औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 202, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्येति । अथेति--इसके बाद वह राजा वृद्धावस्था में सभी विषयवासनादिक से
चित्त हटाकर राजचिह्न छत्र-चामरादि यथाविधि अपने युवापुत्र को समर्पित
करके स्वयं अपनी राजमहिषी के साथ मुनियों के समान वानप्रस्थ लेकर जंगल
चले गये, क्योंकि इक्ष्वाकुकुल में उत्पन्न होने वाले राजाओं का वृद्धावस्था में ऐसा
ही करने का नियम है ।
अत्र "अथ स राजा वृद्धस्तरुणाय सूनवे राज्यं प्रतिपाद्य तया देव्या
सह तपोवनं भेजे, विरक्तचेतसामिक्ष्वाकूणामन्ते हि कुलव्रतमिदमेव"
इत्युक्ते भूतवर्तमानभाविनां तद्वंश्यानामौचित्यमुन्मीलितम् ।
अत्रोक्तपद्ये "अनन्तरं स राजा वृद्धावस्थायां, युवकाय पुत्राय, राज्यं
दत्वा, तया राजमहिष्या सह, तपोवनं गतवान्, यतो हि वैराग्ययुक्तचित्ताना-
मिक्ष्वाकूणामन्ते एतावदेव कुलव्रतमस्ति" इति वक्तव्ये भूतवर्तमान-
भाविनां विगतसाम्प्रतिकभविष्यतां, तद्वंश्यानामिक्ष्वाकुकुलसंभूतानामौ-
चित्यमानुरूप्यमुन्मीलितमुद्योतितम् ।
इस पद्य में "इसके बाद वह राजा बूढ़ा हो जाने पर अपने युवा पुत्र को
राज्य देकर स्वयं अपनी पत्नी के साथ जंगल चले गये, क्योंकि इक्ष्वाकुकुलोत्पन्न
राजाओं का अन्त में ऐसा ही कौलिक नियम है" इस कथन में भूत, वर्तमान
और भविष्य में जन्म लेने वाले इक्ष्वाकुओं का औचित्य अत्यन्त समृद्ध हो
जाता है ।
न तु यथा यशोवर्मदेवस्य—
उत्पत्तिर्भाण्डकुले यदभीष्टं तत्पदं समाक्रान्तम् ।
भोगास्तथापि दैवात्सकृदपि भोक्तुं न लभ्यन्ते ॥
कुलानौचित्यं दर्शयितुमाह—न तु यथा यशोवर्मेति । उत्पत्तिरिति ।
भाण्डकुले "भांड" इति प्रसिद्धे वंशे, ( मम ) उत्पत्तिर्जन्म, अभूदिति शेषः,
( अथापि ) यत् ( पदम् ) अभीष्टमभिमतं, तत्पदं स्थानं समाक्रान्तं लब्धं,
तथापि सर्वविधभोगसामग्रीसमुपस्थितावपि, दैवाद् विधिवशाद् भोगा भोज्य-
पदार्थाः, सकृदपि मनागपि, भोक्तुं, न लभ्यन्त आसाद्यन्ते ।
कुलानौचित्य का उदाहरण उपस्थित किया जा रहा है--न तु यथेति ।
उत्पत्तिरिति--भांड के कुल में मेरा जन्म हुआ फिर भी जो अभीष्ट था उस पद
की प्राप्ति मुझे हुई, परन्तु विधिविडम्बनावश कुछ भी सुख भोग करने में समर्थ
नहीं हो रहा हूँ ।