्नन्ति = खादन्ति" इस व्युत्पत्ति से
"पलाशिनः" पद का "मांस भोजन करने वाले" यह अर्थ भी निकलता है जो
कि व्रताचरण करने वालों के लिये पूर्णतः निषिद्ध है । फिर उस (व्रताचरण)
प्रसंग में यह पद कैसे उपयुक्त कहा जा सकता है । वस्तु-तत्त्व क्या है, इसका
विचार विद्वान स्वयं करेंगे ।