औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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मुनीति । शिशुपाल के द्वारा श्रीकृष्ण की निन्दा में यह पद्य कहा गया हैं-योऽभू-
दिति । जो ग्वाले का लड़का दूध-दही का प्रमुख चोर था और गोहाल में गौंत-
गोबर साफ किया करता था, आज जगत्पते, खगपते, शौरे, मुरारे, हरे, श्रोवत्साङ्क
आदि पदों के द्वारा उसी की स्तुति मूर्खजन कर रहे हैं--इन पदों से सभी के
कान भर गये हैं, हा ! विपर्ययप्रेमी समय-परिपाक आश्चर्यजनक है ।
अत्रामर्षविषविषमाविष्कारमुमूर्षुणा शिशुपालेनाभिधीयमाने
यत्किल गोपालबालः पयोदधिशिरश्चौरः करीषसङ्कषोऽभूत्तस्यैवाद्य जगन्ना-
थादिभिः स्तुतिपदैर्नृणां कर्णौ पूरितौ, ही बत कालस्य विपर्ययकारिणी
पाकक्रियाऽऽश्चर्यभूमिरिति वाक्येऽभूदिति भूतकालेनाश्चर्यपरिपोषरुचिर-
मारब्धाधिक्षेपलक्षणं वाक्यौचित्यं कृतम् ।
अत्रोक्तपद्ये, अमर्षः क्रोध एव विषं गरलं, तस्य विषमो विचित्रो
य आविष्कार उत्पत्तिस्तेन मुमूर्षुणा चक्रधाराशङ्कितमरणेन, शिशुपाले-
नाभिधीयमाने कथ्यमाने "यत्किल गोपालबालः पयोदध्नोर्मुख्यापहारको
गोमयादिप्रोञ्छकोऽभूत्तस्यैवेदानीं जगन्नाथादिभिः स्तुतिपदैर्नृणां कर्णौ
पूरितौ, बतेति खेदे विपर्यासविधायिनी कालस्य पाकक्रियाऽऽश्चर्यभूमिः"
इति वाक्ये