औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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प्रतिस्पर्द्धा में ही ( अर्थात् आमने-सामने ही ) उगता है, इससे सिद्ध होता है
कि जड़ ( दूसरे कि शक्ति को लेकर चमकने वाला ) न तो अपनी दुर्जनता से
बाज आता है और याचना से ही विरत हुआ ।
अत्र रवेर्मण्डलं क्षीणः शशी प्रतिमासं प्रविशति ततः काञ्चिदाप्या-
यिकां कलां प्राप्य दूरे दूरे भवति, परिपूर्णश्च तस्यैव स्पर्द्धयाऽभ्युदेति,
दौर्जन्यान्न विरमति न च दैन्याद्व्यरंसीदित्येतद् "विरमति व्यरंसीत्"
इति परस्परासङ्गतं कालपदद्वयं चन्द्रस्य सदृशयोर्दौर्जन्यदैन्ययोः सर्वकाल-
मभिनिर्वृत्तयोर्यदुपन्यस्तं तत्र व्यरंसीदिति विरुद्धार्थकत्वादनुचित-
मेव ॥ २६ ॥
अत्रास्मिन्पद्ये "कलाहीनश्चन्द्रः प्रतिमासं सौरमण्डलं प्रविशति, ततः
सौरमण्डलात्कियतीमाह्लादिकां कलामासाद्य क्रमशॊ दूराद् दूरं व्रजति,
कलाभिः परिपूर्णश्च तस्यैव सूर्यस्य प्रतिस्पर्द्धया समानान्तरमुदेति, दौर्ज-
न्यान्न विराममेति न च दारिद्र्याद्व्यरंसीद् विराममगच्छ"दित्युक्तौ
चन्द्रस्य, सदृशयोः समानयोः, सर्वकालमभिनिवृत्तयोः सर्वदासम्पन्नयो-
दौर्जन्यदैन्ययोः सतोरिति भावः, एतद् "विरमति व्यरंसीत्" इति
परस्परासङ्गतमन्योन्यायुक्तं कालपदद्वयं वर्तमान-भूत-कालबोधकपदयुगलं
यदुपन्यस्तं यत्प्रतिपादितं तत्र विरुद्धार्थकत्वात्कालभेदेन विपरीतार्थकत्वा-
द्व्यरंसीदित्यनुचितमेवासमीचीनमेव ॥ २६ ॥
इस पद्य में "क्षीण चन्द्रमा प्रतिमास सौरमंडल में प्रवेश करता है और वहाँ
से कुछ पूरक कलायें प्राप्त कर दूर निकलता चला जाता है, परिपूर्ण होकर उसी
( सूर्य ) की प्रतियोगिता में उगता है, न तो अपनी दुर्जनता ही छोड़ता है और
न दीनता से ही विरत हुआ" इस कथन में "विरमति और व्यरंसीत्" इन
परस्परविरुद्धकालबोधक पद-द्वय का प्रयोग चन्द्रमा के उस गुणद्वय ( दुर्जनता
और दीनता ) के लिये किया गया है जो कि उसका सार्वकालिक गुण है । ऐसी
स्थिति में व्यरंसीत् की जगह विरमति की तरह वर्तमानकालिक प्रयोग ही रहता
तो उचित होता, ऐसा करके एक भूतकाल का जो प्रयोग कर दिया गया है वह
अत्यन्त अनुचित है ॥ २६ ॥
देशौचित्यं दर्शयितुमाह—
देशौचित्येन काव्यार्थः ससंवादेन शोभते ।
परं परिचयाशंसो व्यवहारः सतामिव ॥ २७ ॥