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औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

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संस्कृत-हिन्दोव्याख्याद्वयोपेता १३१
यिकेनेति भावः, वेषेण वेषधारणेनेत्यभिप्रायः, सतां सज्जनानां, वपुः
शरीरमिव, चारुतां सुन्दरतां, याति प्राप्नोत्येव ।
कारिकार्थमेव विवृणोति — कालकृतेति । कालकृतौचित्ययुक्तेन भूत-
भविष्यदादिकालकृतौचित्यसहितेनार्थे नाभिधेयेन, वाक्यं, चारुतां रुचिर-
तामेति प्राप्नोति, कालयोग्येन समयोचितेन, वेषपरिग्रहेण वेषधारणेनाव-
सरज्ञानामवसरज्ञानवतां, सतां सज्जनानां, वपुर्विग्रह इव ।
उदाहरण-प्रत्युदाहरणों को दिखा कर निपातोचित्य की विवेचना के बाद
क्रमानुसार चौदहवें कालोचित्य की मीमांसा करने के लिए कहा गया है--
कालौचित्येनेति । भूत भविष्यत् आदि कालकृत औचित्य से युक्त अर्थ के प्रयोग
से काव्यरूप वाक्य समयानुरूप वेषविन्यास से सज्जनों के शरीर की तरह अपूर्व
कमनीयता को प्राप्त कर जाता