औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसंस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १४३
अत्र ममोत्पत्तिर्भण्डकुले समीहितपदाक्रमणं च निष्पन्नं तथापि
दैवात्पितप्रियावियोगाद्भोगा भोक्तुं न लभ्यन्त इत्यभिहिते स्वसंवेद्यमेव
भण्डकुलमन्यत्राप्रसिद्धं स्वयमेव निर्दिश्यमानमुत्कर्षविशेषणविरहितकेवल-
पदोपादानेन निरर्थकतया निरौचित्यमेव । इक्ष्वाकुकुलस्य तु
निर्विशेषणत्वमुपपद्यत एव, त्रिभुवनप्रसिद्धौचित्यचरित्रत्वात् ॥ २८ ॥
अत्रोक्तपद्ये 'ममोत्पत्तिर्भण्डकुलेऽभूत्समीहितपदप्राप्तिरपि संयाता,
तथापि दैवदुविपाकात्प्रेयसीवियोगेन सांसारिकभोगा भोक्तुं न प्राप्यन्त'
इत्युक्तौ भण्डकुलं स्वसंवेद्यमेव स्वज्ञानविषयतापन्नमेवान्यत्र जनसमाजे-
ऽप्रसिद्धमविज्ञातमेव, स्वयमेव स्वद्वारेणेव, निर्दिश्यमानं कथ्यमानं,
तदुत्कर्षविशेषणविरहितकेवलपदोपादानेनोत्कर्षाधायकविशेषशून्यतया केव-
लं तन्नाम्नैव कथनेन, निरर्थकतया प्रयोजनविशेषशून्यतया, निरौचित्य-
मेवौचित्यरहितमेव, अर्थात् एवंभूतस्य लोकेऽप्रसिद्धस्य कुलस्याख्याने
तत्रोत्कृष्टताधानाय तद्योग्यविशेषणोपाख्यानमुचितमिह तु तद्विपरीतमा-
चरितमिति तत्कुलस्य महिमा नोपचीयतेऽपि तु सर्वथाऽपचीयत एवेति
पूर्णतोऽत्रानौचित्यं कुलस्येति । यद्यपि एतत्पूर्वप्रतिपादितपद्येऽपीक्ष्वाकु
कुले न विशेषणं प्रदत्तमस्ति परन्तु तत्कुलस्य जगत्प्रसिद्धत्वेन स्व
एवोदात्ततासिद्धिरिति बोध्यम् ॥ २८ ॥
इस पद्य में "मेरी उत्पत्ति भण्डकुल में हुई फिर भी स्वाभीष्ट पद की प्राप्ति
संपन्न हुई, तथापि दैवेच्छावश प्रेयसी के वियोग के कारण कुछ भी सुख भोगने
मैं समर्थ न हो सका" इस कथन में जिस भण्डकुल की चर्चा की गयी है
उस कुल की जानकारी जनसाधारण को तो है नहीं, कहने वाला स्वयं ही जानता
है, फिर भी उसने उसकी उदारता सिद्ध करने के लिये कोई ऐसा विशेषण उसमें
नहीं लगाया, केवल नाममात्रतः उसका निर्देश कर दिया जो कि उचित नहीं
हुआ । यद्यपि इसके पूर्व के पद्य में इक्ष्वाकुकुल के लिए भी कोई विशेषण प्रयुक्त
नहीं हुआ है परन्तु वहाँ वह पूर्णतः उचित है, क्योंकि इक्ष्वाकुकुल का औचित्यपूर्ण
चरित्र तीनों लोकों में प्रसिद्ध है, यहाँ ऐसी स्थिति नहीं है । इसलिये कुलानौचित्य
ही व्यक्त होता है ॥ २८ ॥
व्रतौचित्यं दर्शयितुमाह—
काव्यार्थः साधुवादार्हः सद्व्रतौचित्यगौरवात् ।
सन्तोषनिर्भरं भक्त्या करोति जनमानसम् ॥ २९ ॥