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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 256 में से

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पृष्ठ 187

संस्कृत-हिन्दीव्याख्याद्वयोपेता १२७
प्रभातसंध्यायां प्रातःकालेऽरुणकिरणोद्गमः सूर्यरश्म्युदयो वर्तते, ताम्र-
चूड़ाश्च सम्प्रवदन्तीति" यदुक्तं, तत्प्रतिपादनं, सम्प्रोपसर्गशून्यशब्दापूरण-
मात्रेण सम्प्रेत्युपसर्गद्वयरहितेन, वदन्तीत्याकारेण शब्देन केवलेना-
भीष्टार्थाप्त्या ( हेतुना ) निरर्थकत्वाद्वैयर्थ्यादनुचितमयुक्तमेव ॥ २४ ॥
यहाँ पर अभिनव कामसंपर्कजन्य गाढ़ आलिंगन से आबद्ध नवयुवती को
सावधान करने के लिये सखी के द्वारा "प्रियतम को छोड़ो, सूर्य की किरणें उग
आयी हैं, मुर्गे भी बाँग देने लग गये हैं ( सवेरा हो गया है )—ऐसा कहने के
क्रम में "सम्प्रवदन्ति" का प्रयोग कर 'सम्' और 'प्र' रूप उपसर्ग का जो व्यवहार
किया गया है वह कुछ अधिक अर्थ नहीं रखता, क्योंकि उसके बिना भी वक्तव्य
अर्थ की पूर्ति हो जाती है, इसलिये उस उपसर्ग-द्वय का प्रयोग उपसर्ग-गत
अनौचित्य को ही प्रगट करता है ॥ २४ ॥
निपातौचित्यं दर्शयितुमाह—
उचितस्थानविन्यस्तैर्निपातैरर्थसङ्गतिः ।
उपादेयैर्भवत्येव सचिवैरिव निश्चला ॥ २५ ॥
उपादेयैश्चादिभिर्निपातैक्वचित्पदविनिवेशितैः काव्यार्थस्य सङ्गतिर-
सन्दिग्धा सत्सहायैरिव भवति ।
उपसर्गगतौचित्यानौचित्ये प्रदर्श्य सम्प्रति क्रमप्राप्तं त्रयोदशतमं
निपातौचित्यं विवेचयितुमाह—उचितेति । उचितस्थानविन्यस्तैः समु-
चितस्थाननियुक्तैरुपादेयैः संग्रहणीयैः, सचिवैर्मन्त्रिभिः सहायैरिति
भावः, यथाऽर्थसङ्गतिर्धनसम्प्राप्तिर्निश्चला सुदृढा भवति, तथैव उचित-
स्थानविन्यस्तैः समुचितस्थलप्रयुक्तैरुपादेयैर्ग्राह्यैर्निपातैश्च वा-हेत्यादिरूपै-
रर्थसङ्गतिर्वाक्यार्थसामञ्जस्यं, निश्चलाऽसंदिग्धा भवत्येव ।
पूर्वकारिकार्थमेव व्याख्यातुमाह—उपादेयैरिति । उचितपदविनि-
वेशितैरुचितस्थानप्रयुक्तैरुपादेयैर्ग्राह्यैश्चादिभिश्च वा-हप्रभृतिभिर्निपातैः
काव्यस्यार्थसङ्गतिरभिधेयार्थसामञ्जस्यम्, सत्सुहृदैः सन्मन्त्रिभिरिवा-
सन्दिग्धा सन्देहरहिता भवति ।
उपसर्गगत औचित्यानौचित्य को दिखाकर अभी तेरहवें निपातगत औचित्य
की मीमांसा की जा रही है—उचितेति । जैसे अच्छे मन्त्रियों की नियुक्ति से कोष
अक्षय रहता है वैसे ही उचित स्थान पर च, वा, ह आदि निपातों के प्रयोग से
अर्थसंगति निःसंदिग्ध होती है ।